नई vs पुरानी आयकर व्यवस्था 2026-27: सैलरीड कर्मचारियों के लिए कौन सा विकल्प देगा ज्यादा बचत?
सारांश
Key Takeaways
- वित्त वर्ष 2026-27 से सैलरीड कर्मचारियों को पुरानी या नई टैक्स व्यवस्था में से एक चुनना अनिवार्य है।
- नई टैक्स व्यवस्था में ₹4 लाख तक की आय टैक्स फ्री है और ₹12.75 लाख तक की आय पर देनदारी शून्य हो सकती है।
- 1 अप्रैल 2026 से बच्चों का शिक्षा भत्ता ₹3,000 प्रति माह और हॉस्टल भत्ता ₹9,000 प्रति माह किया गया।
- अहमदाबाद, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे को हाई HRA कैटेगरी में शामिल किया गया।
- ITR-3 और ITR-4 की फाइलिंग की अंतिम तिथि बढ़ाकर 31 अगस्त की गई।
- ₹4-5 लाख से अधिक डिडक्शन क्लेम करने वालों के लिए पुरानी टैक्स व्यवस्था अधिक फायदेमंद रहेगी।
नई दिल्ली, 26 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत के साथ ही देशभर के सैलरीड कर्मचारियों के सामने एक अहम सवाल खड़ा हो गया है — पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनें या नई टैक्स व्यवस्था? यह निर्णय न केवल सालाना टैक्स देनदारी तय करता है, बल्कि हर महीने घर आने वाली टेक-होम सैलरी को भी सीधे प्रभावित करता है। आय, निवेश की आदत और उपलब्ध डिडक्शन — इन तीन कारकों पर निर्भर करता है कि आपके लिए कौन सा विकल्प सही रहेगा।
पुरानी टैक्स व्यवस्था: छूट और डिडक्शन का लाभ
पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) उन करदाताओं के लिए बनी है जो नियमित रूप से निवेश करते हैं और विभिन्न कटौतियों का लाभ उठाते हैं। इसमें सेक्शन 80सी के तहत निवेश, 80डी के तहत स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम, होम लोन ब्याज, HRA और LTA जैसी कई छूटें मिलती हैं।
इस व्यवस्था में ₹2.5 लाख तक की आय पर कोई कर नहीं, ₹2.5 लाख से ₹5 लाख पर 5%25, ₹5 लाख से ₹10 लाख पर 20%25 और ₹10 लाख से ऊपर की आय पर 30%25 की दर से टैक्स लगता है। टैक्स दरें अधिक हैं, लेकिन डिडक्शन से वास्तविक देनदारी घटाई जा सकती है।
नई टैक्स व्यवस्था: कम दरें, कम झंझट
नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) में टैक्स स्लैब अधिक सरल और दरें कम हैं, लेकिन अधिकांश छूट और डिडक्शन समाप्त कर दिए गए हैं। इसमें ₹4 लाख तक की आय पूरी तरह टैक्स फ्री है।
इसके बाद ₹4–8 लाख पर 5%25, ₹8–12 लाख पर 10%25, ₹12–16 लाख पर 15%25, ₹16–20 लाख पर 20%25, ₹20–24 लाख पर 25%25 और ₹24 लाख से ऊपर 30%25 टैक्स लागू होता है। जिन करदाताओं की वार्षिक आय ₹12.75 लाख तक है, उनके लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन और सेक्शन 87ए की छूट के बाद कर देनदारी शून्य हो सकती है।
आपके लिए कौन सा विकल्प बेहतर?
अगर आप ₹4–5 लाख या उससे अधिक के डिडक्शन क्लेम करते हैं — जैसे 80सी में पीपीएफ, ईपीएफ, एलआईसी; 80डी में मेडिकल इंश्योरेंस; HRA और होम लोन ब्याज — तो पुरानी व्यवस्था अधिक फायदेमंद साबित होगी। यह विकल्प खासतौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों और गृहस्वामियों के लिए उपयुक्त है।
वहीं जो लोग टैक्स सेविंग निवेश नहीं करते या अधिक इन-हैंड सैलरी चाहते हैं, उनके लिए नई व्यवस्था सरल और लाभदायक है। युवा कर्मचारी जो अभी निवेश की शुरुआत में हैं, उनके लिए नई व्यवस्था बेहतर विकल्प मानी जा रही है।
1 अप्रैल 2026 से लागू नए बदलाव
1 अप्रैल 2026 से पुरानी टैक्स व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव लागू हुए हैं। अब भोजन भत्ता (Meal Allowance) की सीमा ₹50 से बढ़ाकर ₹200 प्रति भोजन कर दी गई है। गिफ्ट वाउचर और कूपन अब ₹15,000 सालाना तक टैक्स फ्री होंगे।
अहमदाबाद, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे को अब हाई HRA कैटेगरी में शामिल किया गया है, जिससे इन शहरों के कर्मचारियों को अधिक HRA छूट मिलेगी। बच्चों की शिक्षा भत्ता ₹100 से बढ़ाकर ₹3,000 प्रति माह और हॉस्टल खर्च भत्ता ₹300 से बढ़ाकर ₹9,000 प्रति माह किया गया है।
ट्रांसपोर्ट अलाउंस को भी संशोधित कर ₹25,000 प्रति माह किया गया है। कंपनी द्वारा दिए गए वाहन पर टैक्स अब इंजन क्षमता के आधार पर निर्धारित होगा।
ITR फाइलिंग की समयसीमा और आगे की राह
बजट 2026 के तहत ITR-3 और ITR-4 दाखिल करने की अंतिम तिथि बढ़ाकर 31 अगस्त कर दी गई है। हालांकि, आयकर कानून में हाल ही में किए गए कुछ बदलाव वित्त वर्ष 2026-27 की फाइलिंग पर तत्काल प्रभाव नहीं डालेंगे — ये जून-जुलाई 2027 में रिटर्न भरते समय लागू होंगे।
विशेषज्ञों की सलाह है कि करदाता अप्रैल में ही अपने नियोक्ता को सही टैक्स व्यवस्था का विकल्प दें, ताकि पूरे वर्ष TDS सही कटे और मार्च में एकमुश्त टैक्स देनदारी का बोझ न पड़े। वित्त वर्ष 2026-27 में सही टैक्स व्यवस्था का चुनाव आपकी जेब पर हजारों रुपए का फर्क डाल सकता है।