क्या प्रणब मुखर्जी राजनीति के 'चाणक्य' थे, जो पीएम पद की दौड़ में शामिल रहे लेकिन हर बार चूके?

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क्या प्रणब मुखर्जी राजनीति के 'चाणक्य' थे, जो पीएम पद की दौड़ में शामिल रहे लेकिन हर बार चूके?

सारांश

प्रणब मुखर्जी, भारत के 13वें राष्ट्रपति, एक ऐसे नेता थे जो हमेशा सच बोलने में विश्वास रखते थे। उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा कई बार अधूरी रह गई। जानिए उनकी राजनीतिक यात्रा और चुनौतियों के बारे में।

Key Takeaways

  • प्रणब मुखर्जी ने सच बोलने की आदत से कई बार राजनीतिक चुनौतियों का सामना किया।
  • उनकी प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा अधूरी रह गई, लेकिन वे भारतीय राजनीति के स्तंभ बने।
  • राजीव गांधी के साथ उनके मतभेद ने उनके राजनीतिक सफर को प्रभावित किया।
  • प्रणब मुखर्जी का अनुभव और विनम्रता उन्हें विशिष्ट बनाती है।
  • उनकी कहानी हमें महत्वपूर्ण सबक सिखाती है कि राजनीति में संबंध और सामंजस्य की आवश्यकता होती है।

नई दिल्ली, 30 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। भारत के 13वें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को यह माना जाता था कि वे कभी भी 'सच को सच' कहने में संकोच नहीं करते थे। इस स्वभाव के चलते उन्हें अपने राजनीतिक सफर में कुछ नुकसान भी उठाना पड़ा। कांग्रेस में इंदिरा गांधी के प्रियतम होने के बावजूद, प्रणब मुखर्जी की भारत के प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा अधूरी रह गई।

कांग्रेस में एक रोचक किस्सा है कि 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद प्रणब मुखर्जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं चर्चा में आई थीं। उस समय प्रधानमंत्री का पद रिक्त हो गया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद इस पद के लिए नाम तय करना कठिन काम बन गया था। उस समय वरिष्ठता की सूची में प्रणब मुखर्जी थे और उन्हें स्वाभाविक दावेदार माना गया। इसके पीछे इंदिरा गांधी के साथ उनके अच्छे संबंध थे।

हालांकि, उसी समय प्रणब मुखर्जी और राजीव गांधी के बीच मतभेद की चर्चाएं भी थीं। लेखक रशीद किदवई ने अपनी किताब '24 अकबर रोड' में लिखा है, "एक विवरण यह है कि इंदिरा गांधी की मौत के कारण प्रणब मुखर्जी विमान के टॉयलेट में जाकर रोए। उनकी आँखें लाल हो गई थीं। वे विमान के पिछले हिस्से में जाकर बैठ गए, लेकिन कांग्रेस में उनके विरोधियों ने इसे राजीव गांधी के खिलाफ उनकी साजिश के रूप में प्रस्तुत किया।"

एक और विवरण में कहा गया है कि राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी के निधन के बाद प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की थी। राजीव ने प्रधानमंत्री पद को लेकर चर्चा की थी, तो प्रणब ने वरिष्ठता पर जोर दिया। प्रणब के इस भाव को बाद में उनकी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा के रूप में देखा गया।

हालांकि, जब राजीव गांधी खुद प्रधानमंत्री बने, तो इंदिरा गांधी के बाद नंबर दो की हैसियत वाले प्रणब मुखर्जी को उनकी कैबिनेट में स्थान नहीं मिला।

फिर भी, प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा के दूसरे खंड 'द टर्बुलेंट इयर्स: 1980-1996' में प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के दावों को खारिज किया। उन्होंने कहा, "इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मैंने कभी राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की कोशिश नहीं की।"

प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी के सबसे विश्वसनीय सहयोगी थे, लेकिन राजीव गांधी के साथ मतभेद के कारण उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी। बाद में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें फिर से पार्टी में शामिल किया।

इसके बाद दो और अवसर आए जब 'प्रणब दा' शीर्ष पद पाने से चूके। 1991 के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला और प्रणब मुखर्जी फिर से प्रधानमंत्री पद की रेस में थे, लेकिन उनकी 'अति महत्वाकांक्षी' छवि उनके खिलाफ गई। सोनिया गांधी ने इस बार भी उनका समर्थन नहीं किया और पी. वी. नरसिंह राव को प्रधानमंत्री बना दिया।

बाद में प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "उन्होंने सत्ता के दो पहलुओं से निपटना सीख लिया था। असफलताओं और बुरे समय ने उन्हें साहस सिखाया, जबकि सफलता ने उन्हें विनम्र बनाया।"

2004 में प्रणब मुखर्जी के लिए फिर एक बड़ा अवसर आया। सोनिया गांधी ने विदेशी मूल के कारण पीएम पद ठुकरा दिया, जिससे कयास लगाए गए कि अनुभवी प्रणब मुखर्जी को मौका मिलेगा। लेकिन सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया।

प्रणब मुखर्जी ने अपनी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी से कहा था कि सोनिया गांधी उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाएंगी। शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपनी किताब 'प्रणब माई फादर: ए डॉटर रिमेम्बर्स' में इस बातचीत का उल्लेख किया।

प्रणब मुखर्जी एक ऐसे राजनेता थे जो सत्ता के बेहद करीब होते हुए भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुँच पाए। लेकिन उनके अनुभव, संतुलन और दूरदृष्टि ने उन्हें भारतीय राजनीति का एक स्तंभ बना दिया। मुखर्जी ने 25 जुलाई 2012 को भारत के 13वें राष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण किया। इससे पहले, वे पांच बार राज्यसभा और दो बार लोकसभा से चुने गए। 31 अगस्त 2020 को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन हो गया था।

Point of View

जिन्होंने भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि राजनीति में केवल महत्वाकांक्षा ही नहीं, बल्कि संबंधों और सामंजस्य की भी आवश्यकता होती है।
NationPress
30/08/2025

Frequently Asked Questions

प्रणब मुखर्जी का प्रधानमंत्री बनने का सपना क्यों अधूरा रह गया?
प्रणब मुखर्जी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा कई बार उनकी 'अति महत्वाकांक्षी' छवि और कांग्रेस में राजनीतिक समीकरणों के कारण अधूरी रह गई।
प्रणब मुखर्जी की उपलब्धियाँ क्या थीं?
प्रणब मुखर्जी ने भारतीय राजनीति में 50 वर्षों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 25 जुलाई 2012 को भारत के 13वें राष्ट्रपति बने।
प्रणब मुखर्जी के साथ राजीव गांधी के मतभेदों का क्या कारण था?
राजीव गांधी और प्रणब मुखर्जी के बीच मतभेद राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और व्यक्तिगत संबंधों के कारण उत्पन्न हुए।
क्या प्रणब मुखर्जी ने कभी प्रधानमंत्री बनने की कोशिश की?
जी हाँ, प्रणब मुखर्जी ने कई बार प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी पेश की, लेकिन विभिन्न कारणों से वह सफल नहीं हो सके।
प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक यात्रा का मुख्य संदेश क्या है?
प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक यात्रा हमें यह सिखाती है कि सच्चाई और साहस के साथ चलने पर भी राजनीतिक सफलता पाना हमेशा आसान नहीं होता।