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स्कूलों में रैगिंग-बुलिंग पर केंद्रीय कानून की माँग: सुप्रीम कोर्ट ने PIL खारिज की, शिक्षा मंत्रालय जाने की सलाह

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स्कूलों में रैगिंग-बुलिंग पर केंद्रीय कानून की माँग: सुप्रीम कोर्ट ने PIL खारिज की, शिक्षा मंत्रालय जाने की सलाह

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूलों में रैगिंग-बुलिंग पर केंद्रीय कानून की माँग वाली PIL खारिज कर दी — कहा, यह नीतिगत विषय है। लेकिन याचिकाकर्ता की चिंता को नकारा नहीं; शिक्षा मंत्रालय के पास रिप्रेजेंटेशन भेजने की अनुमति दी। अब सवाल यह है कि सरकार इस पर कार्रवाई करेगी या नहीं।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 सितंबर को स्कूलों में रैगिंग-बुलिंग पर केंद्रीय कानून की माँग वाली PIL खारिज की।
कोर्ट ने सुखदेव साहा मामले के पूर्व निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि रैगिंग पर दिशानिर्देश पहले से मौजूद हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नया कानून बनाना नीतिगत निर्णय है — यह सरकार का अधिकार है, न्यायपालिका का नहीं।
याचिकाकर्ता को PIL को 'रिप्रेजेंटेशन' के रूप में शिक्षा मंत्रालय और संबंधित प्राधिकरणों को भेजने की अनुमति दी गई।
स्कूल स्तर पर बुलिंग रोकने के लिए अभी तक कोई केंद्रीय कानूनी ढाँचा मौजूद नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 सितंबर को देश के स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी शिक्षण संस्थानों में रैगिंग व बुलिंग पर अंकुश लगाने हेतु एक समर्पित केंद्रीय कानून बनाने की माँग वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह विषय नीतिगत दायरे में आता है और वह सरकार को सीधे कानून निर्माण का आदेश देने की स्थिति में नहीं है।

याचिका में क्या माँगा गया था

याचिकाकर्ता — जो स्वयं एक छात्र हैं — ने सर्वोच्च न्यायालय में दायर इस PIL के ज़रिए तीन प्रमुख माँगें रखी थीं। पहली, देश के सभी केंद्रीय और राज्य शिक्षा बोर्डों के अंतर्गत आने वाले स्कूलों व प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में रैगिंग और बुलिंग रोकने के लिए एक सख्त केंद्रीय कानून बनाया जाए। दूसरी, छात्रों की शिकायतों के पंजीकरण और उन पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य दिशानिर्देश तैयार किए जाएँ। तीसरी, बुलिंग और रैगिंग के दुष्प्रभावों तथा बचाव के उपायों पर एक विशेष विषय पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस तरह के एकसमान नियम सभी बोर्डों के अधीन संस्थानों में लागू होने चाहिए, ताकि छोटे बच्चों को मानसिक प्रताड़ना से बचाया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने सुखदेव साहा मामले में पूर्व में दिए गए निर्देशों का संदर्भ दिया और रेखांकित किया कि रैगिंग से संबंधित व्यापक दिशानिर्देश पहले ही जारी किए जा चुके हैं। न्यायालय ने कहा कि नया केंद्रीय कानून बनाना एक नीतिगत निर्णय है, जो सरकार और संबंधित शिक्षा प्राधिकरणों के विवेकाधिकार में आता है — न्यायपालिका इस पर प्रत्यक्ष आदेश नहीं दे सकती।

गौरतलब है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के पास पहले से दिशानिर्देश मौजूद हैं, लेकिन स्कूल स्तर पर ऐसा कोई केंद्रीय ढाँचा नहीं है। यह PIL उसी रिक्तता को भरने का प्रयास था।

कोर्ट ने दिया यह विकल्प

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की चिंताओं को सिरे से नकारने से परहेज किया। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को अनुमति दी कि वे इस PIL को एक 'रिप्रेजेंटेशन' (अनुरोध पत्र) के रूप में शिक्षा मंत्रालय और अन्य संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारी इस पर अपने स्तर पर आवश्यक कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं।

आम जनता और छात्रों पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब स्कूलों में बुलिंग और मानसिक उत्पीड़न के मामले सार्वजनिक चर्चा में लगातार बने हुए हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का कहना है कि स्कूल स्तर पर बुलिंग के दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव गंभीर हो सकते हैं, और एक स्पष्ट कानूनी ढाँचे का अभाव पीड़ित छात्रों को न्याय दिलाने में बाधा बनता है। न्यायालय के इस निर्णय के बाद, अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है।

आगे क्या होगा

याचिकाकर्ता के पास अब शिक्षा मंत्रालय के समक्ष औपचारिक अनुरोध पत्र दाखिल करने का विकल्प है। यदि मंत्रालय इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देता, तो भविष्य में पुनः न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों के अनुसार, इस मुद्दे पर संसद में निजी विधेयक या राज्य सरकारों की पहल भी एक व्यावहारिक मार्ग हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन स्कूलों के लिए कोई समतुल्य केंद्रीय व्यवस्था नहीं है — और यह अंतर दशकों पुराना है। असली सवाल यह है कि क्या शिक्षा मंत्रालय इस रिप्रेजेंटेशन को फाइलों में दबा देगा, या इसे नीति-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल करेगा — क्योंकि न्यायालय ने रास्ता बंद नहीं किया, बस ज़िम्मेदारी सरकार पर डाल दी है।
RashtraPress
29 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में रैगिंग-बुलिंग पर PIL क्यों खारिज की?
सर्वोच्च न्यायालय ने PIL इसलिए खारिज की क्योंकि उसने माना कि केंद्रीय कानून बनाना एक नीतिगत निर्णय है जो सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि न्यायपालिका के। कोर्ट ने सुखदेव साहा मामले में पहले से जारी रैगिंग-विरोधी दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया।
इस PIL में याचिकाकर्ता ने क्या माँगें रखी थीं?
याचिकाकर्ता ने तीन प्रमुख माँगें रखी थीं — सभी स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में रैगिंग-बुलिंग रोकने के लिए सख्त केंद्रीय कानून, शिकायत पंजीकरण के लिए अनिवार्य दिशानिर्देश, और बुलिंग के दुष्प्रभावों पर एक विशेष विषय को सभी बोर्डों के पाठ्यक्रम में शामिल करना।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को क्या विकल्प दिया?
न्यायालय ने याचिकाकर्ता को अनुमति दी कि वे इस PIL को एक 'रिप्रेजेंटेशन' (अनुरोध पत्र) के रूप में शिक्षा मंत्रालय और अन्य संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं, ताकि वे अपने स्तर पर आवश्यक कार्रवाई कर सकें।
क्या भारत में स्कूलों में बुलिंग रोकने के लिए कोई कानून मौजूद है?
फिलहाल स्कूल स्तर पर बुलिंग रोकने के लिए कोई केंद्रीय कानूनी ढाँचा मौजूद नहीं है। UGC के पास उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए रैगिंग-विरोधी दिशानिर्देश हैं, लेकिन स्कूलों के लिए ऐसा कोई समतुल्य केंद्रीय प्रावधान नहीं है।
सुखदेव साहा मामला क्या है जिसका सुप्रीम कोर्ट ने हवाला दिया?
सुखदेव साहा मामला एक पूर्व न्यायिक प्रकरण है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने रैगिंग से संबंधित व्यापक दिशानिर्देश जारी किए थे। इस मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि रैगिंग पर पहले से ही पर्याप्त निर्देश उपलब्ध हैं।
राष्ट्र प्रेस
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