किताब विवाद पर नरवणे का बड़ा खुलासा: फाइनल ड्राफ्ट मैंने खुद नहीं देखा, सार्वजनिक कॉपी की प्रामाणिकता संदिग्ध
सारांश
Key Takeaways
- जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी किताब की फाइनल कॉपी स्वयं नहीं देखी है।
- सार्वजनिक रूप से वायरल हुई किताब की प्रति की प्रामाणिकता संदिग्ध है — प्रकाशक ने किसी आधिकारिक प्रति के सर्कुलेशन से इनकार किया।
- विवादित पंक्ति 'जो उचित समझो वो करो' में प्रधानमंत्री का नाम कहीं नहीं है: नरवणे।
- नरवणे जनवरी 2020 से अप्रैल 2022 तक थल सेनाध्यक्ष रहे और उनका कार्यकाल गलवान घाटी संघर्ष जैसी संवेदनशील घटनाओं से जुड़ा रहा।
- नरवणे ने कहा — सेना को ऑपरेशन में पूरी परिचालन स्वतंत्रता देना सरकार के विश्वास का प्रतीक है, इसे नकारात्मक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
- किताब की आधिकारिक प्रति बाजार में आने के बाद ही इस विवाद का निपटारा संभव होगा।
नई दिल्ली, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी चर्चित किताब को लेकर उठे विवाद पर पहली बार खुलकर अपना पक्ष रखा है। उन्होंने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में साफ कहा कि एक लेखक के तौर पर उन्होंने अपनी किताब की फाइनल कॉपी अभी तक खुद नहीं देखी है, और इसलिए जो प्रति सार्वजनिक रूप से सामने आई है, उसकी प्रामाणिकता पर वे कोई टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हैं।
नरवणे का स्पष्टीकरण — किताब कहां से आई, कुछ नहीं पता
जनरल नरवणे ने दो टूक शब्दों में कहा, "वह कौन सी किताब थी, कहां से आई — इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता।" उन्होंने यह भी बताया कि प्रकाशक की ओर से पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि किताब की कोई आधिकारिक प्रति न तो बाजार में उपलब्ध है और न ही किसी सार्वजनिक सर्कुलेशन में।
यह बयान उस समय आया है जब किताब में दर्ज एक पंक्ति 'जो उचित समझो वो करो' को लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी बयानबाजी शुरू हो गई थी। विपक्षी दलों ने इस वाक्य को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़कर सरकार पर निशाना साधा था।
विवादित पंक्ति और राजनीतिक बयानबाजी
नरवणे ने इस विवाद को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि किताब में कहीं भी प्रधानमंत्री का नाम नहीं लिया गया है। उन्होंने समझाया कि सेना को किसी भी ऑपरेशन के दौरान पूरी परिचालन स्वतंत्रता दी जाती है, जो इस बात का प्रतीक है कि सरकार सशस्त्र बलों पर पूर्ण विश्वास रखती है।
उन्होंने कहा, "इस बात को उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। लेकिन अगर कोई हर चीज को नकारात्मक दृष्टि से देखना चाहता है — जैसे ग्लास आधा खाली है या आधा भरा — तो फिर मैं क्या बोलूं।" यह बयान उनकी उस मनोदशा को दर्शाता है जिसमें वे राजनीतिक उपकरण बनाए जाने से स्वयं को अलग करना चाहते हैं।
गहरा संदर्भ — सेना और राजनीति का नाजुक रिश्ता
यह पहली बार नहीं है जब किसी पूर्व सेनाध्यक्ष की किताब या बयान राजनीतिक विवाद की वजह बनी हो। इससे पहले भी कई सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के संस्मरणों को राजनीतिक चश्मे से पढ़ा गया और उन्हें विवादों में घसीटा गया। यह प्रवृत्ति न केवल लेखक की मंशा को विकृत करती है, बल्कि सेना की संस्थागत गरिमा पर भी सवाल खड़े करती है।
गौरतलब है कि जनरल नरवणे जनवरी 2020 से अप्रैल 2022 तक थल सेनाध्यक्ष के पद पर रहे। उनका कार्यकाल गलवान घाटी संघर्ष (जून 2020) और पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ तनाव जैसी संवेदनशील घटनाओं से भरा रहा। ऐसे में उनकी किताब में दर्ज हर शब्द का बारीकी से विश्लेषण होना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक किताब की आधिकारिक और प्रमाणित प्रति सार्वजनिक नहीं होती, तब तक इस पर आधारित किसी भी राजनीतिक बयानबाजी को तथ्यहीन माना जाना चाहिए।
प्रकाशक की भूमिका और पारदर्शिता की मांग
प्रकाशक ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि किताब की कोई भी प्रति अभी तक आधिकारिक तौर पर जारी नहीं की गई है। इसका अर्थ यह है कि जो अंश या पंक्तियां सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आईं, उनकी स्रोत और सत्यता दोनों ही संदिग्ध हैं।
यह मामला इस बात की ओर भी ध्यान दिलाता है कि डिजिटल युग में अप्रमाणित सामग्री किस तेजी से वायरल होकर राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित कर सकती है। आने वाले दिनों में जब किताब की आधिकारिक प्रति बाजार में आएगी, तभी इस विवाद की असली परीक्षा होगी।