राजस्थान पंचायत चुनाव अवमानना याचिका: हाई कोर्ट ने 26 मई तक टाली सुनवाई

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राजस्थान पंचायत चुनाव अवमानना याचिका: हाई कोर्ट ने 26 मई तक टाली सुनवाई

सारांश

राजस्थान हाई कोर्ट ने पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में देरी पर दायर अवमानना याचिका की सुनवाई 26 मई तक टाल दी। राज्य चुनाव आयुक्त को नोटिस जारी हो चुका है, सरकार दिसंबर तक चुनाव टालना चाहती है, और याचिकाकर्ताओं का कहना है कि डेढ़ साल की देरी ने संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया है।

मुख्य बातें

राजस्थान हाई कोर्ट ने 18 मई को पंचायत-स्थानीय निकाय चुनाव देरी पर अवमानना याचिका की सुनवाई 26 मई तक स्थगित की।
याचिका पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज सिंह देवंदा ने दायर की है।
राज्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह को अदालत पहले ही अवमानना नोटिस जारी कर चुकी है।
आयोग ने मतदाता सूची प्रकाशन की तारीख 22 अप्रैल रखी, जबकि अदालत की समय सीमा 15 अप्रैल थी।
राज्य सरकार ने चुनाव दिसंबर तक टालने की माँग की है; आयोग ने ओबीसी आरक्षण निर्धारण का हवाला दिया।
चुनाव स्थगन याचिकाओं पर 11 मई को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया है।

राजस्थान हाई कोर्ट ने सोमवार, 18 मई को राज्य में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में देरी को लेकर राज्य चुनाव आयोग के विरुद्ध दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई 26 मई तक के लिए स्थगित कर दी। यह निर्णय इसलिए लिया गया क्योंकि हाई कोर्ट की एक अन्य पीठ ने चुनाव स्थगन से संबंधित याचिकाओं पर पहले ही अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अवमानना याचिका पूर्व विधायक संयम लोढ़ा, गिर्राज सिंह देवंदा और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर की गई है। मामला जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की डिवीजन बेंच के समक्ष सूचीबद्ध था।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग — दोनों — हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जानबूझकर चुनाव प्रक्रिया में विलंब कर रहे हैं।

अवमानना नोटिस और मूल विवाद

पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह को अवमानना नोटिस जारी किए थे। अदालत ने आयोग से स्पष्टीकरण माँगा था कि उसने स्थानीय निकाय चुनावों के लिए मतदाता सूचियों के संशोधन का कार्यक्रम, हाई कोर्ट द्वारा पहले से निर्धारित समय सीमा के बाद कैसे जारी किया।

याचिका के अनुसार, आयोग ने अंतिम मतदाता सूचियों के प्रकाशन की तारीख 22 अप्रैल तय की थी, जबकि अदालत द्वारा निर्धारित समय सीमा 15 अप्रैल थी। इस विलंब के कारण निर्धारित समय के भीतर चुनाव प्रक्रिया पूरी करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया।

संवैधानिक संकट का दावा

लोढ़ा ने दावा किया है कि पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में हुई अत्यधिक देरी ने पिछले डेढ़ वर्षों में राजस्थान में एक संवैधानिक संकट उत्पन्न कर दिया है। उनके अनुसार, चुने हुए प्रतिनिधियों के स्थान पर नियुक्त प्रशासकों के कामकाज से जनता में व्यापक असंतोष है।

गौरतलब है कि यह कोई अकेला मामला नहीं है — देश के कई राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों में देरी को लेकर न्यायालयों में याचिकाएँ दायर हो चुकी हैं, और सर्वोच्च न्यायालय भी इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त कर चुका है।

सरकार और आयोग का पक्ष

11 मई को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित की एक अलग डिवीजन बेंच ने चुनाव स्थगन की माँग वाली याचिकाओं पर सुनवाई की और दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

राज्य सरकार ने अपनी याचिका में अनुरोध किया है कि पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव दिसंबर तक के लिए टाल दिए जाएँ। सरकार ने विभिन्न प्रशासनिक और परिस्थितिजन्य कारणों का हवाला दिया है। राज्य चुनाव आयोग ने भी सरकार के रुख का समर्थन करते हुए तर्क दिया कि ओबीसी आरक्षण का निर्धारण अंतिम रूप से तय होने से पहले चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं होगा।

आगे क्या होगा

अवमानना याचिका पर अगली सुनवाई 26 मई को निर्धारित है। इससे पहले, चुनाव स्थगन याचिकाओं पर सुरक्षित रखा गया फैसला भी आने की संभावना है, जो आगे की कार्यवाही की दिशा तय करेगा। राजस्थान के लाखों मतदाता और स्थानीय निकाय प्रतिनिधित्व के हकदार नागरिक इस फैसले पर नज़र टिकाए हुए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि संवैधानिक जवाबदेही का सवाल है — जब चुने हुए प्रतिनिधियों की जगह नियुक्त प्रशासक डेढ़ साल से अधिक समय तक काम करें, तो स्थानीय लोकतंत्र की नींव खोखली होती है। ओबीसी आरक्षण को कारण बताना तर्कसंगत लग सकता है, लेकिन यह भी एक ऐसा तर्क है जिसे अनिश्चित काल तक खींचा जा सकता है। असली सवाल यह है कि क्या अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी सरकार और आयोग की यह 'तकनीकी देरी' जवाबदेही से बचने की रणनीति तो नहीं — और 26 मई का फैसला यही परखेगा।
RashtraPress
18 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राजस्थान हाई कोर्ट में पंचायत चुनाव अवमानना याचिका क्या है?
यह याचिका पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और अन्य ने राज्य चुनाव आयोग के विरुद्ध दायर की है, जिसमें आरोप है कि आयोग और राज्य सरकार हाई कोर्ट के निर्देशों के बावजूद जानबूझकर पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में देरी कर रहे हैं। अदालत ने राज्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह को अवमानना नोटिस भी जारी किया है।
अगली सुनवाई कब होगी?
अवमानना याचिका पर अगली सुनवाई 26 मई को निर्धारित है। इससे पहले, चुनाव स्थगन याचिकाओं पर 11 मई को सुनवाई के बाद सुरक्षित रखा गया फैसला भी आने की संभावना है।
राजस्थान सरकार चुनाव क्यों टालना चाहती है?
राज्य सरकार ने विभिन्न प्रशासनिक और परिस्थितिजन्य कारणों का हवाला देते हुए पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव दिसंबर तक टालने की माँग की है। राज्य चुनाव आयोग ने भी तर्क दिया है कि ओबीसी आरक्षण का निर्धारण अंतिम रूप से तय होने से पहले चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं होगा।
अवमानना नोटिस का आधार क्या था?
हाई कोर्ट ने पाया कि राज्य चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों के संशोधन का कार्यक्रम अदालत की 15 अप्रैल की समय सीमा के बाद — 22 अप्रैल को — जारी किया, जिससे निर्धारित समय के भीतर चुनाव प्रक्रिया पूरी करना असंभव हो गया। अदालत ने इसे अपने पूर्व निर्देशों की अवहेलना मानते हुए नोटिस जारी किया।
इस देरी का राजस्थान की जनता पर क्या असर पड़ा है?
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, डेढ़ साल से अधिक समय से चुने हुए प्रतिनिधियों की जगह नियुक्त प्रशासक स्थानीय निकायों का संचालन कर रहे हैं, जिससे जनप्रतिनिधित्व बाधित हुआ है और जनता में रोष व्याप्त है। याचिकाकर्ताओं ने इसे संवैधानिक संकट की संज्ञा दी है।
राष्ट्र प्रेस
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