सुप्रीम कोर्ट में 'राइट टू स्पोर्ट्स' पर सुनवाई, याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 21ए के तहत खेल को मौलिक अधिकार बनाने की माँग की
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अगस्त 2026 को संविधान के अनुच्छेद 21ए के अंतर्गत 'खेल के अधिकार' को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दिलाने की माँग वाली एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता डॉ. कनिष्क पांडे ने न्यायालय से आग्रह किया कि इस व्यापक संवैधानिक प्रश्न को 'फिजिकल लिटरेसी' जैसी संकुचित अवधारणा में सीमित न किया जाए।
मुख्य घटनाक्रम
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने टिप्पणी की, 'यह एक सराहनीय माँग है। यह बेहद जरूरी है। अब इस डिजिटल युग में, बच्चे खेल के मैदानों से पूरी तरह दूर होते जा रहे हैं।' यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि पीठ याचिका में उठाई गई चिंताओं को गंभीरता से ले रही है।
याचिका दायर होने के बाद न्यायालय ने मामले में सहायता के लिए एक एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किया था। न्याय मित्र की रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद याचिकाकर्ता ने उसके कुछ प्रमुख पहलुओं पर आपत्ति दर्ज कराई — विशेष रूप से रिपोर्ट में 'खेल' के व्यापक अधिकार की जगह 'फिजिकल लिटरेसी' को केंद्र में रखे जाने पर।
याचिकाकर्ता का तर्क
डॉ. पांडे ने स्पष्ट किया कि खेल, शारीरिक शिक्षा और फिजिकल लिटरेसी तीन पृथक अवधारणाएँ हैं और इन्हें परस्पर पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि 'खेल के अधिकार' के स्थान पर 'फिजिकल लिटरेसी' को स्थापित करने से याचिका का मूल उद्देश्य और उसका दायरा दोनों बदल जाएँगे।
उन्होंने न्यायालय के समक्ष कहा, 'इस पीआईएल का मकसद कभी भी सिर्फ चैंपियन बनाना या मेडल जीतना नहीं रहा है। खेल का दायरा प्रतिस्पर्धा में श्रेष्ठता से कहीं ज्यादा बड़ा है। यह लोगों को बेहतर बनाता है, समुदायों को मजबूत करता है और शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास में योगदान देता है। फिजिकल लिटरेसी, फिजिकल एजुकेशन और खेल एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते।'
खेल के व्यापक सामाजिक आयाम
याचिका में तर्क दिया गया है कि खेल केवल शारीरिक गतिविधि नहीं है — यह शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास, टीम वर्क और चरित्र निर्माण का माध्यम है। इसके साथ ही यह तनाव, नकारात्मकता और सामाजिक अलगाव को दूर करने तथा समुदायों में एकजुटता एवं समावेश को बढ़ावा देने में भी सहायक है।
गौरतलब है कि याचिका में खेल को शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, युवा विकास, सामुदायिक निर्माण और राष्ट्र निर्माण के एक साझा उपकरण के रूप में देखा गया है — न कि केवल प्रतिस्पर्धात्मक उत्कृष्टता के दृष्टिकोण से।
डिजिटल युग में खेल का संकट
याचिकाकर्ता ने इस बात पर भी बल दिया कि जैसे-जैसे बच्चे खेल के मैदानों से दूर होकर स्क्रीन की ओर बढ़ रहे हैं, खेल तक पहुँच को संवैधानिक मान्यता देना और भी अनिवार्य हो गया है। उन्होंने कहा, 'खेल के अधिकार का असल मकसद यह सुनिश्चित करना है कि खेलने का मौका सिर्फ कुछ खास लोगों तक ही सीमित न रहे।'
यह ऐसे समय में आया है जब देश में बाल मोटापा और स्क्रीन-टाइम से जुड़ी स्वास्थ्य चिंताएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं और सरकारी नीतियों में खेल अवसंरचना पर ध्यान अपेक्षाकृत कम रहा है।
आगे की राह
फिलहाल यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। डॉ. पांडे ने न्यायालय से अनुरोध किया है कि संवैधानिक स्थिति तय करने से पहले खेल को उसके समग्र सामाजिक, शैक्षिक और विकासात्मक संदर्भ में समझा जाए। इस पीआईएल का व्यापक लक्ष्य बच्चों और युवाओं के विकास में शिक्षा के साथ-साथ खेल को भी एक अनिवार्य तत्व के रूप में स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय विमर्श को दिशा देना है।