दिल्ली हाईकोर्ट ने जनकपुरी स्कूल पॉक्सो मामले में आरोपी की जमानत रद्द की, मां की याचिका पर बड़ा फैसला
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने जनकपुरी स्थित एक निजी स्कूल में तीन वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म के मामले में मुख्य आरोपी की जमानत रद्द कर दी है। पीड़िता की मां द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पॉक्सो कोर्ट के जमानत आदेश को निरस्त किया, जो गिरफ्तारी के महज पाँच दिन के भीतर दिया गया था। इस फैसले को आम आदमी पार्टी (AAP) ने पीड़िता और उसके परिवार के न्यायिक संघर्ष की जीत करार दिया है।
मामले का घटनाक्रम
आरोपी, जो 57 वर्षीय व्यक्ति है और स्कूल में केयरटेकर एवं सीनियर क्लर्क के पद पर कार्यरत था, पर तीन वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म का आरोप है। पॉक्सो कोर्ट ने उसे गिरफ्तारी के पाँच दिन के भीतर ही जमानत दे दी थी, जिसे शुरुआत से ही कानूनी हलकों में असामान्य माना जा रहा था। इसके बाद पीड़िता की मां ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी। हाईकोर्ट में पीड़िता की ओर से अधिवक्ता ऋषिकेश कुमार ने पैरवी की, और अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत निरस्त कर दी।
पुलिस की भूमिका पर सवाल
AAP के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया कि आरोपी को पहली बार गिरफ्तार किए जाने पर पुलिस ने उसकी रिमांड तक नहीं माँगी, जो उनके अनुसार अत्यंत असामान्य था। उन्होंने कहा कि तत्कालीन जनकपुरी थाना प्रभारी (SHO) और संबंधित जिले के DCP पर आरोपी की मदद करने के आरोप लगे थे। बाद में दोनों अधिकारियों का तबादला कर दिया गया था।
AAP की प्रतिक्रिया
भारद्वाज ने कहा कि यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि इस संवेदनशील मामले में कुछ लोगों द्वारा आरोपी के समर्थन में प्रदर्शन किया गया, जिसे उन्होंने 'दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक' बताया। AAP ने दावा किया कि उसने शुरुआत से इस मामले को प्रमुखता से उठाया और पीड़ित परिवार के साथ खड़ी रही।
आगे की कानूनी स्थिति
उल्लेखनीय है कि मामले की सुनवाई अभी जारी है और आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर अंतिम निर्णय ट्रायल पूरा होने के बाद ही अदालत द्वारा दिया जाएगा। हाईकोर्ट का यह आदेश जमानत रद्द करने तक सीमित है — दोष सिद्धि या निर्दोषता का प्रश्न विचाराधीन है। पीड़िता की मां की यह कानूनी जीत अब ट्रायल को और अधिक निर्णायक मोड़ पर ले जाती है।