तमिलनाडु में दूध खरीद मूल्य ₹41 प्रति लीटर हुआ, सीएम जोसेफ विजय ने विधानसभा में की घोषणा
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने 19 अगस्त 2026 को विधानसभा के नियम 110 के तहत राज्य में दूध खरीद मूल्य में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की घोषणा की, जिससे कुल खरीद मूल्य ₹38 से बढ़कर ₹41 प्रति लीटर हो गया है। इस निर्णय से राज्य की 8,800 दूध सहकारी समितियों से जुड़े 3.16 लाख से अधिक दूध उत्पादकों को सीधा लाभ मिलेगा।
मूल्य वृद्धि का ढाँचा
मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने स्पष्ट किया कि यह बढ़ोतरी दो स्तरों पर की गई है। सहकारी समितियों के माध्यम से आधार खरीद मूल्य में ₹1 प्रति लीटर की वृद्धि की गई है, जबकि राज्य सरकार का प्रोत्साहन ₹3 प्रति लीटर से बढ़ाकर ₹5 प्रति लीटर कर दिया गया है। गौरतलब है कि नवंबर 2022 से 4.3% फैट और 8.2% सॉलिड-नॉट-फैट (एसएनएफ) मानक वाले दूध के लिए आधार खरीद मूल्य ₹35 प्रति लीटर निर्धारित था।
दूध उत्पादन का वर्तमान परिदृश्य
मुख्यमंत्री के अनुसार, तमिलनाडु में प्रतिदिन 34 लाख लीटर दूध की आपूर्ति होती है, जिसमें से आविन (Aavin) के माध्यम से 31 लाख लीटर दूध प्रतिदिन उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जाता है। यह नेटवर्क राज्य की डेयरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। विजय ने कहा, 'हमारी परंपरा की महानता यह है कि हम गाय को पवित्र मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं, क्योंकि गाय न सिर्फ अपने बछड़े के लिए, बल्कि इंसानों और कई अन्य जीवों के लिए भी दूध देती है, जिससे जीवन चलता है।'
पिछली सरकार पर आरोप
मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने कहा कि पूर्ववर्ती सरकार ने दूध उत्पादकों की बढ़ती श्रम लागत और कड़ी मेहनत को नज़रअंदाज़ किया तथा खरीद मूल्य बढ़ाने पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि 'गंभीर आर्थिक चुनौतियों के बावजूद हमारी सरकार का यह दायित्व है कि वह दूध उत्पादकों की आजीविका सुनिश्चित करे।' यह बयान राज्य में डेयरी क्षेत्र की लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा की ओर इशारा करता है।
सरकारी खज़ाने पर असर
मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि इस मूल्य वृद्धि से राज्य सरकार पर प्रतिमाह ₹30 करोड़ और प्रतिवर्ष ₹360 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य पर पहले से ही राजकोषीय दबाव है, फिर भी सरकार ने किसान-हित को प्राथमिकता दी है।
आगे की राह
यह निर्णय तमिलनाडु की डेयरी सहकारिता को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ा हुआ मूल्य उत्पादकों को पशुपालन में निवेश जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करेगा, जिससे दीर्घकालिक दूध आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी।