18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले विशेषज्ञों का मत: भारत की अध्यक्षता ग्लोबल साउथ को दे रही नई दिशा
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 8 सितंबर को आयोजित एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ संवाद में विश्लेषकों ने कहा कि भारत की चौथी ब्रिक्स अध्यक्षता ऐसे नाज़ुक मोड़ पर आई है जब भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, आर्थिक विखंडन और वैश्विक शासन संस्थानों में सुधार की माँग एक साथ चरम पर हैं। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हुई इस चर्चा में राजनयिकों, नीति-निर्माताओं और शोधकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ब्रिक्स की उभरती भूमिका को परखा।
संवाद का संदर्भ और महत्व
चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) द्वारा आयोजित इस ब्रिक्स संवाद में विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि ब्रिक्स अपने गठन के बाद से एक लंबा सफर तय कर चुका है। इसका एजेंडा अब केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शासन सुधार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल रूपांतरण और दक्षिण-दक्षिण सहयोग तक विस्तृत हो गया है।
हाल के विस्तार के बाद ब्रिक्स अब विश्व की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी और वैश्विक जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है — एक ऐसा भार जो वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक बहसों पर इसके संभावित प्रभाव को काफी बढ़ा देता है।
भारत की अध्यक्षता: प्राथमिकताएँ और चुनौतियाँ
विशेषज्ञों के अनुसार भारत की अध्यक्षता का विषय — 'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण' — ब्रिक्स को एक व्यावहारिक, समावेशी और सतत सहयोग के मंच के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता है।
CRF के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी — जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) के पूर्व निदेशक भी रहे हैं — ने आर्थिक सहयोग के चार स्तंभों की पहचान की: व्यापार, वित्तीय सहयोग, प्रौद्योगिकी और भू-राजनीतिक एकीकरण। उन्होंने कहा, 'चुनौती भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद प्रभावी समूह बनाने की है।'
विशेषज्ञों के प्रमुख विचार
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने कहा कि उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि प्रमुख भागीदारों के बहुध्रुवीयता को लेकर अलग-अलग नज़रिए हैं। उनके अनुसार, 'ब्रिक्स महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सहयोग के लिए बॉटम-अप दृष्टिकोण को सक्षम बनाता है, जिससे देशों को लचीलापन बनाने, जोखिमों में विविधता लाने और वैकल्पिक आर्थिक व रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की अनुमति मिलती है।'
विशेषज्ञ हीना मखीजा ने ध्यान दिलाया कि ब्रिक्स एक चार्टर-आधारित संगठन नहीं है और इसके लंबवत तथा क्षैतिज दोनों तरह के विस्तार ने शक्ति असमानता को जन्म दिया है। उन्होंने कहा, 'इस उभरती और विविध सदस्यता को देखते हुए, नई दिल्ली में ब्रिक्स सचिवालय स्थापित करने पर आम सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।'
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के प्रोफेसर हर्ष वी. पंत ने रेखांकित किया कि ब्रिक्स की मूल परिकल्पना एक भू-आर्थिक मंच के रूप में थी, लेकिन सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक मतभेदों ने इसे तेज़ी से एक जटिल भू-राजनीतिक आयाम भी दे दिया है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या ब्रिक्स भारत के बहुपक्षीय एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त रूप से प्रभावी मंच साबित हो सकता है।
रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (RIS) के सब्यसाची साहा ने भारत द्वारा प्रचारित 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को उजागर करते हुए कहा कि ब्रिक्स को अपने सदस्यों के बीच द्विपक्षीय संबंधों से परे ठोस सामूहिक मूल्य प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। प्रीतम बनर्जी ने न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के अधिदेश के भीतर नवीन वित्तीय साधनों की वकालत की, ताकि सदस्यों के बीच वित्तीय सहयोग को और मजबूती मिल सके।
ठोस सहयोग के संभावित क्षेत्र
चर्चा में कई व्यावहारिक सहयोग-क्षेत्रों की पहचान की गई जहाँ से ठोस परिणाम संभव हैं — जैसे ब्रिक्स अनाज विनिमय की स्थापना, आपस में जुड़ी कागजरहित व्यापार प्रणालियाँ, गैर-टैरिफ बाधाओं में कमी और जहाँ व्यावसायिक रूप से संभव हो, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी पहलें आर्थिक लचीलेपन को मजबूत करने के साथ-साथ ब्रिक्स की व्यावहारिक प्रासंगिकता को भी प्रमाणित कर सकती हैं।
आगे की राह: घोषणाओं से अमल तक
संवाद का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि ब्रिक्स की भविष्य की विश्वसनीयता काफी हद तक घोषणाओं को ज़मीनी अमल में बदलने की उसकी क्षमता पर निर्भर करेगी। बढ़ती सदस्यता अधिक प्रतिनिधित्व और सामूहिक भार तो देती है, लेकिन साथ ही आम सहमति-निर्माण और संस्थागत निरंतरता की चुनौती को भी बड़ा बना देती है। यह देखना अहम होगा कि 18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इन अपेक्षाओं को किस हद तक पूरा कर पाता है।