15 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

राजौरी की भैरव यात्रा को राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा, J&K उपराज्यपाल ने दी बधाई

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
राजौरी की भैरव यात्रा को राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा, J&K उपराज्यपाल ने दी बधाई

सारांश

राजौरी की भैरव यात्रा — होली पर मनाया जाने वाला सदियों पुराना आध्यात्मिक उत्सव — अब भारत की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची का हिस्सा है। यह मान्यता जम्मू-कश्मीर की बहुलतावादी विरासत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

मुख्य बातें

राजौरी भैरव यात्रा को भारत की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में आधिकारिक रूप से शामिल किया गया।
J&K उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 15 जुलाई 2025 को एक्स पर यह जानकारी साझा करते हुए राजौरी जिला प्रशासन और जम्मू-कश्मीर संस्कृति विभाग को बधाई दी।
भैरव यात्रा मुख्यतः होली पर्व पर मनाया जाने वाला सदियों पुराना आध्यात्मिक उत्सव है, जिसमें एक श्रद्धालु बाबा भैरव देव का स्वरूप धारण करता है।
इस मान्यता से शोध, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सतत विरासत पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
यह दर्जा आने वाली पीढ़ियों के लिए इस परंपरा के संरक्षण और संवर्धन का मार्ग प्रशस्त करता है।

जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले की सदियों पुरानी भैरव यात्रा को अब भारत की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में आधिकारिक रूप से शामिल कर लिया गया है। 15 जुलाई 2025 को इस उपलब्धि की जानकारी जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने साझा की, जिन्होंने इसे राजौरी जिले के लिए गौरव का ऐतिहासिक क्षण बताया। यह मान्यता इस क्षेत्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाती है।

उपराज्यपाल की प्रतिक्रिया

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए राजौरी जिला प्रशासन और जम्मू-कश्मीर संस्कृति विभाग को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन पीढ़ियों की आस्था और समर्पण का प्रतिबिंब है, जिन्होंने सदियों से इस परंपरा को जीवित रखा। सिन्हा के अनुसार, यह राष्ट्रीय दर्जा इस क्षेत्र की विरासत के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

भैरव यात्रा: परंपरा और आस्था

राजौरी भैरव यात्रा मुख्य रूप से होली पर्व के अवसर पर मनाया जाने वाला एक अनूठा आध्यात्मिक उत्सव है। इस यात्रा की सबसे विशिष्ट परंपरा यह है कि एक श्रद्धालु बाबा भैरव देव का स्वरूप धारण करता है — उसके पूरे शरीर पर काला रंग लगाया जाता है और वह भव्य शोभायात्रा का नेतृत्व करता है। यात्रा के दौरान वह श्रद्धालुओं को प्रतीकात्मक रूप से चिमटे से हल्का स्पर्श करता है, जिसे स्थानीय मान्यता के अनुसार सौभाग्य, सुरक्षा और बाबा भैरव के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

राष्ट्रीय धरोहर सूची में शामिल होने का महत्व

भारत की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल होने से किसी परंपरा को न केवल आधिकारिक मान्यता मिलती है, बल्कि उसके संरक्षण के लिए संस्थागत समर्थन और संसाधन भी सुलभ होते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशें तेज हो रही हैं। उपराज्यपाल के अनुसार, इस मान्यता से शोध, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सतत विरासत पर्यटन को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

आगे की राह

गौरतलब है कि राजौरी क्षेत्र अपनी बहुलतावादी सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है, और भैरव यात्रा इस साझी विरासत का एक जीवंत उदाहरण है। राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा मिलने के बाद यह यात्रा अब देश-विदेश के शोधकर्ताओं, पर्यटकों और सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए और अधिक आकर्षण का केंद्र बन सकती है। आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अनमोल परंपरा के संरक्षण और संवर्धन का मार्ग अब और सुदृढ़ हो गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि इस मान्यता के बाद संरक्षण के लिए ठोस संसाधन और संस्थागत तंत्र कितनी तेज़ी से सक्रिय होते हैं। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से सांस्कृतिक पहचान और विरासत के सवाल राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहे हैं — ऐसे में यह मान्यता क्षेत्र की साझी विरासत को रेखांकित करने का अवसर भी है। हालाँकि, यदि यह केवल सूची में नाम जोड़ने तक सीमित रही और पर्यटन अवसंरचना, स्थानीय कलाकारों की आजीविका और दस्तावेजीकरण में निवेश नहीं हुआ, तो यह सम्मान कागज़ी ही रहेगा।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राजौरी भैरव यात्रा क्या है?
राजौरी भैरव यात्रा जम्मू-कश्मीर के राजौरी क्षेत्र का सदियों पुराना आध्यात्मिक उत्सव है, जो मुख्यतः होली पर्व के अवसर पर मनाया जाता है। इसमें एक श्रद्धालु बाबा भैरव देव का स्वरूप धारण कर भव्य शोभायात्रा का नेतृत्व करता है और श्रद्धालुओं को चिमटे से प्रतीकात्मक स्पर्श देता है, जिसे सौभाग्य और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
भैरव यात्रा को राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में कब शामिल किया गया?
15 जुलाई 2025 को J&K उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने इस उपलब्धि की जानकारी साझा की, जिसके अनुसार भैरव यात्रा को आधिकारिक रूप से भारत की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कर लिया गया है।
राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल होने से क्या फायदा होगा?
इस सूची में शामिल होने से भैरव यात्रा को आधिकारिक संरक्षण, दस्तावेजीकरण और प्रचार-प्रसार के लिए संस्थागत समर्थन मिलेगा। साथ ही शोध, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सतत विरासत पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
इस उपलब्धि के लिए किसे श्रेय दिया गया?
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने राजौरी जिला प्रशासन और जम्मू-कश्मीर संस्कृति विभाग को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी और उनके प्रयासों को इस मान्यता का आधार बताया।
भैरव यात्रा की सबसे अनोखी परंपरा क्या है?
इस यात्रा में एक श्रद्धालु के पूरे शरीर पर काला रंग लगाकर उसे बाबा भैरव देव का स्वरूप दिया जाता है, जो शोभायात्रा का नेतृत्व करता है। वह चिमटे से श्रद्धालुओं को प्रतीकात्मक स्पर्श देता है, जिसे स्थानीय मान्यता के अनुसार सौभाग्य और सुरक्षा का आशीर्वाद माना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 महीने पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 3 महीने पहले
  5. 5 महीने पहले
  6. 7 महीने पहले
  7. 7 महीने पहले
  8. 8 महीने पहले