नवरात्रि पर विशेष: काशी का शक्तिपीठ, जहां गिरे थे माता सती के कर्णफूल
सारांश
Key Takeaways
- विशालाक्षी शक्तिपीठ काशी में स्थित प्रमुख शक्तिपीठ है।
- यहां देवी सती का कर्णकुंडल गिरा था।
- मंदिर में चल और अचल दोनों प्रतिमाओं की पूजा होती है।
- विशालाक्षी मंदिर का पुनर्निर्माण विजयनगर साम्राज्य के समय हुआ।
- नवरात्रि पर यहाँ विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।
वाराणसी, १६ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। आदि शक्ति की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित पर्व चैत्र नवरात्रि १९ मार्च से शुरू होने जा रहा है। देशभर में माता के कई दिव्य स्थान हैं, जहाँ वह विभिन्न रूपों में विराजमान हैं। ऐसा ही एक प्रमुख स्थान काशी है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहाँ भगवती सती का कर्णकुंडल गिरा था।
देवी सती के शरीर के अंगों के गिरने की जगहों पर शक्तिपीठों की स्थापना की गई। काशी में भगवती सती का कर्णकुंडल गिरने के कारण इसे विशालाक्षी धाम के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि जैसे विशेष दिनों पर यहाँ देवी के दर्शन और पूजा का विशेष महत्व है।
उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, विशालाक्षी देवी मंदिर वाराणसी का एक प्रमुख शक्तिपीठ है। यह शिव और शक्ति की संयुक्त पूजा का अद्वितीय केंद्र है। सदियों से यह स्थान भक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि के पावन अवसर पर भक्त यहाँ मां के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं।
विशालाक्षी शक्तिपीठ वाराणसी के दशाश्वमेध घाट के मीरघाट में स्थित है। यह पवित्र स्थान मणिकर्णिका घाट से कुछ दूरी पर है। इस मंदिर को मां विशालाक्षी गौरी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। काशी में यह मंदिर भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ से काशी विश्वनाथ मंदिर और अन्नपूर्णा मंदिर भी निकट हैं।
विशालाक्षी का यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला में निर्मित है। इतिहासकारों का मानना है कि इसका पुनर्निर्माण विजयनगर साम्राज्य के शासकों द्वारा किया गया था। आदि शंकराचार्य ने ८वीं शताब्दी में यहाँ श्रीयंत्र स्थापित किया था, और १९०८ में दक्षिण भारतीय भक्तों ने मंदिर का जीर्णोद्धार किया।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान देखकर देवी सती ने आत्मदाह कर लिया। भगवान शिव ने सती के शरीर को कंधे पर उठाकर पूरे ब्रह्मांड में भ्रमण किया। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, जिन्होंने सती के शरीर को सुदर्शन चक्र से 51 टुकड़ों में काट दिया। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। वाराणसी में कर्णफूल गिरने से यह स्थान विशालाक्षी शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस शक्तिपीठ के समीप काल भैरव भी विराजमान हैं।
विशालाक्षी मंदिर में मां की दो प्रतिमाएं हैं, एक चल (चलने वाली) और दूसरी अचल (स्थिर)। दोनों की पूजा समान रूप से होती है। मां विशालाक्षी की श्याम रंग की प्रतिमा अत्यंत मनमोहक है। नवरात्रि के दौरान चल मूर्ति की विशेष पूजा विजयादशमी के दिन घोड़े पर सवार होकर की जाती है। अचल मूर्ति की विशेष पूजा साल में दो बार होती है: पहली बार भादों मास की कृष्ण पक्ष की तृतीया (कजरी तीज) को और दूसरी बार दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट के रूप में। मंदिर में दक्षिण भारतीय पूजा पद्धति अपनाई जाती है, जिससे बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन के लिए आते हैं।
कैंट रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग ३ से ५ किलोमीटर है। यहाँ जाने के लिए गौदौलिया या दशाश्वमेध का पब्लिक व्हीकल या कैब बुक कर पहुंचा जा सकता है। वहीं, लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट (बाबतपुर एयरपोर्ट) से मंदिर की दूरी लगभग २७ किलोमीटर है।