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नवरात्र 2026: पश्चिम बंगाल में हैं देश के सर्वाधिक शक्तिपीठ, कालीघाट से वक्रेश्वर तक तांत्रिक साधना के शक्तिशाली केंद्र

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नवरात्र 2026: पश्चिम बंगाल में हैं देश के सर्वाधिक शक्तिपीठ, कालीघाट से वक्रेश्वर तक तांत्रिक साधना के शक्तिशाली केंद्र

सारांश

नवरात्र 2026 में पश्चिम बंगाल एक बार फिर देश का आध्यात्मिक केंद्र बनने को तैयार है। कालीघाट से वक्रेश्वर तक, राज्य में 51 शक्तिपीठों की सर्वाधिक संख्या है — जहाँ आस्था और तांत्रिक परंपरा का संगम सदियों से अटूट है।

मुख्य बातें

पश्चिम बंगाल में देश के किसी भी राज्य से अधिक 51 शक्तिपीठों में से कई पवित्र धाम स्थित हैं।
नवरात्र 2026 का शुभारंभ 11 अक्टूबर को होगा और समापन 19 अक्टूबर को।
कालीघाट शक्तिपीठ (कोलकाता) सामान्य आस्था और तांत्रिक साधना दोनों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
बीरभूम जिले में अकेले वक्रेश्वर, नलहाटी, फुल्लारा, नंदीपुर और कांची देवगर्भ — पाँच प्रमुख शक्तिपीठ हैं।
फुल्लारा देवी मंदिर में मूर्ति के स्थान पर 15 से 18 फीट लंबी प्राकृतिक शिला की पूजा की जाती है।
नंदीपुर शक्तिपीठ में माँ की मूर्ति कछुए के आकार की चट्टान पर चाँदी के मुकुट और सोने की तीन आँखों के साथ विराजित है।

पश्चिम बंगाल में देश के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सर्वाधिक शक्तिपीठ स्थित हैं, और 11 अक्टूबर 2026 से शुरू हो रहे नवरात्र के अवसर पर लाखों श्रद्धालु इन पवित्र धामों में माँ के दर्शन के लिए उमड़ेंगे। 19 अक्टूबर तक चलने वाले इस पर्व में 51 शक्तिपीठों में से एक बड़ी संख्या बंगाल की धरती पर विद्यमान है, जो इसे शैव-शाक्त परंपरा का अप्रतिम केंद्र बनाती है। ये शक्तिपीठ आम आस्था के साथ-साथ तांत्रिक साधना के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।

पूर्व मेदिनीपुर और हुगली के शक्तिपीठ

पूर्व मेदिनीपुर जिले के तामलुक में देवी कपालिनी का मंदिर है, जहाँ माता सती की बायीं एड़ी गिरी थी। यहाँ माँ को भीमरूपा (वर्गा भीमा) और भगवान शिव को 'सर्वानंद' स्वरूप में पूजा जाता है। 'कपालिनी' का तात्पर्य कपाल अर्थात खप्पर धारण करने वाली देवी से है — मान्यता है कि माँ कपालिनी की उपासना से साहस, शक्ति और समस्त नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति मिलती है।

हुगली जिले में स्थित रत्नावली शक्तिपीठ में माँ कुमारी (आनंदमयी) का मंदिर है। यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ माता सती का दायाँ कंधा गिरा था। यहाँ भगवान शिव 'भैरव' रूप में विराजमान हैं।

मुर्शीदाबाद, जलपाईगुड़ी और वर्धमान के पावन धाम

मुर्शीदाबाद जिले के किरीटकोण ग्राम में किरीटेश्वरी शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती का मुकुट गिरा था। यहाँ माँ विमला देवी की पूजा होती है और भगवान शिव का काल भैरव रूप जुड़ा है। विमला देवी का बीज मंत्र 'ॐ ह्रीं विमलायै नमः' है।

