दिव्यांग बच्चों के रिहैबिलिटेशन सेंटर्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से माँगा राज्यवार डेटा
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह दिव्यांग बच्चों के लिए संचालित पुनर्वास केंद्रों और संबद्ध संस्थाओं के नियमन, पंजीकरण तथा निगरानी से संबंधित राज्यवार जानकारी संकलित कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह आदेश वकील राहुल बजाज और जहीर अब्बास जान द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई के दौरान जारी किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पीआईएल दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (आरपीडब्ल्यूडी), 2016, पुनर्वास परिषद भारत (आरसीआई) अधिनियम, 1992 और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के कार्यान्वयन में प्रणालीगत विफलताओं को उजागर करती है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कानूनी ढाँचा होने के बावजूद बड़ी संख्या में संस्थान बिना पंजीकरण के चल रहे हैं, जिससे निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो पा रही।
गौरतलब है कि आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम की धारा 50 के तहत किसी भी व्यक्ति को सक्षम प्राधिकारी से पंजीकरण प्रमाणपत्र प्राप्त किए बिना दिव्यांगजनों के लिए कोई संस्थान आरंभ करने या संचालित करने से प्रतिबंधित किया गया है।
सुनवाई में उठे प्रमुख मुद्दे
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता राहुल बजाज ने अदालत को बताया कि अब तक केवल 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए न्यूनतम मानकों की अधिसूचना जारी की है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सभी राज्यों में निर्धारित कानूनी प्राधिकरणों का गठन हुआ है या नहीं, इसका पता ठोस आँकड़ों के बिना नहीं लगाया जा सकता।
याचिका में 2025 में श्रीनगर की बाल कल्याण समिति (चाइल्ड वेलफेयर कमिटी) द्वारा एक बाल विकास केंद्र के औचक निरीक्षण का हवाला भी दिया गया, जहाँ पाया गया कि संस्थान के पास आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम और आरसीआई अधिनियम के तहत पंजीकरण नहीं था और वहाँ बुनियादी सुविधाओं तथा योग्य कर्मचारियों की गंभीर कमी थी।
न्यायालय के निर्देश
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय स्थापित कर एक विस्तृत हलफनामे के ज़रिए निम्नलिखित जानकारी रिकॉर्ड पर रखे:
पहला, आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम, 2016 के तहत वैधानिक प्राधिकरणों के गठन और कामकाज की स्थिति; दूसरा, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानकों की अधिसूचना; और तीसरा, पुनर्वास सुविधाओं के निरीक्षण एवं निगरानी के तंत्र।
आम जनता पर असर
देशभर में हज़ारों दिव्यांग बच्चे ऐसे संस्थानों में हैं जो कथित तौर पर बिना उचित पंजीकरण के संचालित हो रहे हैं। याचिका के अनुसार इन बच्चों को अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे, प्रशिक्षित पेशेवरों की अनुपलब्धता और प्रभावी नियामक निगरानी के अभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब दिव्यांगजन अधिकारों को लेकर नागरिक समाज की माँगें तेज़ होती जा रही हैं।
आगे क्या होगा
इस मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को निर्धारित है, जिसमें केंद्र सरकार को राज्यवार डेटा सहित हलफनामा प्रस्तुत करना होगा। न्यायालय का यह कदम दिव्यांग बच्चों की सुरक्षा और पुनर्वास के क्षेत्र में कानूनी प्रवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।