डिजिटल एडिक्शन पर भाजपा सांसद अशोक मित्तल की चेतावनी: बच्चों के लिए सख्त नीति बनाए सरकार
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद अशोक मित्तल ने 10 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में डिजिटल एडिक्शन को देश के बच्चों और युवाओं के लिए एक गंभीर और उभरती हुई चुनौती करार दिया। उन्होंने केंद्र सरकार से माँग की कि बच्चों के स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया पहुँच को नियंत्रित करने के लिए व्यापक नीति और सख्त कानूनी ढाँचा तैयार किया जाए। मित्तल ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मुद्दा उन्होंने संसद के शून्यकाल में उठाने की कोशिश की थी, लेकिन सदन की कार्यवाही बाधित रहने के कारण वे ऐसा नहीं कर सके।
डिजिटल एडिक्शन: बढ़ता संकट
अशोक मित्तल ने कहा कि ड्रग एडिक्शन निश्चित रूप से खतरनाक है, लेकिन डिजिटल एडिक्शन का दायरा कहीं अधिक व्यापक है क्योंकि यह हर घर और हर उम्र के बच्चे तक पहुँच चुकी है। लोकल सर्किल की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 9 से 17 वर्ष की उम्र के बच्चों का एक बड़ा वर्ग रोज़ाना लंबे समय तक स्क्रीन पर बिता रहा है। यह स्थिति बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत दोनों को प्रभावित कर रही है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बजट से पूर्व संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में भी डिजिटल एडिक्शन को देश के सामने उभरती प्रमुख समस्याओं में शामिल किया गया था। मित्तल के अनुसार, अत्यधिक डिजिटल इस्तेमाल बच्चों में एंग्जायटी, नींद से जुड़ी परेशानियाँ और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकार पैदा कर सकता है।
गुजरात, गाजियाबाद, चंडीगढ़ के मामले और वैश्विक उदाहरण
ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों पर चिंता जताते हुए अशोक मित्तल ने गुजरात, गाजियाबाद और चंडीगढ़ के कुछ मामलों का उल्लेख किया, जहाँ डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े विवादों ने परिवारों को गहरा नुकसान पहुँचाया। उनका कहना था कि ऐसी घटनाओं को केवल व्यक्तिगत समस्या मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता — इनके पीछे की व्यापक डिजिटल लत को समझना और उस पर नीतिगत कार्रवाई करना ज़रूरी है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य देते हुए मित्तल ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की दिशा में कदम उठाए जा चुके हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और डेनमार्क जैसे देश भी बच्चों की सोशल मीडिया पहुँच पर नियम बनाने पर विचार कर रहे हैं। उनके अनुसार, भारत को भी उम्र-आधारित सोशल मीडिया नियमन के लिए प्रभावी कानून बनाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
एज वेरिफिकेशन और एल्गोरिदम पर सवाल
मित्तल ने स्पष्ट किया कि महज 'हाँ-नहीं' के विकल्प से एज वेरिफिकेशन करना पर्याप्त नहीं है। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि निर्धारित उम्र से कम बच्चों को प्रतिबंधित कंटेंट या प्लेटफॉर्म तक पहुँच न मिल सके। उन्होंने टेलीकॉम और डिजिटल कंपनियों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि शैक्षणिक और मनोरंजन से जुड़े इस्तेमाल को अलग करने की दिशा में काम किया जाना चाहिए।
एल्गोरिदम के ज़रिए बच्चों को लगातार एक जैसा कंटेंट, विज्ञापन और मनोरंजन सामग्री दिखाए जाने को भी उन्होंने चिंता का विषय बताया और कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के कंटेंट पुश सिस्टम पर किसी-न-किसी स्तर पर नियमन आवश्यक है।
सामूहिक ज़िम्मेदारी और जागरूकता की ज़रूरत
भाजपा सांसद ने ज़ोर दिया कि केवल कानून बनाने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। स्कूलों और कॉलेजों में बच्चों को जागरूक करना, और अभिभावकों को डिजिटल लत के खतरों के बारे में शिक्षित करना भी उतना ही ज़रूरी है। उनके अनुसार, सरकार, शिक्षण संस्थान, अभिभावक और टेक्नोलॉजी कंपनियाँ — सभी को मिलकर काम करना होगा, तभी डिजिटल एडिक्शन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकेगा।
संसद गतिरोध, झारखंड और अन्य मुद्दे
संसद में जारी गतिरोध पर अशोक मित्तल ने विपक्ष से सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने देने की अपील की। उन्होंने कहा कि विपक्ष के पास संसद में अपनी बात रखने का पूरा मौका होता है और सदन चलने से विपक्ष को भी फायदा होगा, क्योंकि वह अपनी दलीलें जनता के सामने रख सकता है। झारखंड में छात्रों के प्रदर्शन पर उन्होंने कहा कि छात्रों की जायज माँगों को स्वीकार किया जाना चाहिए और अगर किसी स्तर पर सरकार से गलती हुई है तो उसे सुधारा जाए। सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात पर उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं के बीच पंजाब से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई होगी और उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री पंजाब के मुद्दों पर काम करेंगे। डिजिटल एडिक्शन पर नीतिगत चर्चा अब संसद से बाहर भी तेज़ होती दिख रही है और यह सवाल बना हुआ है कि सरकार इस दिशा में कब और कितना ठोस कदम उठाएगी।