जलपाईगुड़ी जिले के सालबाढ़ी गाँव में तीस्ता नदी के घने वनों के मध्य माँ भ्रामरी देवी का शांत मंदिर स्थित है। यहाँ देवी सती का बायाँ पैर गिरा था। माँ भ्रामरी को कालिका या भद्रकाली का उग्र एवं करुणामय स्वरूप माना गया है, जो काले भ्रमरों (मधुमक्खियों) से घिरी रहती हैं। यहाँ भैरव 'ईश्वर' स्वरूप में विराजमान हैं।

वर्धमान जिले के केतुग्राम में बहुला देवी शक्तिपीठ है, जहाँ माता सती का बायाँ हाथ गिरा था। यहाँ माता की पूजा 'मां बहुला' और शिव की 'भीरुक' (सर्वसिद्धिदायक) भैरव रूप में होती है। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से पूजा करने पर सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

वर्धमान के ही उजानी गाँव में मंगल चंद्रिका माता शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती की दाहिनी कलाई गिरी थी। यहाँ माँ दुर्गा के स्वरूप 'मंगल चंडी' और भैरव (शिव) को 'कपिलांबर' कहा जाता है। यह स्थान तांत्रिक साधना और विशेष अनुष्ठानों के लिए भी प्रसिद्ध है।

बीरभूम जिले के एकाधिक शक्तिपीठ

बीरभूम जिले में पापहर नदी के तट पर वक्रेश्वर शक्तिपीठ स्थित है, जहाँ देवी सती का भ्रूमध्य (भौंहों के बीच का भाग या 'मन') गिरा था। यहाँ माँ को 'महिषासुरमर्दिनी' और शिव को 'वक्रनाथ' के रूप में पूजा जाता है।

बीरभूम के नलहाटी में स्थित नलहाटी शक्तिपीठ में माँ को 'कालिका' और भैरव को 'योगीश' रूप में पूजा जाता है। यहाँ देवी सती का कंठ (गला) या उदर नली गिरी थी। इस मंदिर की एक अनूठी मान्यता है — माता के गले में कितना भी जल अर्पित किया जाए, वह न भरता है, न सूखता है, और जल निगलने जैसी ध्वनि सुनाई पड़ती है।

बीरभूम के लाभपुर के निकट फुल्लारा देवी शक्तिपीठ (अट्टहास शक्तिपीठ) है, जहाँ माता सती का निचला होठ गिरा था। यहाँ माँ को 'फुल्लरा' और शिव को 'विश्वेश' कहा जाता है। इस मंदिर में मूर्ति के स्थान पर लगभग 15 से 18 फीट लंबी एक विशाल प्राकृतिक शिला की पूजा की जाती है, जिसे माता का स्वरूप माना जाता है।

बीरभूम के सैंथिया शहर में नंदीपुर शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती का कंठहार (गले का हार) गिरा था। यहाँ माँ को 'नंदिनी' और शिव को 'नंदिकेश्वर' (भैरव) के रूप में पूजा जाता है। यहाँ माँ की मूर्ति एक बड़े वटवृक्ष के नीचे कछुए के आकार की सिंदूर लेपित चट्टान के रूप में है, जिस पर चाँदी का मुकुट और सोने की तीन आँखें सुशोभित हैं।

बोलपुर के निकट कोपई नदी के तट पर कांची देवगर्भ शक्तिपीठ (कंकालिता मंदिर) स्थित है, जहाँ देवी की कमर या कंकाल गिरा था। यहाँ देवी को 'देवगर्भा' और भैरव को 'रुरु' कहा जाता है। मंदिर के पास श्मशान घाट है, जहाँ अनेक साधकों और तांत्रिकों ने कथित तौर पर सिद्धि प्राप्त की है।

कालीघाट और युगाधा — सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ

कोलकाता स्थित कालीघाट शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण धामों में से एक है। यहाँ माता सती के दाएँ पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ देवी को 'कालिका' और भैरव को 'नकुशील' (नकुलेश्वर) के रूप में पूजा जाता है। माँ कालिका की प्रतिमा की तीन विशाल नेत्र, चार हाथ और सोने से मढ़ी हुई लंबी जीभ है; हाथों में खड्ग (तलवार) और असुर का कटा हुआ सिर सुशोभित है। यह स्थान सामान्य भक्तों की आस्था के साथ-साथ तांत्रिक साधना का अत्यंत शक्तिशाली केंद्र माना जाता है।

