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राम मंदिर ट्रस्ट में वित्तीय अनियमितताओं पर सुप्रीम कोर्ट आज करेगा PIL पर सुनवाई

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राम मंदिर ट्रस्ट में वित्तीय अनियमितताओं पर सुप्रीम कोर्ट आज करेगा PIL पर सुनवाई

सारांश

अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट में दान प्रबंधन की कथित गड़बड़ियाँ अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच गई हैं। CJI सूर्य कांत की पीठ आज तीन PIL पर सुनवाई करेगी, जिनमें CBI जाँच, फॉरेंसिक ऑडिट और न्यायिक निगरानी समिति की माँग की गई है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय आज CJI सूर्य कांत , न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी.
मोहना की पीठ के समक्ष श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़ी PIL पर सुनवाई करेगा।
तीन याचिकाएँ — अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी , अजय कुमार राय और RJD सांसद सुधाकर सिंह — न्यायालय के समक्ष सूचीबद्ध हैं।
याचिकाओं में CBI जाँच , स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट , सीसीटीवी व डिजिटल रिकॉर्ड संरक्षण और न्यायिक निगरानी समिति गठित करने की माँग की गई है।
उत्तर प्रदेश सरकार की तीन सदस्यीय SIT ने कथित तौर पर मंदिर दान में अनियमितताओं, गबन और कुप्रबंधन का पता लगाया है।
इससे पहले न्यायमूर्ति एम.एम.
सुंदरेश की पीठ ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद मामला सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय 14 जुलाई 2025 को अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में दान और चढ़ावे के प्रबंधन में कथित वित्तीय अनियमितताओं की न्यायिक निगरानी में जाँच की माँग करने वाली जनहित याचिकाओं (PIL) के एक समूह पर सुनवाई करेगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इन मामलों की सुनवाई करेगी।

मुख्य याचिकाएँ और उनकी माँगें

सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक कॉज-लिस्ट के अनुसार, तीन अलग-अलग याचिकाएँ सूचीबद्ध हैं। पहली, अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी द्वारा दायर रिट याचिका; दूसरी, अजय कुमार राय और अन्य द्वारा ट्रस्ट के विरुद्ध दायर आपराधिक रिट याचिका; और तीसरी, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद सुधाकर सिंह की अलग याचिका।

गोस्वामी की याचिका में मंदिर में प्राप्त दान से जुड़े अभिलेखों, सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल लॉग को तत्काल संरक्षित करने की माँग की गई है। साथ ही ट्रस्ट की स्थापना के बाद से प्राप्त समस्त दान, चढ़ावे और मूल्यवान वस्तुओं का स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट कराने और चल रही विशेष जाँच दल (SIT) जाँच की सीलबंद स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने की भी अपील की गई है।

कानूनी तर्क: चढ़ावा 'पवित्र न्यास संपत्ति'

याचिका में एक महत्वपूर्ण कानूनी तर्क रखा गया है — कि किसी सार्वजनिक मंदिर में देवता को अर्पित चढ़ावा 'पवित्र न्यास संपत्ति' होती है, जो एक कानूनी इकाई के रूप में स्वयं देवता में निहित होती है। याचिका के अनुसार, ऐसे चढ़ावे का प्रबंधन करने वाले व्यक्ति न्यासी होते हैं और वे पारदर्शिता, जवाबदेही तथा संरक्षण के कर्तव्यों से आबद्ध हैं। इस आधार पर सर्वोच्च न्यायालय से राष्ट्रीय महत्व के मंदिरों में जनता से प्राप्त दान के पारदर्शी प्रबंधन हेतु न्यूनतम संवैधानिक सुरक्षा उपाय निर्धारित करने का निर्देश देने की माँग की गई है।

सांसद सुधाकर सिंह की याचिका: CBI जाँच की माँग

सांसद सुधाकर सिंह ने अपनी याचिका में चल रही जाँच को केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंपने और इसे सर्वोच्च न्यायालय की सीधी निगरानी में रखने की माँग की है। उनकी याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि ट्रस्ट के वित्तीय मामलों की देखरेख के लिए सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों और वित्तीय विशेषज्ञों की एक अस्थायी, न्यायालय-नियंत्रित समिति गठित की जाए। इसके अलावा जाँच पूरी होने तक बड़े वित्तीय निर्णयों पर रोक, व्यापक फॉरेंसिक ऑडिट और ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण प्रकाशित करने की भी माँग की गई है।

