सुप्रीम कोर्ट का दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास केंद्रों पर नोटिस, 3 अगस्त को अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 17 जून 2025 को एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें दिव्यांग बच्चों के लिए संचालित पुनर्वास केंद्रों, बाल विकास केंद्रों और मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के प्रभावी पंजीकरण, नियमन और निगरानी की माँग की गई है। यह याचिका उन कथित प्रणालीगत खामियों को उजागर करती है जो देश भर में लाखों दिव्यांग बच्चों की सुरक्षा और देखभाल को प्रभावित कर रही हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने दिव्यांग अधिकार अधिवक्ता राहुल बजाज और बाल अधिकार कार्यकर्ता जहीर अब्बास जान की संयुक्त याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिका में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPWD) 2016, भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) अधिनियम 1992 और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (MHCA) 2017 के प्रावधानों को लागू करने में कथित तौर पर हो रही चूक को रेखांकित किया गया है।
मुख्य शिकायतें और कानूनी खामियाँ
याचिका के अनुसार, RPWD अधिनियम की धारा 50 के तहत दिव्यांग बच्चों को सेवाएँ देने वाली हर संस्था का पंजीकरण अनिवार्य है — फिर भी कथित तौर पर बड़ी संख्या में ऐसी संस्थाएँ बिना पंजीकरण के संचालित हो रही हैं। इससे न तो उनकी निगरानी हो पाती है और न ही जवाबदेही तय की जा सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के तहत राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण (State Mental Health Authority) की स्थापना और न्यूनतम गुणवत्ता मानकों का निर्धारण अनिवार्य है। याचिका में उपलब्ध आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि बहुत कम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ये मानक तय किए हैं या मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के पंजीकरण की कोई प्रणाली विकसित की है।
RCI अधिनियम 1992 के तहत केवल मान्यता प्राप्त और पंजीकृत पुनर्वास पेशेवर ही इस क्षेत्र में काम कर सकते हैं। याचिका में आरोप है कि व्यवहार में इन नियमों का पालन नहीं हो रहा, जिसके कारण अप्रशिक्षित और अपंजीकृत व्यक्ति दिव्यांग बच्चों की देखभाल कर रहे हैं।
श्रीनगर का मामला: ज़मीनी हकीकत
याचिकाकर्ताओं ने 2025 में श्रीनगर की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) द्वारा एक बाल विकास केंद्र के औचक निरीक्षण का उदाहरण प्रस्तुत किया। निरीक्षण में पाया गया कि संस्थान के पास RPWD अधिनियम और RCI अधिनियम के तहत कोई पंजीकरण नहीं था, बुनियादी सुविधाओं का अभाव था, योग्य कर्मचारी नहीं थे और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन भी संतोषजनक नहीं था। यह मामला याचिका में उठाई गई व्यापक समस्याओं की एक ठोस मिसाल है।
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता राहुल बजाज ने 25 फरवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष भी ये चिंताएँ उठाई थीं, लेकिन याचिका में आरोप है कि अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
याचिकाकर्ताओं की माँगें
याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि वह सुनिश्चित करे कि दिव्यांग बच्चों की देखभाल करने वाली सभी संस्थाओं का विधिवत पंजीकरण हो, योग्य पेशेवरों की नियुक्ति हो और प्रभावी नियामकीय निगरानी की व्यवस्था बनाई जाए। इस मामले की अगली सुनवाई संभावित रूप से 3 अगस्त को निर्धारित है।
आगे क्या होगा
यह याचिका ऐसे समय में आई है जब देश में दिव्यांग बच्चों की देखभाल के लिए संस्थागत ढाँचे की पर्याप्तता पर बहस तेज़ हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय का नोटिस राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों पर दबाव बढ़ाएगा कि वे मौजूदा कानूनों के क्रियान्वयन की स्थिति स्पष्ट करें। 3 अगस्त की सुनवाई में सरकार के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि नियामकीय सुधार की दिशा में क्या कदम उठाए जाएँगे।