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नालसार मामला: सीजेआई सूर्यकांत ने बीसीआई को लगाई फटकार, छात्रों-शिक्षकों पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक

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नालसार मामला: सीजेआई सूर्यकांत ने बीसीआई को लगाई फटकार, छात्रों-शिक्षकों पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने नालसार विवाद में बीसीआई को खुली फटकार लगाई — सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि छात्रों के विरोध के अधिकार में बीसीआई का कोई काम नहीं। अंतरिम आदेश से सभी विधि विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों को राहत मिली है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त को अंतरिम आदेश दिया — किसी भी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के छात्र या शिक्षक के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।
सीजेआई सूर्यकांत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की दखलअंदाज़ी को 'बिल्कुल अनावश्यक' बताया।
बीसीआई ने नालसार यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के एक बैच के छात्रों को वकील के रूप में पंजीकृत न करने का आदेश दिया था, जिसका व्यापक विरोध हुआ।
बीसीआई ने सुनवाई के दौरान विवादास्पद लंबित सर्कुलर वापस लेने की जानकारी दी।
बीसीआई को दो सप्ताह के भीतर न्यायालय में जवाब दाखिल करना है।
सीजेआई ने छात्रों को सर्वोच्च न्यायालय बार में नामांकन और लीगल एड पैनल में शामिल होने का आमंत्रण दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 14 अगस्त 2026 को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की भूमिका पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय या लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों या फैकल्टी के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। यह आदेश नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के उन छात्रों से जुड़े विवाद के बाद आया है, जिन्हें बीसीआई ने वकील के रूप में पंजीकरण से वंचित करने का आदेश दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने नालसार यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के एक बैच के छात्रों को स्नातक वकील के रूप में पंजीकृत न करने का आदेश जारी किया था। इस आदेश के विरुद्ध विभिन्न विधि महाविद्यालयों में व्यापक विरोध हुआ और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने न्यायालय को बताया कि बीसीआई को किसी विश्वविद्यालय के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

सीजेआई की तीखी टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बीसीआई की दखलअंदाज़ी को 'बिल्कुल अनावश्यक' करार दिया। उन्होंने कहा, 'बीसीआई की दखलअंदाजी बिल्कुल अनावश्यक है। यह छात्रों और मेरे बीच संवाद है। वे कौन होते हैं इस मुद्दे को उठाने वाले?' सीजेआई ने यह भी कहा कि अपने छात्र जीवन में वह स्वयं सक्रिय रूप से छात्र गतिविधियों में भाग लेते थे और युवाओं को विरोध करने का अधिकार है — चाहे उनका बयान गलत भी हो। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'युवा उम्र में कोई व्यक्ति गलत बयान दे, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे विरोध करने का अधिकार नहीं है।'

न्यायालय का अंतरिम आदेश

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने नोटिस जारी करते हुए अंतरिम आदेश दिया कि किसी भी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय या लॉ यूनिवर्सिटी के छात्र अथवा शिक्षक के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। बीसीआई ने सुनवाई के दौरान नोटिस स्वीकार किया और न्यायालय को बताया गया कि विवादास्पद लंबित सर्कुलर वापस ले लिया गया है। न्यायालय ने बीसीआई को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

छात्रों को विशेष निमंत्रण

सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान उपस्थित छात्रों को सीधे संबोधित किया और उन्हें सर्वोच्च न्यायालय बार में नामांकन कराने और लीगल एड कोर्स के पैनल में शामिल होने का आमंत्रण दिया। यह संकेत है कि न्यायालय इन छात्रों के भविष्य को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है।

आगे क्या होगा

बीसीआई को दो सप्ताह में अपना पक्ष रखना है, जिसके बाद मामले की अगली सुनवाई होगी। तब तक नालसार सहित सभी विधि विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों को अंतरिम राहत मिली हुई है। यह मामला बीसीआई की नियामकीय सीमाओं और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के बीच की रेखा को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि बीसीआई की बढ़ती नियामकीय महत्वाकांक्षाओं पर न्यायपालिका की स्पष्ट चेतावनी है। बीसीआई का यह कदम — छात्रों को पंजीकरण से वंचित करना — विश्वविद्यालय स्वायत्तता और छात्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दोनों पर एक साथ प्रहार था। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब बीसीआई विधि शिक्षा के क्षेत्र में अपनी परिधि से बाहर कदम रखती दिखी है। असली सवाल यह है कि क्या दो सप्ताह बाद बीसीआई का जवाब इस हस्तक्षेप को वैधानिक आधार दे पाएगा — या न्यायालय नियामक सुधार का रास्ता खोलेगा।
RashtraPress
14 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नालसार और बीसीआई विवाद क्या है?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने नालसार यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के एक बैच के छात्रों को स्नातक वकील के रूप में पंजीकृत न करने का आदेश दिया था। इस आदेश के विरुद्ध व्यापक विरोध हुआ और मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में क्या आदेश दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अगस्त को अंतरिम आदेश देते हुए कहा कि किसी भी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय या लॉ यूनिवर्सिटी के छात्र या शिक्षक के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। बीसीआई को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
सीजेआई सूर्यकांत ने बीसीआई पर क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बीसीआई की दखलअंदाज़ी को 'बिल्कुल अनावश्यक' बताया और कहा कि छात्रों के विरोध के अधिकार में बीसीआई का कोई काम नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि युवा उम्र में गलत बयान देने से किसी का विरोध करने का अधिकार नहीं छिनता।
क्या बीसीआई का विवादास्पद सर्कुलर वापस लिया गया?
हाँ, सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया गया कि लंबित सर्कुलर वापस ले लिया गया है। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने बीसीआई से दो सप्ताह में औपचारिक जवाब माँगा है।
इस मामले का नालसार छात्रों के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?
अंतरिम आदेश के तहत छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक है। इसके अलावा सीजेआई ने छात्रों को सर्वोच्च न्यायालय बार में नामांकन और लीगल एड पैनल में शामिल होने का आमंत्रण दिया, जो उनके करियर के लिए सकारात्मक संकेत है।
राष्ट्र प्रेस
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