फुरसुंगी कचरा संकट: सांसद सुप्रिया सुले ने सरकार को घेरा, हर महीने समीक्षा का ऐलान
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने 1 सितंबर को पुणे के फुरसुंगी क्षेत्र में बढ़ते कचरा डंपिंग संकट पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह समस्या लगातार विकराल रूप लेती जा रही है और प्रशासन की निष्क्रियता अब स्वीकार्य नहीं है। सुले ने चेतावनी दी कि जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होती, वे हर महीने इस मुद्दे की सार्वजनिक समीक्षा करती रहेंगी।
फुरसुंगी में कचरे की स्थिति और सुले की माँग
सुले के अनुसार, फुरसुंगी का कचरा डंपिंग क्षेत्र अब गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का केंद्र बन चुका है। उन्होंने बताया कि वे इस मुद्दे पर सरकारी अधिकारियों से मिल चुकी हैं और 15 दिन बाद पुनः बैठक निर्धारित है। उनका कहना है कि अब इस समस्या की मासिक समीक्षा की जाएगी ताकि सरकार पर निरंतर दबाव बना रहे और मामला ठंडे बस्ते में न जाए।
आदित्य ठाकरे की एफआईआर पर पक्षपात का आरोप
सुले ने आदित्य ठाकरे के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर सरकार पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि सत्ता में बैठे लोग युवाओं और आम नागरिकों के विरुद्ध तो तत्परता से कानूनी कार्रवाई करते हैं, परंतु राजनीतिक रसूख रखने वालों को संरक्षण मिलता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिन नेताओं पर पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) जैसी केंद्रीय एजेंसियाँ लगाई गईं, बाद में उन्हीं को राजनीतिक गठबंधन में शामिल कर लिया गया।
GDP आँकड़ों पर सवाल, महंगाई और बेरोज़गारी की चिंता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीडीपी वृद्धि संबंधी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए सुले ने कहा कि सरकारी आँकड़ों से ज़्यादा ज़मीनी हकीकत महत्वपूर्ण है। उन्होंने महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार को आम जनता की असली पीड़ा बताया। रोज़मर्रा की ज़रूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों, खाद्य महंगाई और टैक्सी-रिक्शा किराए में वृद्धि का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ये संकेत स्पष्ट करते हैं कि आर्थिक नीतियों का लाभ आम नागरिक तक नहीं पहुँच रहा।
डीजे प्रतिबंध और त्योहारी विवाद
आगामी त्योहारों के दौरान डीजे पर प्रतिबंध को लेकर उठ रहे विरोध पर सुले ने मुख्यमंत्री से सीधे हस्तक्षेप की माँग की। उनका सुझाव था कि सभी पक्षों को साथ लेकर बातचीत से मध्यमार्ग निकाला जाए, जिससे त्योहारों का उत्साह भी बना रहे और सामाजिक सौहार्द भी न बिगड़े।
आरक्षण, परिसीमन और महाराष्ट्र में बढ़ते आंदोलन
सुले ने महिला आरक्षण विधेयक का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने संसद में इसे सर्वसम्मति से पारित कराने में सहयोग दिया था, लेकिन अब इसे केवल वादों तक सीमित रखना स्वीकार्य नहीं — ज़मीनी क्रियान्वयन ज़रूरी है। मनोज जरांगे के मराठा आरक्षण अनशन का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में एक साथ ओबीसी समाज, आदिवासी छात्र, पेपर लीक पीड़ित और महिलाएँ — सभी सड़कों पर हैं। उनके अनुसार, यह स्थिति राज्य सरकार की संपूर्ण विफलता का प्रमाण है। यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ ज़ोर पकड़ रही हैं और विपक्ष सत्तापक्ष को घेरने की हर कोशिश कर रहा है।