सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी: बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम खतरनाक, स्कूलों में फिजिकल एक्टिविटी अनिवार्य हो
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अगस्त 2026 को एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान गंभीर चिंता जताई कि आज के बच्चे मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में अत्यधिक उलझे हुए हैं, और इस स्थिति में शारीरिक गतिविधि को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना बेहद ज़रूरी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बच्चों की बढ़ती स्क्रीन-निर्भरता उनके समग्र विकास के लिए गंभीर खतरा है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका 'स्पोर्ट्स: अ वे ऑफ लाइफ' एनजीओ के अध्यक्ष और खेल शोधकर्ता डॉ. कनिष्का पांडे ने दाखिल की है। याचिका में माँग की गई है कि खेलों को भारतीय संविधान के भाग 3, अनुच्छेद 21ए के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया जाए। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारें शिक्षा और खेलों के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव न करें।
न्यायालय-नियुक्त अमाइकस क्यूरी की सिफारिशें
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त अमाइकस क्यूरी (न्याय मित्र) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश के प्रत्येक स्कूल में अनिवार्य रूप से फिजिकल एक्टिविटी सुनिश्चित की जानी चाहिए। यह व्यवस्था नर्सरी से लेकर पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर तक लागू होनी चाहिए। न्यायालय ने अमाइकस की इस रिपोर्ट पर याचिकाकर्ता से जवाब माँगा है।
याचिका की मुख्य माँगें
डॉ. पांडे की याचिका में तीन प्रमुख माँगें हैं — पहली, खेलों को स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए; दूसरी, स्कूलों के बजट में खेलों के लिए एक निश्चित हिस्सा अनिवार्य रूप से आवंटित किया जाए; और तीसरी, शिक्षा व खेल के बीच नीतिगत भेदभाव समाप्त हो। गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था।
स्क्रीन टाइम के स्वास्थ्य पर प्रभाव
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों का अत्यधिक स्क्रीन टाइम — चाहे मोबाइल हो, टीवी हो या टैबलेट — उनके मानसिक, शारीरिक और भाषाई विकास पर प्रतिकूल असर डालता है। विशेषज्ञों का मत है कि 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों का स्क्रीन टाइम शून्य होना चाहिए, जबकि बड़े बच्चों के लिए इसे सख्ती से सीमित रखना आवश्यक है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब देशभर के स्कूलों में खेल के मैदानों की कमी और पाठ्यक्रम का बोझ बच्चों को शारीरिक गतिविधि से दूर कर रहा है।
आगे क्या होगा
इस मामले में अगली सुनवाई 22 सितंबर को निर्धारित है। न्यायालय की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि वह इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकारों से ठोस नीतिगत जवाब चाहता है। यदि खेलों को मौलिक अधिकार का दर्जा मिलता है, तो यह भारतीय शिक्षा नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव होगा।