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सुप्रीम कोर्ट का दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों पर नोटिस, 3 अगस्त को अगली सुनवाई

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सुप्रीम कोर्ट का दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों पर नोटिस, 3 अगस्त को अगली सुनवाई

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों की निगरानी को लेकर दायर PIL पर नोटिस जारी किया है। याचिका में RPWD, RCI और MHCA कानूनों के क्रियान्वयन में गंभीर खामियों का आरोप है। अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 17 जून 2025 को दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों की निगरानी माँगने वाली PIL पर नोटिस जारी किया।
CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी.
मोहना की पीठ ने अधिवक्ता राहुल बजाज और जहीर अब्बास जान की याचिका पर सुनवाई की।
याचिका में RPWD अधिनियम 2016 , RCI अधिनियम 1992 और MHCA 2017 के प्रावधानों को लागू न करने का आरोप है।
2025 में श्रीनगर के एक बाल विकास केंद्र के औचक निरीक्षण में पंजीकरण न होने और बुनियादी सुविधाओं की कमी उजागर हुई।
याचिकाकर्ता ने 25 फरवरी को NHRC से भी संपर्क किया था, लेकिन कथित तौर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
अगली सुनवाई संभावित रूप से 3 अगस्त को निर्धारित है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 17 जून 2025 को एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें दिव्यांग बच्चों के लिए संचालित पुनर्वास केंद्रों, बाल विकास केंद्रों और मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के प्रभावी पंजीकरण, नियमन और निगरानी की माँग की गई है। यह याचिका उन कथित प्रणालीगत खामियों को उजागर करती है जो देश भर में लाखों दिव्यांग बच्चों की सुरक्षा और देखभाल को प्रभावित कर रही हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने दिव्यांग अधिकार अधिवक्ता राहुल बजाज और बाल अधिकार कार्यकर्ता जहीर अब्बास जान की संयुक्त याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिका में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPWD) 2016, भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) अधिनियम 1992 और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (MHCA) 2017 के प्रावधानों को लागू करने में कथित तौर पर हो रही चूक को रेखांकित किया गया है।

मुख्य शिकायतें और कानूनी खामियाँ

याचिका के अनुसार, RPWD अधिनियम की धारा 50 के तहत दिव्यांग बच्चों को सेवाएँ देने वाली हर संस्था का पंजीकरण अनिवार्य है — फिर भी कथित तौर पर बड़ी संख्या में ऐसी संस्थाएँ बिना पंजीकरण के संचालित हो रही हैं। इससे न तो उनकी निगरानी हो पाती है और न ही जवाबदेही तय की जा सकती है।

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के तहत राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (State Mental Health Authority) की स्थापना और न्यूनतम गुणवत्ता मानकों का निर्धारण अनिवार्य है। याचिका में उपलब्ध आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि बहुत कम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ये मानक तय किए हैं या मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के पंजीकरण की कोई प्रणाली विकसित की है।

RCI अधिनियम 1992 के तहत केवल मान्यता प्राप्त और पंजीकृत पुनर्वास पेशेवर ही इस क्षेत्र में काम कर सकते हैं। याचिका में आरोप है कि व्यवहार में इन नियमों का पालन नहीं हो रहा, जिसके कारण अप्रशिक्षित और अपंजीकृत व्यक्ति दिव्यांग बच्चों की देखभाल कर रहे हैं।

श्रीनगर का मामला: ज़मीनी हकीकत

याचिकाकर्ताओं ने 2025 में श्रीनगर की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) द्वारा एक बाल विकास केंद्र के औचक निरीक्षण का उदाहरण प्रस्तुत किया। निरीक्षण में पाया गया कि संस्थान के पास RPWD अधिनियम और RCI अधिनियम के तहत कोई पंजीकरण नहीं था, बुनियादी सुविधाओं का अभाव था, योग्य कर्मचारी नहीं थे और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन भी संतोषजनक नहीं था। यह मामला याचिका में उठाई गई व्यापक समस्याओं की एक ठोस मिसाल है।

