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क्या राज्यसभा के वेल में जाना और शोर मचाना किसी का अधिकार है?

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क्या राज्यसभा के वेल में जाना और शोर मचाना किसी का अधिकार है?

सारांश

राज्यसभा में वेल में जाकर शोर मचाना और सदन को बाधित करना क्या लोकतांत्रिक अधिकार है? उपसभापति हरिवंश नारायण ने इस मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जानिए उन्होंने क्या कहा और सदन की गरिमा के लिए यह कैसे महत्वपूर्ण है।

मुख्य बातें

राज्यसभा में शोर मचाना सदन की गरिमा को प्रभावित करता है।
सुरक्षा बलों की तैनाती सदन की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
लोकतांत्रिक अधिकारों का पालन सदन की नियमों के अनुसार होना चाहिए।
उपसभापति द्वारा सदन की कार्यवाही को बाधित करने वाले सदस्यों की निंदा की गई है।
सदन की पवित्रता बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है।

नई दिल्ली, 5 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। राज्यसभा के वेल में जाना, शोर मचाना, सदन को बाधित करना, और अन्य सदस्यों को जो सदन की कार्यवाही में भाग ले रहे हैं, उन्हें न बोलने देना, यह कैसे किसी सदस्य का विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार माना जा सकता है? यह प्रश्न मंगलवार को राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने सदन में उठाया।

बातचीत के दौरान, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि सदन के वेल में सीआईएसएफ के जवानों को तैनात किया गया है। उपसभापति हरिवंश नारायण ने स्पष्ट किया कि संसद के सुरक्षाकर्मियों का सदन में उपस्थित रहना कोई नई बात नहीं है। यह सेवा 1930 में विट्ठल भाई पटेल द्वारा स्थापित की गई थी, और ये सुरक्षाकर्मी सदन की गरिमा को बनाए रखते हुए कार्य करते हैं।

उपसभापति ने बताया कि एक अगस्त को मल्लिकार्जुन खड़गे का एक पत्र प्राप्त हुआ जिसमें उन्होंने सीआईएसएफ की तैनाती की बात कही थी। उन्होंने कहा, “चूंकि चेयर और नेता प्रतिपक्ष के बीच पत्र गोपनीय संवाद का हिस्सा होते हैं, इसलिए इसे मीडिया में जारी करना कितना उचित है? यह आपके विवेक पर छोड़ता हूं।”

उपसभापति ने कहा कि सदन में लगातार हंगामे की घटनाएं चिंताजनक हैं। कई सदस्यों ने नियम 235 और 238 का उल्लंघन कर सदन को बाधित किया है।

उपसभापति ने उदाहरण देते हुए कहा कि 28 जुलाई को वाईएसआरसीपी के एक सदस्य को बोलने से रोकने के लिए कुछ सदस्यों ने उन्हें डिस्टर्ब किया। क्या यह उस सदस्य के विशेषाधिकार का उल्लंघन नहीं है? उन्होंने कहा कि 31 जुलाई को एक मंत्री महत्वपूर्ण विषय पर सू मोटो बयान दे रहे थे, तब भी सदन में नारेबाजी हुई।

उपसभापति ने कहा कि एक अगस्त को ‘आप’ के एक सदस्य ने शून्य काल में अपनी बात रखने का प्रयास किया, लेकिन एक अन्य सदस्य ने उन्हें बाधित किया। उन्होंने सदन की गरिमा की रक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।

उपसभापति ने कहा कि वेल क्षेत्र की पवित्रता को बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में सदन में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का उल्लेख किया।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने दिवंगत भाजपा नेताओं अरुण जेटली और सुषमा स्वराज का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने भी सदन में इसी प्रकार का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि सीआईएसएफ की तैनाती आपत्तिजनक है और हम इसकी निंदा करते हैं।

उपसभापति ने यह भी बताया कि 1978 में सभापति ने वेल में जाकर नारेबाजी को “सदन की अवमानना” कहा था।

संपादकीय दृष्टिकोण

सदन की गरिमा को बनाए रखने के लिए नियमों का पालन आवश्यक है। सदस्यों को लोकतांत्रिक अधिकारों का पालन करते हुए सदन की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए।
RashtraPress
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