पृष्ठभूमि: SIT जाँच और पिछली सुनवाई

याचिका के अनुसार, यह मामला तब सार्वजनिक चर्चा में आया जब सार्वजनिक रिपोर्टों और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय SIT की जाँच से कथित तौर पर मंदिर में दान में अनियमितताओं, गबन और कुप्रबंधन का पता चला। गौरतलब है कि इससे पहले जब गोस्वामी की याचिका का उल्लेख न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ के समक्ष किया गया था, तो न्यायालय ने इस पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था। याचिकाकर्ता ने आरोपों को 'बहुत गंभीर' बताते हुए मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने पर जोर दिया था, जिसके बाद पीठ ने ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद मामले को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था।

आगे क्या होगा

आज की सुनवाई में न्यायालय यह तय कर सकता है कि इन याचिकाओं को स्वीकार किया जाए या नहीं, और यदि हाँ, तो ट्रस्ट व सरकार से जवाब माँगा जाएगा। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर सर्वोच्च न्यायालय का कोई भी निर्देश धार्मिक न्यासों में वित्तीय पारदर्शिता के व्यापक प्रश्न पर एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी जाँच राज्य सरकार के नियंत्रण में रहना स्वतंत्र जवाबदेही की कसौटी पर संदिग्ध है। सर्वोच्च न्यायालय यदि इन याचिकाओं को स्वीकार करता है, तो यह देश के अन्य बड़े धार्मिक ट्रस्टों के लिए भी एक नज़ीर बन सकता है — जो मुख्यधारा की कवरेज में अक्सर अनदेखा रह जाता है।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर ट्रस्ट के खिलाफ क्या याचिकाएँ दायर हैं?
तीन जनहित याचिकाएँ दायर हैं — अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी की रिट याचिका, अजय कुमार राय और अन्य की आपराधिक रिट याचिका, और RJD सांसद सुधाकर सिंह की अलग याचिका। इन सभी में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में दान प्रबंधन की कथित अनियमितताओं की न्यायिक निगरानी में जाँच की माँग की गई है।
राम मंदिर ट्रस्ट में किस तरह की वित्तीय अनियमितताओं का आरोप है?
याचिकाओं के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार की SIT जाँच में कथित तौर पर मंदिर में दान और चढ़ावे के प्रबंधन में अनियमितताओं, गबन और कुप्रबंधन का पता चला है। याचिकाकर्ताओं ने सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल लॉग और वित्तीय अभिलेखों को संरक्षित करने की माँग की है।
सांसद सुधाकर सिंह की याचिका में क्या माँगें हैं?
सांसद सुधाकर सिंह ने चल रही जाँच CBI को सौंपने और उसे सर्वोच्च न्यायालय की सीधी निगरानी में रखने की माँग की है। इसके अलावा सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों व वित्तीय विशेषज्ञों की एक अस्थायी निगरानी समिति, व्यापक फॉरेंसिक ऑडिट, बड़े वित्तीय निर्णयों पर रोक और ट्रस्ट की वेबसाइट पर ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण प्रकाशित करने की भी माँग की गई है।
इस मामले की सुनवाई पहले क्यों नहीं हुई?
जब गोस्वामी की याचिका का उल्लेख न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ के सामने किया गया था, तो न्यायालय ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था। पीठ ने ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद शीर्ष अदालत के पुनः खुलने पर मामले को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद अब यह सुनवाई निर्धारित हुई है।
इस मामले का व्यापक महत्व क्या है?
याचिकाओं में सर्वोच्च न्यायालय से राष्ट्रीय महत्व के मंदिरों में जनता से प्राप्त दान के पारदर्शी प्रबंधन के लिए न्यूनतम संवैधानिक सुरक्षा उपाय निर्धारित करने का आग्रह किया गया है। न्यायालय का निर्णय देश के अन्य बड़े धार्मिक ट्रस्टों की जवाबदेही के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर बन सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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