8 अक्टूबर 2026
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दिव्यांग बच्चों के रिहैबिलिटेशन सेंटर्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से माँगा राज्यवार डेटा

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दिव्यांग बच्चों के रिहैबिलिटेशन सेंटर्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से माँगा राज्यवार डेटा

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों के अनियंत्रित संचालन पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार से राज्यवार रिपोर्ट माँगी है। मात्र 10 राज्यों ने अब तक मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के न्यूनतम मानक अधिसूचित किए हैं — यह आँकड़ा कानूनी खामियों की गहराई बताता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को दिव्यांग बच्चों के रिहैबिलिटेशन सेंटर्स की नियमन और निगरानी से जुड़ी राज्यवार जानकारी हलफनामे के ज़रिए प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
सीजेआई सूर्यकांत , जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी.
मोहना की खंडपीठ ने वकील राहुल बजाज और जहीर अब्बास जान की जनहित याचिका पर यह आदेश दिया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार अब तक केवल 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए न्यूनतम मानकों की अधिसूचना जारी की है।
2025 में श्रीनगर के एक बाल विकास केंद्र के औचक निरीक्षण में पंजीकरण, बुनियादी सुविधाओं और योग्य कर्मचारियों की कमी उजागर हुई थी।
मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को निर्धारित है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दिव्यांग बच्चों के लिए संचालित पुनर्वास केंद्रों और संबद्ध संस्थाओं के नियमन, पंजीकरण तथा निगरानी से संबंधित राज्यवार जानकारी संकलित कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह आदेश वकील राहुल बजाज और जहीर अब्बास जान द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई के दौरान जारी किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पीआईएल दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (आरपीडब्ल्यूडी), 2016, पुनर्वास परिषद भारत (आरसीआई) अधिनियम, 1992 और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के कार्यान्वयन में प्रणालीगत विफलताओं को उजागर करती है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कानूनी ढाँचा होने के बावजूद बड़ी संख्या में संस्थान बिना पंजीकरण के चल रहे हैं, जिससे निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो पा रही।

गौरतलब है कि आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम की धारा 50 के तहत किसी भी व्यक्ति को सक्षम प्राधिकारी से पंजीकरण प्रमाणपत्र प्राप्त किए बिना दिव्यांगजनों के लिए कोई संस्थान आरंभ करने या संचालित करने से प्रतिबंधित किया गया है।

सुनवाई में उठे प्रमुख मुद्दे

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता राहुल बजाज ने अदालत को बताया कि अब तक केवल 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए न्यूनतम मानकों की अधिसूचना जारी की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सभी राज्यों में निर्धारित कानूनी प्राधिकरणों का गठन हुआ है या नहीं, इसका पता ठोस आँकड़ों के बिना नहीं लगाया जा सकता।

याचिका में 2025 में श्रीनगर की बाल कल्याण समिति (चाइल्ड वेलफेयर कमिटी) द्वारा एक बाल विकास केंद्र के औचक निरीक्षण का हवाला भी दिया गया, जहाँ पाया गया कि संस्थान के पास आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम और आरसीआई अधिनियम के तहत पंजीकरण नहीं था और वहाँ बुनियादी सुविधाओं तथा योग्य कर्मचारियों की गंभीर कमी थी।

न्यायालय के निर्देश

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय स्थापित कर एक विस्तृत हलफनामे के ज़रिए निम्नलिखित जानकारी रिकॉर्ड पर रखे:

पहला, आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम, 2016 के तहत वैधानिक प्राधिकरणों के गठन और कामकाज की स्थिति; दूसरा, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानकों की अधिसूचना; और तीसरा, पुनर्वास सुविधाओं के निरीक्षण एवं निगरानी के तंत्र।

आम जनता पर असर

देशभर में हज़ारों दिव्यांग बच्चे ऐसे संस्थानों में हैं जो कथित तौर पर बिना उचित पंजीकरण के संचालित हो रहे हैं। याचिका के अनुसार इन बच्चों को अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे, प्रशिक्षित पेशेवरों की अनुपलब्धता और प्रभावी नियामक निगरानी के अभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब दिव्यांगजन अधिकारों को लेकर नागरिक समाज की माँगें तेज़ होती जा रही हैं।

आगे क्या होगा

इस मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को निर्धारित है, जिसमें केंद्र सरकार को राज्यवार डेटा सहित हलफनामा प्रस्तुत करना होगा। न्यायालय का यह कदम दिव्यांग बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास के क्षेत्र में कानूनी प्रवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस व्यापक विफलता का प्रतीक है जहाँ संसद कानून बनाती है और कार्यपालिका उसे लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाती। आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम 2016 को एक दशक बीतने को है, फिर भी अधिकांश राज्यों में न तो वैधानिक प्राधिकरण पूरी तरह कार्यशील हैं और न ही पंजीकरण तंत्र। केवल 10 राज्यों द्वारा मानसिक स्वास्थ्य मानकों की अधिसूचना यह बताती है कि संघीय ढाँचे में जवाबदेही की सीढ़ी कहाँ टूटती है। सर्वोच्च न्यायालय को बार-बार यह भूमिका निभानी पड़ रही है जो मूलतः कार्यपालिका की होनी चाहिए — यह न्यायिक सक्रियता नहीं, बल्कि शासन-विफलता का लक्षण है।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग बच्चों के रिहैबिलिटेशन सेंटर्स पर क्या निर्देश दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों के पंजीकरण, नियमन और निगरानी से संबंधित राज्यवार डेटा हलफनामे के माध्यम से अदालत के सामने रखे। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया।
यह जनहित याचिका किसने दायर की और इसमें क्या माँगा गया है?
यह याचिका वकील राहुल बजाज और जहीर अब्बास जान ने दायर की है। इसमें आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम 2016, आरसीआई अधिनियम 1992 और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के तहत कानूनी सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने की माँग की गई है।
कितने राज्यों ने मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के न्यूनतम मानक अधिसूचित किए हैं?
याचिकाकर्ता राहुल बजाज के अनुसार अब तक केवल 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए आवश्यक न्यूनतम मानकों की अधिसूचना जारी की है। शेष राज्यों में यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
श्रीनगर के बाल विकास केंद्र निरीक्षण में क्या पाया गया था?
2025 में श्रीनगर की बाल कल्याण समिति के औचक निरीक्षण में पाया गया कि संबंधित केंद्र के पास आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम और आरसीआई अधिनियम के तहत पंजीकरण नहीं था। इसके अलावा वहाँ बुनियादी सुविधाओं, योग्य कर्मचारियों और कार्यक्रमों के उचित क्रियान्वयन की कमी भी पाई गई।
इस मामले में अगली सुनवाई कब होगी?
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को निर्धारित की है। उस तारीख तक केंद्र सरकार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जानकारी जुटाकर हलफनामा दाखिल करना होगा।
राष्ट्र प्रेस
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