7 अक्टूबर 2026
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PM मोदी ने एक्स पर साझा किया महाभारत का श्लोक: 'सेवा में निष्ठा ही सर्वश्रेष्ठ पुण्यकर्म'

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PM मोदी ने एक्स पर साझा किया महाभारत का श्लोक: 'सेवा में निष्ठा ही सर्वश्रेष्ठ पुण्यकर्म'

सारांश

प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार को एक्स पर महाभारत के शांतिपर्व का श्लोक साझा किया — 'नित्यं परिचरेच्चैव…' — जो निःस्वार्थ सेवा को जीवन का सर्वश्रेष्ठ पुण्यकर्म बताता है। एक दिन पहले महाराजा भोज के 'समराङ्गणसूत्रधार' से शील पर श्लोक साझा हुआ था।

मुख्य बातें

PM मोदी ने 7 अक्टूबर 2026 को एक्स पर महाभारत के शांतिपर्व का संस्कृत श्लोक साझा किया।
श्लोक का संदेश: निःस्वार्थ सेवा और कर्तव्यपालन ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ पुण्यकर्म है।
इससे एक दिन पूर्व 6 अक्टूबर को महाराजा भोज रचित 'समराङ्गणसूत्रधार' के 44वें अध्याय का श्लोक साझा किया गया था।
वह श्लोक चरित्र (शील) को ज्ञान, वाणी और कर्मकुशलता से भी अधिक महत्त्वपूर्ण बताता है।
प्रधानमंत्री मोदी नियमित रूप से एक्स पर प्राचीन भारतीय ग्रंथों के सुभाषित साझा करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया, जिसमें निःस्वार्थ सेवा और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का सर्वोच्च पुण्य कर्म बताया गया है। यह श्लोक महाभारत के शांतिपर्व से लिया गया है और समाज में सेवाभाव की अनिवार्यता पर प्रकाश डालता है।

साझा किया गया सुभाषित

प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर लिखा — 'नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम।।' इस श्लोक का भावार्थ है कि व्यक्ति को प्रतिदिन समर्पित भाव से सेवा एवं कर्तव्य का पालन करना चाहिए, क्योंकि यही सर्वश्रेष्ठ सत्कर्म है। ऐसा करने वाले को संसार में कीर्ति, पुण्य, यश और उच्च प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

श्लोक का संदर्भ और महत्व

महाभारत के शांतिपर्व से उद्धृत यह श्लोक निःस्वार्थ सेवा, कर्तव्यपरायणता और सदाचार के महत्व को रेखांकित करता है। इसमें विशेष रूप से राजाओं और नेताओं को संबोधित करते हुए कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के लोक-कल्याण और सेवाकार्यों में निरंतर लगा रहता है, तो उसे समाज में अपार आदर और अमर कीर्ति प्राप्त होती है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी नियमित रूप से प्राचीन भारतीय ग्रंथों से सुभाषित साझा करते रहे हैं।

पिछले दिन का सुभाषित

इससे एक दिन पूर्व, मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने एक अन्य संस्कृत श्लोक साझा किया था — 'ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥' यह श्लोक महाराजा भोज रचित वास्तुशास्त्र ग्रंथ 'समराङ्गणसूत्रधार' के 44वें अध्याय का 16वाँ श्लोक है।

उस श्लोक का आशय था कि कोई व्यक्ति चाहे कितना भी ज्ञानी, वक्ता और कर्मनिष्ठ हो — यदि उसमें सदाचार और शील का अभाव है, तो वह समाज में वास्तव में आदरणीय नहीं माना जा सकता। यह संदेश चरित्र की प्राथमिकता को योग्यता से ऊपर रखता है।

व्यापक परिप्रेक्ष्य

यह ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और सेवाभाव की बहस देश में प्रासंगिक बनी हुई है। प्रधानमंत्री द्वारा प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को डिजिटल माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का यह क्रम निरंतर जारी है। इन सुभाषितों के माध्यम से वे सेवा, ज्ञान और सदाचार — तीनों को जोड़कर एक समग्र जीवनदर्शन प्रस्तुत कर रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो इसे केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी बनाता है। हालाँकि, मुख्यधारा की कवरेज इन सुभाषितों को अक्सर सांकेतिक मानकर छोड़ देती है — जबकि ये सत्ता के सार्वजनिक आख्यान को गढ़ने का एक सुनियोजित प्रयास हैं।
RashtraPress
7 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी ने 7 अक्टूबर को कौन-सा सुभाषित साझा किया?
प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर महाभारत के शांतिपर्व का श्लोक 'नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्…' साझा किया। इस श्लोक में निःस्वार्थ भाव से सेवा करते रहने को जीवन का सर्वश्रेष्ठ पुण्यकर्म बताया गया है।
यह श्लोक किस ग्रंथ से लिया गया है?
यह श्लोक महाभारत के शांतिपर्व से उद्धृत है, जो नीति, राजधर्म और जीवनदर्शन से संबंधित सबसे विस्तृत पर्वों में से एक है। इसमें विशेष रूप से राजाओं और नेताओं के लिए कर्तव्यपालन का संदेश दिया गया है।
मंगलवार को PM मोदी ने कौन-सा श्लोक साझा किया था?
मंगलवार, 6 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने महाराजा भोज रचित 'समराङ्गणसूत्रधार' के 44वें अध्याय का 16वाँ श्लोक साझा किया था। उस श्लोक में कहा गया कि ज्ञान, वाणी और कर्मकुशलता से भी बड़ा शील (सदाचार) है — बिना शील के व्यक्ति आदरणीय नहीं हो सकता।
PM मोदी के इन सुभाषितों का क्या महत्व है?
प्रधानमंत्री मोदी नियमित रूप से प्राचीन भारतीय ग्रंथों से संस्कृत सुभाषित साझा करते हैं, जिससे वे सेवाभाव, सदाचार और राष्ट्रसेवा के मूल्यों को डिजिटल माध्यम से आम जनता तक पहुँचाते हैं। यह उनके सार्वजनिक संवाद का एक नियमित और सुनियोजित हिस्सा बन चुका है।
'समराङ्गणसूत्रधार' क्या है?
'समराङ्गणसूत्रधार' महाराजा भोज द्वारा रचित एक प्रसिद्ध वास्तुशास्त्र ग्रंथ है। इसके 44वें अध्याय में चरित्र और सदाचार के महत्व पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है।
राष्ट्र प्रेस
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