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता राहुल बजाज ने 25 फरवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष भी ये चिंताएँ उठाई थीं, लेकिन याचिका में आरोप है कि अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

याचिकाकर्ताओं की माँगें

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि वह सुनिश्चित करे कि दिव्यांग बच्चों की देखभाल करने वाली सभी संस्थाओं का विधिवत पंजीकरण हो, योग्य पेशेवरों की नियुक्ति हो और प्रभावी नियामकीय निगरानी की व्यवस्था बनाई जाए। इस मामले की अगली सुनवाई संभावित रूप से 3 अगस्त को निर्धारित है।

आगे क्या होगा

यह याचिका ऐसे समय में आई है जब देश में दिव्यांग बच्चों की देखभाल के लिए संस्थागत ढाँचे की पर्याप्तता पर बहस तेज़ हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय का नोटिस राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों पर दबाव बढ़ाएगा कि वे मौजूदा कानूनों के क्रियान्वयन की स्थिति स्पष्ट करें। 3 अगस्त की सुनवाई में सरकार के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि नियामकीय सुधार की दिशा में क्या कदम उठाए जाएँगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

RCI और MHCA जैसे तीन मज़बूत कानून हैं, लेकिन ज़मीनी क्रियान्वयन लगभग अनुपस्थित है। NHRC से शिकायत के बाद भी कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि नियामकीय निष्क्रियता सिर्फ राज्य स्तर की नहीं, बल्कि केंद्रीय संस्थाओं की भी समस्या है। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप ज़रूरी था, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या अदालत सिर्फ अनुपालन रिपोर्ट माँगेगी या पंजीकरण और निगरानी के लिए बाध्यकारी समयसीमा तय करेगी — क्योंकि पिछले ऐसे मामलों में अदालती आदेशों के बावजूद व्यवस्था में बदलाव धीमा रहा है।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों पर नोटिस क्यों जारी किया?
सर्वोच्च न्यायालय ने एक PIL पर नोटिस जारी किया जिसमें आरोप लगाया गया है कि RPWD अधिनियम 2016, RCI अधिनियम 1992 और MHCA 2017 के तहत दिव्यांग बच्चों की देखभाल करने वाली संस्थाओं का न तो विधिवत पंजीकरण हो रहा है और न ही प्रभावी निगरानी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार से जवाब माँगा है।
यह जनहित याचिका किसने दायर की है?
यह PIL दिव्यांग अधिकार अधिवक्ता राहुल बजाज और बाल अधिकार कार्यकर्ता जहीर अब्बास जान ने संयुक्त रूप से दायर की है। राहुल बजाज ने इससे पहले 25 फरवरी को NHRC के समक्ष भी यही चिंताएँ उठाई थीं।
RPWD अधिनियम 2016 की धारा 50 क्या कहती है?
RPWD अधिनियम 2016 की धारा 50 के अनुसार दिव्यांग बच्चों को सेवाएँ देने वाली किसी भी संस्था को सक्षम अधिकारी से पंजीकरण प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य है। बिना पंजीकरण के ऐसी कोई भी संस्था शुरू करना या चलाना कानूनन वर्जित है।
श्रीनगर के बाल विकास केंद्र के निरीक्षण में क्या पाया गया?
2025 में श्रीनगर की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) के औचक निरीक्षण में पाया गया कि संबंधित केंद्र के पास RPWD और RCI अधिनियमों के तहत कोई पंजीकरण नहीं था, बुनियादी सुविधाओं का अभाव था और योग्य कर्मचारी भी नहीं थे।
इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
इस PIL पर सर्वोच्च न्यायालय में अगली सुनवाई संभावित रूप से 3 अगस्त को होगी, जिसमें सरकार को नोटिस का जवाब देना होगा।
राष्ट्र प्रेस
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