वर्धमान जिले के क्षीरग्राम में युगाधा शक्तिपीठ है, जहाँ देवी सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी को 'युगाद्या' (भूतधात्री) और भैरव को 'क्षीर कंठक' (क्षीरखंडक) के रूप में पूजा जाता है। एक विशिष्ट मान्यता के अनुसार देवी की असली प्रतिमा मंदिर के निकट 'क्षीरडिघी' नामक पवित्र तालाब के जल में निवास करती है।

नवरात्र 2026 और श्रद्धालुओं की आस्था

इस वर्ष 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर 2026 तक चलने वाले नवरात्र पर्व में पश्चिम बंगाल के इन शक्तिपीठों पर देशभर से श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। धार्मिक परंपराओं के जानकारों के अनुसार, बंगाल की शाक्त परंपरा वैदिक और तांत्रिक — दोनों धाराओं का संगम है, जो इन शक्तिपीठों को आध्यात्मिक दृष्टि से असाधारण महत्त्व प्रदान करती है। आने वाले दिनों में इन मंदिरों में विशेष पूजा-अनुष्ठान और तांत्रिक साधनाएँ आयोजित की जाएंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की शाक्त-तांत्रिक परंपरा की जीवंत निरंतरता का प्रमाण है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर केवल कालीघाट पर केंद्रित रहती है, जबकि बीरभूम और जलपाईगुड़ी के सुदूर मंदिर वैसी ही गहरी आस्था और दुर्लभ पुरातात्त्विक महत्त्व रखते हैं। नवरात्र जैसे बड़े पर्वों पर इन स्थलों पर श्रद्धालुओं का दबाव और बुनियादी ढाँचे की स्थिति भी विचारणीय पहलू है, जिस पर प्रशासनिक तैयारी की पड़ताल ज़रूरी है।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल में कुल कितने शक्तिपीठ हैं?
पश्चिम बंगाल में देश के 51 शक्तिपीठों में से सर्वाधिक शक्तिपीठ स्थित हैं, जिनमें कालीघाट, वक्रेश्वर, नलहाटी, फुल्लारा, नंदीपुर, बहुला देवी, युगाधा, भ्रामरी, रत्नावली, कपालिनी, किरीटेश्वरी, मंगल चंद्रिका और कांची देवगर्भ प्रमुख हैं।
नवरात्र 2026 कब से कब तक है?
नवरात्र 2026 का शुभारंभ 11 अक्टूबर को होगा और समापन 19 अक्टूबर को होगा। इन नौ दिनों में देशभर में देवी के मंदिरों में विशेष पूजा-अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
कालीघाट शक्तिपीठ इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?
कालीघाट शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण धाम है, जहाँ माता सती के दाएँ पैर का अंगूठा गिरा था। यह स्थान सामान्य भक्तों की आस्था के साथ-साथ तांत्रिक साधना के लिए भी अत्यंत शक्तिशाली केंद्र माना जाता है।
बीरभूम जिले में कौन-कौन से शक्तिपीठ हैं?
बीरभूम जिले में वक्रेश्वर, नलहाटी, फुल्लारा देवी (अट्टहास), नंदीपुर और कांची देवगर्भ (कंकालिता) — पाँच प्रमुख शक्तिपीठ हैं। यह जिला शाक्त और तांत्रिक परंपरा का विशेष केंद्र माना जाता है।
फुल्लारा देवी मंदिर में मूर्ति के स्थान पर क्या पूजा होती है?
फुल्लारा देवी शक्तिपीठ (अट्टहास) में मूर्ति के स्थान पर लगभग 15 से 18 फीट लंबी एक विशाल प्राकृतिक शिला (पत्थर) की पूजा की जाती है, जिसे माता का स्वरूप माना जाता है। यहाँ माता सती का निचला होठ गिरा था।
राष्ट्र प्रेस
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