ब्रिक्स प्लस से भारत को ग्लोबल साउथ में बड़ा मंच, पर गठबंधन साधने की चुनौती भी: रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
विस्तारित ब्रिक्स प्लस समूह ने भारत को मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया सहित पूरे ग्लोबल साउथ के प्रमुख देशों के साथ अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंध गहरे करने का एक व्यापक मंच दिया है। वियतनाम टाइम्स में प्रकाशित एक विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, यह विस्तार नई दिल्ली की रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीयता की नीति को नई ताकत दे सकता है। हालाँकि, रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि लगातार बढ़ते सदस्यों के साथ समूह में अंतर्विरोध भी गहरे होते जा रहे हैं।
ब्रिक्स का बदलता स्वरूप
रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिक्स अब वह छोटा पाँच देशों का समूह नहीं रहा जिसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मंच के रूप में बनाया गया था। विस्तार के बाद इसका भौगोलिक दायरा, जनसंख्या और आर्थिक वजन उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। रिपोर्ट में कहा गया, 'यह मौजूदा वैश्विक व्यवस्था से असंतुष्ट देशों की आवाज़ के तौर पर उभरा है, लेकिन इस विस्तार ने ऐसे समूह में और भी अंतर्विरोध ला दिए हैं, जो पहले से ही बहुत एकजुट नहीं था।'
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज़ हो रहा है और पश्चिमी नेतृत्व वाली बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं। गौरतलब है कि यूएई, मिस्र, इथियोपिया और ईरान सहित कई नए सदस्यों के जुड़ने से समूह की विविधता बढ़ी है — लेकिन आम सहमति बनाना कठिन भी हुआ है।
भारत के लिए रणनीतिक लाभ
रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिक्स प्लस भारत की पसंदीदा कूटनीतिक शब्दावली — रणनीतिक स्वायत्तता, बहुध्रुवीयता, संप्रभु समानता, सुधरा हुआ बहुपक्षवाद और विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व — को और अधिक मजबूती दे सकता है। रिपोर्ट में एक महत्त्वपूर्ण भेद उजागर किया गया: 'भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने के लिए ब्रिक्स की आवश्यकता नहीं है। भारत को उस व्यवस्था के भीतर अपनी सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाने के लिए ब्रिक्स की आवश्यकता है।'
विस्तारित समूह विकास वित्तपोषण, जलवायु न्याय, प्रौद्योगिकी पहुँच, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारत की ग्लोबल साउथ कूटनीति के लिए भी एक सशक्त मंच प्रदान करता है।
नई दिल्ली पर बढ़ी ज़िम्मेदारी
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अब भारत को यूएई समेत अन्य मध्यम शक्तियों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करना होगा तथा नए सदस्यों के साथ तालमेल बैठाना होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लगातार हो रहे विस्तार से समूह की सामूहिक ताकत कमजोर न पड़े।
रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली को ब्रिक्स प्लस को न तो अपनी विदेश नीति के प्राथमिक मंच के रूप में देखना चाहिए और न ही एक असुविधाजनक विरासत वाले समूह के रूप में। इसके बजाय, इसे गुटबंदी की राजनीति से दूर रहते हुए बहुध्रुवीयता को आगे बढ़ाने की व्यापक रणनीति के एक अहम स्तंभ के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए।
असली परीक्षा: क्या भारत समूह को अपने पक्ष में चला सकता है?
रिपोर्ट में केंद्रीय सवाल यह उठाया गया है कि 'क्या ब्रिक्स प्लस पुराने ब्रिक्स से अधिक मजबूत है' — यह मुद्दा नहीं है। असली सवाल यह है कि 'क्या भारत एक बड़े और अधिक विरोधाभासी समूह को एक बहुध्रुवीय व्यवस्था के पक्ष में काम करवा सकता है जो भारतीय स्वायत्तता को बनाए रखे।'
विश्लेषकों के अनुसार, नई दिल्ली की अध्यक्षता भारत के राजनयिक नेतृत्व को प्रदर्शित करने का एक अवसर है — परंतु इसके बाद की कूटनीतिक सफलता ही इस पहल की वास्तविक कसौटी होगी।