सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र FDA को राहत दी, गुरुनानक डेयरी मामले में ₹5 लाख मुआवजा आदेश रद्द
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 5 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) को बड़ी राहत देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पुणे स्थित गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स प्रतिष्ठान को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। यह निर्णय स्टेट ऑफ महाराष्ट्र एंड अन्य बनाम मे./से. गुरुनानक डेरी एंड स्वीट्स मामले में सुनाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
12 जून 2026 को खाद्य विषाक्तता (फूड पॉइजनिंग) की शिकायत मिलने के बाद FDA, पुणे के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने संबंधित मिठाई और डेयरी प्रतिष्ठान का निरीक्षण किया था। निरीक्षण में स्वच्छता, रिकॉर्ड के रखरखाव, लेबलिंग और कर्मचारियों की व्यक्तिगत स्वच्छता से जुड़ी कई गंभीर कमियाँ सामने आईं। इसके साथ ही मलाई पेड़ा का नमूना जाँच हेतु लिया गया, जिसे बाद में असुरक्षित घोषित किया गया।
FDA के अनुसार, सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के प्रावधानों के अंतर्गत प्रतिष्ठान का फूड लाइसेंस निलंबित कर दिया गया।
कानूनी कार्यवाही का क्रम
प्रतिष्ठान के मालिक ने 15 जून 2026 को FDA कमिश्नर के समक्ष वैधानिक अपील दाखिल की। 9 जुलाई 2026 को कंप्लायंस रिपोर्ट जमा करने के महज चार दिन बाद, 13 जुलाई 2026 को FDA ने दोबारा निरीक्षण किया। इसके बाद प्रतिष्ठान ने बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर दी।
17 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने फूड लाइसेंस का निलंबन रद्द करते हुए FDA को कारोबारी नुकसान के आधार पर प्रतिष्ठान को ₹5 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया। इस आदेश को महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।
सरकार की दलीलें
महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष स्पष्ट किया कि FDA की कार्रवाई सद्भावना में और सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के उद्देश्य से की गई थी — न कि दुर्भावनापूर्ण या मनमाने ढंग से। सरकार का तर्क था कि वैधानिक अपील प्रक्रिया के दौरान लिए गए समय को राज्य पर आर्थिक जुर्माने का आधार नहीं बनाया जा सकता, विशेषकर जब संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपील पहले से लंबित हो।
इसके अलावा सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि प्रतिष्ठान की कंप्लायंस रिपोर्ट मिलने के केवल चार दिनों के भीतर पुनः निरीक्षण करके FDA ने तत्परता और जिम्मेदारी का परिचय दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उसका महत्त्व
सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का ₹5 लाख का मुआवजा आदेश निरस्त कर दिया। FDA ने अपने प्रेस नोट में कहा कि यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा निरीक्षण में मिली कमियों के आधार पर और सार्वजनिक हित में की गई कार्रवाई फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के तहत कानूनी रूप से उचित है।
गौरतलब है कि यह मामला खाद्य सुरक्षा नियामकों और व्यापार प्रतिष्ठानों के बीच कानूनी जवाबदेही की उस बहस को नई दिशा देता है, जिसमें अक्सर यह सवाल उठता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उठाए गए कदमों पर प्रशासनिक देनदारी किस हद तक थोपी जा सकती है। आने वाले समय में यह फैसला देशभर के खाद्य नियामकों के लिए एक संदर्भ बिंदु बन सकता है।