मेघालय हाई कोर्ट ने पॉक्सो मामला किया रद्द: आरोपी-पीड़िता विवाहित, चार साल की बेटी की परवरिश कर रहे
सारांश
मुख्य बातें
मेघालय हाई कोर्ट ने 30 जुलाई 2026 को 27 वर्षीय एक व्यक्ति के विरुद्ध यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के अंतर्गत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। न्यायालय ने इस तथ्य को निर्णायक माना कि आरोपी ने पीड़िता से विधिवत विवाह कर लिया है, दोनों कई वर्षों से साथ रह रहे हैं और अपनी चार वर्षीया बेटी की संयुक्त रूप से परवरिश कर रहे हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह प्रकरण 2021 में री-भोई महिला पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से उपजा था, जब लड़की नाबालिग और गर्भवती थी। बालिग होने के पश्चात उसने स्वेच्छा से आरोपी के साथ रहने का निर्णय लिया और इस वर्ष मार्च में नोंगपोह के मैरिज रजिस्ट्रार के समक्ष दोनों ने विधिसम्मत विवाह संपन्न किया।
डिवीजन बेंच ने आरोपी और पीड़िता की संयुक्त याचिका को स्वीकार करते हुए री-भोई स्पेशल जज (पॉक्सो) की अदालत में लंबित कार्यवाही एवं एफआईआर, दोनों को निरस्त कर दिया।
हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी की रिपोर्ट
हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के सेक्रेटरी की रिपोर्ट ने पुष्टि की कि यह दंपती अपनी बेटी के साथ एक छत के नीचे रह रहा है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि महिला को चल रहे आपराधिक मामले के कारण लैबोरेटरी टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा कोर्स बीच में ही छोड़ना पड़ा था। उसने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने, विधि की डिग्री लेने और सिलाई में व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने की इच्छा जताई।
रिपोर्ट में दर्ज है कि महिला ने स्वयं कहा कि उसे अपने पति के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही रद्द किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।
न्यायालय का तर्क और पूर्व नज़ीर
मामले को रद्द करते हुए हाई कोर्ट ने 'शालेनबोर वाहतांग बनाम मेघालय राज्य' में अपने पूर्व निर्णय का संदर्भ दिया, जिसमें माना गया था कि राज्य में किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध असामान्य नहीं हैं और ऐसे मामलों में अदालतों को विशिष्ट परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए।
बेंच ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत अपराधों को समाज के विरुद्ध अपराध माना जाता है, तथापि न्यायिक निर्णय सामाजिक वास्तविकता से पूर्णतः विलग नहीं हो सकते। न्यायालय के अनुसार, जहाँ कोई दंपती विधिसम्मत रूप से विवाहित हो या बच्चों के साथ रह रहा हो, वहाँ पति को कारागार भेजने से न केवल पीड़िता, बल्कि बच्चे के हित पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
महिला और बेटी के लिए कल्याणकारी निर्देश
हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि महिला और उसकी बेटी को लागू केंद्रीय एवं राज्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही री-भोई जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और जिला बाल संरक्षण अधिकारी को आठ सप्ताह के भीतर महिला की उच्च शिक्षा अथवा व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का आदेश दिया गया।
यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि न्यायपालिका कानून की कठोर व्याख्या और जीवंत सामाजिक परिस्थितियों के बीच संतुलन साधने की जटिल चुनौती से निरंतर जूझती रहती है।