कांग्रेस सांसद आर. सुधा ने राष्ट्रपति मुर्मु को पत्र लिखकर पेरारिवलन का बार पंजीकरण रद्द करने की मांग की
सारांश
Key Takeaways
- कांग्रेस सांसद आर. सुधा ने 29 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखकर एजी पेरारिवलन का बार पंजीकरण रद्द करने की मांग की।
- पेरारिवलन का पंजीकरण 27 अप्रैल को हुआ, जिसे सुधा ने न्यायिक इतिहास का 'काला दिन' बताया।
- सुधा ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24ए का हवाला देते हुए गंभीर अपराधों के दोषियों के पंजीकरण पर सवाल उठाया।
- आवेदन छह महीने से अधिक लंबित रहने के बाद अचानक स्वीकृत हुआ — सांसद ने इसमें अनुचित जल्दबाजी का आरोप लगाया।
- मामले को मद्रास उच्च न्यायालय की उच्च पीठ को भेजने और स्वतंत्र जाँच की भी मांग की गई।
कांग्रेस सांसद आर. सुधा ने राजीव गांधी हत्याकांड के दोषी एजी पेरारिवलन के तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल में वकील के रूप में पंजीकरण का कड़ा विरोध करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखा है और यह पंजीकरण तत्काल रद्द करने की मांग की है। 29 अप्रैल को लिखे इस पत्र में सुधा ने 27 अप्रैल — जिस दिन पेरारिवलन का पंजीकरण हुआ — को देश के न्यायिक इतिहास का काला दिन करार दिया। यह मामला न्यायिक नैतिकता और विधि पेशे की गरिमा को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म दे रहा है।
मुख्य घटनाक्रम
पेरारिवलन को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। बाद में अनुच्छेद 161 के तहत उनकी सजा माफी याचिका पर निर्णय में अत्यधिक देरी का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर उन्हें रिहा किया गया था। रिहाई के बाद उन्होंने बार में शामिल होने के लिए आवेदन किया, जो छह महीने से अधिक समय तक लंबित रहने के बाद अचानक स्वीकृत कर दिया गया।
कानूनी आधार और सांसद के तर्क
कांग्रेस सांसद सुधा ने अपने पत्र में अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24ए का हवाला दिया, जो कुछ अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को सजा पूरी होने के बाद दो वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण से रोकती है। उन्होंने तर्क दिया कि गंभीर अपराधों के दोषियों — विशेष रूप से प्रतिबंधित संगठन एलटीटीई से जुड़े व्यक्तियों — के मामले में इस प्रावधान को 'अंधाधुंध लागू' नहीं किया जाना चाहिए।
प्रक्रिया संबंधी सवाल
सुधा ने मौजूदा बार काउंसिल के नामांकन करने के अधिकार पर भी गंभीर सवाल उठाए। उनके अनुसार नई काउंसिल के चुनाव संपन्न होने के बाद मौजूदा पदाधिकारियों का पद प्रभावी रूप से समाप्त हो चुका है। उन्होंने पूछा कि जब तक नई संस्था कार्यभार ग्रहण नहीं कर लेती, तब तक पद छोड़ने वाले सदस्य इतने महत्वपूर्ण नामांकन की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ा सकते हैं।
स्वतंत्र जांच और उच्च पीठ की मांग
सांसद ने यह भी आग्रह किया कि इस मामले को मद्रास उच्च न्यायालय की एक उच्च पीठ को भेजा जाए, जो वर्तमान में आपराधिक मामलों में लंबित व्यक्तियों के विधि पेशे में पंजीकरण से संबंधित एक मामले की जाँच कर रही है। इसके साथ ही उन्होंने इस फैसले के कारणों की जाँच के लिए एक स्वतंत्र जाँच की भी मांग की, यह आरोप लगाते हुए कि आवेदन स्वीकृति में संभावित अनुचित जल्दबाजी बरती गई।
आगे की स्थिति
गौरतलब है कि यह मामला ऐसे समय में उठा है जब विधि पेशे में दोषसिद्ध व्यक्तियों के प्रवेश को लेकर देशभर में बहस तेज हो रही है। राष्ट्रपति कार्यालय और बार काउंसिल की प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है, लेकिन इस पत्र के बाद इस विषय पर न्यायिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर हलचल बढ़ने की संभावना है।