राजौरी की भैरव यात्रा को राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा, J&K उपराज्यपाल ने दी बधाई
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले की सदियों पुरानी भैरव यात्रा को अब भारत की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में आधिकारिक रूप से शामिल कर लिया गया है। 15 जुलाई 2025 को इस उपलब्धि की जानकारी जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने साझा की, जिन्होंने इसे राजौरी जिले के लिए गौरव का ऐतिहासिक क्षण बताया। यह मान्यता इस क्षेत्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाती है।
उपराज्यपाल की प्रतिक्रिया
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए राजौरी जिला प्रशासन और जम्मू-कश्मीर संस्कृति विभाग को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन पीढ़ियों की आस्था और समर्पण का प्रतिबिंब है, जिन्होंने सदियों से इस परंपरा को जीवित रखा। सिन्हा के अनुसार, यह राष्ट्रीय दर्जा इस क्षेत्र की विरासत के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
भैरव यात्रा: परंपरा और आस्था
राजौरी भैरव यात्रा मुख्य रूप से होली पर्व के अवसर पर मनाया जाने वाला एक अनूठा आध्यात्मिक उत्सव है। इस यात्रा की सबसे विशिष्ट परंपरा यह है कि एक श्रद्धालु बाबा भैरव देव का स्वरूप धारण करता है — उसके पूरे शरीर पर काला रंग लगाया जाता है और वह भव्य शोभायात्रा का नेतृत्व करता है। यात्रा के दौरान वह श्रद्धालुओं को प्रतीकात्मक रूप से चिमटे से हल्का स्पर्श करता है, जिसे स्थानीय मान्यता के अनुसार सौभाग्य, सुरक्षा और बाबा भैरव के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
राष्ट्रीय धरोहर सूची में शामिल होने का महत्व
भारत की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल होने से किसी परंपरा को न केवल आधिकारिक मान्यता मिलती है, बल्कि उसके संरक्षण के लिए संस्थागत समर्थन और संसाधन भी सुलभ होते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशें तेज हो रही हैं। उपराज्यपाल के अनुसार, इस मान्यता से शोध, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सतत विरासत पर्यटन को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
आगे की राह
गौरतलब है कि राजौरी क्षेत्र अपनी बहुलतावादी सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है, और भैरव यात्रा इस साझी विरासत का एक जीवंत उदाहरण है। राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा मिलने के बाद यह यात्रा अब देश-विदेश के शोधकर्ताओं, पर्यटकों और सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए और अधिक आकर्षण का केंद्र बन सकती है। आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अनमोल परंपरा के संरक्षण और संवर्धन का मार्ग अब और सुदृढ़ हो गया है।