18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ग्लोबल साउथ सहयोग केंद्र में, भारत-रूस व्यापार $100 अरब तक बढ़ाने पर सहमति
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 13 सितंबर 2026 को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन व्यापार, निवेश, रणनीतिक सहयोग और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अवधारणा चर्चा के केंद्र में रही। विशेषज्ञों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने एकमत से ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ के लिए लगातार अधिक प्रासंगिक होते जा रहे सहयोग मंच के रूप में रेखांकित किया।
शिखर सम्मेलन के प्रमुख परिणाम
एसडब्ल्यूएफआई के चेयरमैन और आईब्रिक्स 2026 के लीड को-चेयर लक्ष्मी नारायणन ने कहा कि शिखर सम्मेलन से तीन प्रमुख परिणाम सामने आए हैं। इनमें द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के ठोस प्रयास, भारत और चीन के बीच सीमा से जुड़े मुद्दों के समाधान की दिशा में सकारात्मक प्रगति, तथा भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार को $100 अरब तक बढ़ाने की समझ शामिल हैं।
नारायणन ने यह भी कहा कि कई अर्थव्यवस्थाओं के समक्ष मौजूद टैरिफ संबंधी चुनौतियाँ ब्रिक्स देशों की वजह से नहीं, बल्कि व्यापक वैश्विक व्यापारिक परिस्थितियों — जिनमें अमेरिकी नीतियों का भी अहम प्रभाव है — के कारण उत्पन्न हुई हैं। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों ने सामूहिक सहयोग और आर्थिक समन्वय के ज़रिए इन चुनौतियों से निपटने पर सहमति जताई है।
दिल्ली घोषणा और सुरक्षा का आयाम
रक्षा विशेषज्ञ रंजीत राय ने शिखर सम्मेलन में अपनाई गई दिल्ली घोषणा को वैश्विक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बताया। उनके अनुसार, इस आयोजन ने दुनिया के नेताओं को भारत को करीब से समझने का अवसर दिया और जलवायु परिवर्तन, सुरक्षा तथा आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर सामूहिक कार्रवाई की ज़रूरत को रेखांकित किया।
राय ने कहा, 'ब्रिक्स का मूल उद्देश्य बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करना है, जहाँ वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ देशों तक सीमित न रहे।' यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली वैश्विक संस्थाओं की प्रासंगिकता पर बहस तेज़ हो रही है।
ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व
सेटू आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजशेखर जोशी ने कहा कि ब्रिक्स ग्लोबल साउथ के सहयोग के सबसे प्रभावशाली उदाहरणों में से एक बनकर उभरा है। उन्होंने बताया कि यह समूह अब दुनिया की आधी से अधिक आबादी और वैश्विक जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है — एक आंकड़ा जो पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाले G7 समूह से कहीं अधिक है।
गौरतलब है कि ब्रिक्स का विस्तार हाल के वर्षों में तेजी से हुआ है और इसमें नए सदस्य देशों के शामिल होने के बाद इसका आर्थिक और जनसांख्यिकीय भार और बढ़ गया है।
आईब्रिक्स और उद्योग जगत की भूमिका
नारायणन ने आईब्रिक्स की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह मंच राजनयिक चर्चाओं को ठोस निवेश, परियोजनाओं और कारोबारी अवसरों में बदलने पर केंद्रित है — जो इसे अन्य बहुपक्षीय मंचों से अलग करता है।
उद्योग जगत ने भी भारत की मेजबानी की सराहना की। इंडो विंग्स प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ पारस जैन ने कहा कि आयोजन के कुशल प्रबंधन से देश की वैश्विक छवि और मजबूत हुई है। इंडोजीनियस के निक बुकर ने कहा कि दुनिया के प्रमुख नेताओं की भागीदारी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और आर्थिक भागीदारी में भारत के बढ़ते महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली घोषणा और इस शिखर सम्मेलन में तय हुई समझ आने वाले महीनों में ठोस नीतिगत कार्रवाइयों की नींव रख सकती है। भारत-रूस व्यापार को $100 अरब तक ले जाने का लक्ष्य और भारत-चीन सीमा पर सकारात्मक प्रगति — दोनों ही भारत की कूटनीतिक सक्रियता के लिए परीक्षण की घड़ी होगी।