नवरात्र 2026: पश्चिम बंगाल के 13 प्रमुख शक्तिपीठ — आस्था, इतिहास और तांत्रिक साधना का संगम
सारांश
मुख्य बातें
नवरात्र 2026 के अवसर पर देशभर में मां दुर्गा की आराधना का उत्साह चरम पर है, और इस पर्व में पश्चिम बंगाल की विशेष महत्ता है — क्योंकि देश के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में यहाँ सर्वाधिक शक्तिपीठ स्थित हैं। 51 शक्तिपीठों में से एक बड़ी संख्या पश्चिम बंगाल में है, जहाँ श्रद्धालु बड़ी दूर-दूर से मां के दर्शन के लिए आते हैं। यह राज्य न केवल भक्ति की दृष्टि से, बल्कि तांत्रिक साधना के प्रमुख केंद्र के रूप में भी पूरे देश में विख्यात है।
शक्तिपीठों की पौराणिक पृष्ठभूमि
पुराणों के अनुसार, जब भगवान शिव अपनी पत्नी सती के शव को लेकर विलाप करते हुए ब्रह्मांड में घूम रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के विभिन्न अंगों को काट कर गिरा दिया। जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ बन गए। पश्चिम बंगाल में माता के अनेक अंग गिरे थे, इसीलिए यहाँ शक्तिपीठों की संख्या सर्वाधिक है।
प्रमुख शक्तिपीठ और उनकी विशेषताएँ
पूर्व मेदिनीपुर जिले के तामलुक में देवी कपालिनी का शक्तिपीठ है, जहाँ माता सती की बायीं एड़ी गिरी थी। यहाँ मां को भीमरूपा (वर्गा भीमा) तथा भगवान शिव को 'सर्वानंद' रूप में पूजा जाता है। 'कपालिनी' का अर्थ है — वह जो कपाल (खप्पर) धारण करती हैं। मान्यता है कि यहाँ पूजन से भक्तों को साहस, शक्ति और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है।
हुगली जिले के रत्नावली शक्तिपीठ में माता सती का दायां कंधा गिरा था। यहाँ मां को 'कुमारी' या 'आनंदमयी' और भगवान शिव को 'भैरव' रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है।
मुर्शीदाबाद जिले के किरीटकोण ग्राम में किरीटेश्वरी शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती का मुकुट गिरा था। यहाँ मां विमला देवी की पूजा होती है और भगवान शिव काल भैरव रूप में विराजमान हैं। विमला देवी का बीज मंत्र 'ॐ ह्रीं विमलायै नमः' है।
जलपाईगुड़ी जिले के सालबाढ़ी गाँव में मां भ्रामरी देवी का शक्तिपीठ है, जहाँ सती का बायां पैर गिरा था। तीस्ता नदी के घने जंगलों के बीच स्थित इस मंदिर में देवी 'भ्रामरी' और भैरव 'ईश्वर' स्वरूप में पूजे जाते हैं। मां भ्रामरी को कालिका या भद्रकाली का उग्र एवं करुणामय स्वरूप माना गया है, जो काले रंग की भ्रमरों से घिरी रहती हैं।
वर्धमान जिले के केतुग्राम में बहुला देवी शक्तिपीठ स्थित है, जहाँ माता सती का बायां हाथ गिरा था। यहाँ माता 'बहुला' और भगवान शिव 'भीरुक' (सर्वसिद्धिदायक) भैरव रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
वर्धमान जिले के ही उजानी गाँव में मंगल चंद्रिका माता शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती की दाहिनी कलाई गिरी थी। यहाँ देवी 'मंगल चंडी' और भैरव को 'कपिलांबर' कहा जाता है। यह मंदिर तांत्रिक साधना और विशेष अनुष्ठानों के लिए भी प्रसिद्ध है।
बीरभूम जिले के चार शक्तिपीठ
बीरभूम जिले में पापहर नदी के तट पर वक्रेश्वर शक्तिपीठ स्थित है, जहाँ देवी सती का भ्रूमध्य (भौंहों के बीच का भाग) गिरा था। यहाँ मां को 'महिषासुरमर्दिनी' और भगवान शिव को 'वक्रनाथ' रूप में पूजा जाता है।
नलहाटी शक्तिपीठ में देवी सती का कंठ (गला) गिरा था। यहाँ मां 'कालिका' और भैरव 'योगीश' रूप में पूजे जाते हैं। इस मंदिर की एक विशिष्ट मान्यता है कि माता के गले में चाहे जितना जल अर्पित किया जाए, वह न तो कभी भरता है और न ही सूखता है — बल्कि जल निगलने जैसी आवाज़ सुनाई देती है।
बीरभूम जिले के लाभपुर के पास फुल्लारा देवी शक्तिपीठ है, जिसे अट्टहास शक्तिपीठ भी कहा जाता है। यहाँ माता सती का निचला होठ गिरा था। यहाँ माता 'फुल्लरा' और भगवान शिव 'विश्वेश' रूप में पूजे जाते हैं। इस मंदिर में मूर्ति के स्थान पर लगभग 15 से 18 फीट लंबी एक विशाल प्राकृतिक शिला की पूजा की जाती है।
बीरभूम जिले के सैंथिया शहर में नंदीपुर शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती का कंठहार (गले का हार) गिरा था। यहाँ माता 'नंदिनी' और भगवान शिव 'नंदिकेश्वर' (भैरव) रूप में पूजे जाते हैं। यहाँ मां की मूर्ति एक बड़े वटवृक्ष के नीचे कछुए के आकार की सिंदूर लेपित चट्टान के रूप में विद्यमान है, जिस पर चाँदी का मुकुट और सोने की तीन आँखें सुशोभित हैं।
कालीघाट और कांची देवगर्भ — तांत्रिक साधना के महाकेंद्र
कोलकाता में स्थित कालीघाट शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में सर्वाधिक प्रसिद्ध धामों में से एक है। यहाँ माता सती के दाएं पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ देवी 'कालिका' और भैरव 'नकुशील' (नकुलेश्वर) रूप में पूजे जाते हैं। मां कालिका की प्रतिमा के तीन विशाल नेत्र, चार हाथ और सोने से मढ़ी हुई लंबी जीभ है। यह स्थान सामान्य भक्तों की आस्था के साथ-साथ तांत्रिक साधना के लिए भी अत्यंत शक्तिशाली केंद्र माना जाता है।
बीरभूम जिले में बोलपुर के पास कोपई नदी के तट पर कांची देवगर्भ शक्तिपीठ (कंकालिता मंदिर) स्थित है। यहाँ देवी की कमर या कंकाल गिरा था। यहाँ देवी को 'देवगर्भा' और भगवान शिव (भैरव) को 'रुरु' कहा जाता है। यह शक्तिपीठ तंत्र-मंत्र और साधना के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मंदिर के समीप ही श्मशान घाट है, जहाँ अनेक साधकों और तांत्रिकों ने सिद्धि प्राप्त की बताई जाती है।
वर्धमान का युगाधा शक्तिपीठ
वर्धमान जिले के क्षीरग्राम में युगाधा शक्तिपीठ स्थित है, जहाँ देवी सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी को 'युगाद्या' (भूतधात्री) और भगवान शिव (भैरव) को 'क्षीर कंठक' (क्षीरखंडक) रूप में पूजा जाता है। यहाँ एक विशेष मान्यता है कि देवी की असली प्रतिमा मंदिर के समीप स्थित 'क्षीरडिघी' नामक पवित्र तालाब के जल में निवास करती है।
नवरात्र के इस पावन पर्व पर पश्चिम बंगाल के ये शक्तिपीठ आस्था और अध्यात्म के जीवंत केंद्र बने हुए हैं — और आने वाले दिनों में यहाँ श्रद्धालुओं की संख्या और अधिक बढ़ने की संभावना है।