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शिलांग पीक रोपवे परियोजना: ₹151 करोड़ की योजना से मेघालय पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा, 2028 तक पूरा होगा काम

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शिलांग पीक रोपवे परियोजना: ₹151 करोड़ की योजना से मेघालय पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा, 2028 तक पूरा होगा काम

सारांश

शिलांग पीक तक पहुँचने की दशकों पुरानी परेशानी का हल अब ₹151 करोड़ की रोपवे परियोजना से निकाला जा रहा है। एनडीबी और पीएम-देवाइन की संयुक्त फंडिंग से बनने वाला यह 913 मीटर लंबा रोपवे 2028 तक तैयार होगा और 450 से अधिक रोजगार देगा।

मुख्य बातें

मेघालय सरकार की ₹151 करोड़ की शिलांग पीक रोपवे परियोजना को 14 अक्टूबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य है।
रोपवे 913 मीटर लंबा होगा और इसमें 11 यात्री केबिन व 2 अतिरिक्त केबिन शामिल होंगे।
फंडिंग में ₹80.89 करोड़ एनडीबी से और ₹70.11 करोड़ पीएम-देवाइन के तहत आएंगे।
परियोजना से 450 से अधिक प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने का अनुमान है।
केबल और केबिन पेड़ों की छतरी के ऊपर से गुजरेंगे; पेड़ कटान केवल 6 टावर स्थानों और 2 टर्मिनल तक सीमित रहेगी।
स्थानीय हितधारकों ने स्पष्टीकरणों का स्वागत किया, लेकिन आगे विचार-विमर्श से पहले और समय माँगा।

मेघालय सरकार की ₹151 करोड़ की शिलांग पीक रोपवे परियोजना इस लोकप्रिय पर्यटन स्थल तक पहुँच को सुगम बनाने, सड़कों पर यातायात का दबाव घटाने और स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के नए द्वार खोलने की दिशा में एक अहम कदम है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, इस परियोजना को 14 अक्टूबर 2028 तक पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

परियोजना की मुख्य विशेषताएँ

मेघालय रोपवे विकास प्राधिकरण (एमआरडीए) द्वारा कार्यान्वित की जा रही यह परियोजना 913 मीटर लंबी होगी। इसमें 11 यात्री केबिन के साथ 2 अतिरिक्त केबिन भी शामिल होंगे। प्रस्तावित ऊपरी टर्मिनल शिलांग पीक व्यूप्वाइंट से लगभग 80 मीटर नीचे बनाया जाएगा, ताकि पहाड़ी की मनोरम दृश्यावली सुरक्षित रहे और भारतीय वायुसेना की सुरक्षा संबंधी चिंताओं का भी समाधान हो सके।

निचला टर्मिनल मदन लाबान स्थित एक सरकारी वन नर्सरी में निर्मित करने की योजना है। अधिकारियों ने बताया कि पर्यावरण आकलन के अनुसार इससे किसी भी जल संग्रहण क्षेत्र पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ेगा।

वित्त पोषण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

परियोजना की कुल लागत में ₹80.89 करोड़ का अनुदान न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) द्वारा और ₹70.11 करोड़ प्रधानमंत्री की उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास पहल (पीएम-देवाइन) के तहत उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय के माध्यम से प्रदान किए जा रहे हैं।

गौरतलब है कि शिलांग पीक तक पहुँचने की कठिनाई वर्षों पुरानी समस्या है। पर्यटक पारंपरिक रूप से रक्षा नियंत्रण वाले क्षेत्रों से गुजरने वाले मार्गों पर निर्भर रहे हैं, जिन पर सुरक्षा प्रतिबंध लागू होते हैं। सरकारी प्रस्तुति के अनुसार, 2012 में मदन लाबान और अपर लुम्पारिंग से पैदल मार्गों का विकास शुरू हुआ था, किंतु खड़ी ढलानों के कारण वे सुगम नहीं रहे। इसके बाद 2019 में रोपवे का विचार सामने आया।

पर्यावरण सुरक्षा उपाय

अधिकारियों के अनुसार केबल और केबिन पेड़ों की छतरी के ऊपर से गुजरेंगे, जिससे वृक्ष कटान केवल 6 टावर स्थानों और 2 टर्मिनल स्टेशनों तक सीमित रहेगी। सरकार ने स्पष्ट किया कि टावर उमिव जल संग्रहण क्षेत्र और मावफलांग बांध क्षेत्र के बाहर स्थित होंगे। लुम शिलांग का पवित्र स्थल प्रस्तावित मार्ग से 3.15 किमी दूर है। एनडीबी की आवश्यकताओं के अनुसार एक स्वतंत्र पर्यावरण प्रभाव अध्ययन भी पूरा किया गया है।

सामुदायिक भागीदारी और रोजगार

इस परियोजना की ब्रीफिंग की सह-अध्यक्षता एमआरडीए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और पर्यटन विभाग के आयुक्त एवं सचिव ने की। रियात लाबान डोरबार पिल्लुन सहित स्थानीय हितधारकों के साथ परामर्श और स्थल निरीक्षण किए गए हैं। समुदाय के प्रतिनिधियों ने स्पष्टीकरणों का स्वागत किया, हालाँकि उन्होंने आगे विचार-विमर्श से पहले जानकारी की जाँच के लिए समय माँगा है।

परियोजना से पर्यटन, आतिथ्य, परिवहन और खुदरा क्षेत्र में 450 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होने का अनुमान है। व्यूप्वाइंट तक वाहनों की आवाजाही कम होने से भीड़भाड़ और प्रदूषण में भी कमी आने की उम्मीद जताई गई है।

आगे की राह

यह परियोजना उत्तर-पूर्व भारत में पर्यटन अवसंरचना को मजबूत करने की केंद्र सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। यदि समय-सीमा के भीतर पूरी होती है, तो शिलांग पीक रोपवे न केवल पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाएगा, बल्कि मेघालय की हरित और टिकाऊ पर्यटन नीति का एक व्यावहारिक उदाहरण भी बनेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन की होगी — उत्तर-पूर्व में बड़ी परियोजनाएँ प्रायः भूगोल, मौसम और सामुदायिक असहमति के चलते समय-सीमा चूकती रही हैं। एनडीबी और पीएम-देवाइन की दोहरी फंडिंग संरचना धन की उपलब्धता सुनिश्चित करती है, पर स्थानीय समुदायों का 'और समय चाहिए' वाला रुख संकेत देता है कि सहमति अभी पूरी तरह नहीं बनी है। 2028 की समयसीमा महत्वाकांक्षी है — खासकर तब, जब पर्यावरणीय मंजूरियाँ और सामुदायिक परामर्श अभी भी प्रक्रिया में हैं।
RashtraPress
23 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिलांग पीक रोपवे परियोजना क्या है?
यह मेघालय सरकार की ₹151 करोड़ की एक प्रस्तावित रोपवे परियोजना है, जो शिलांग पीक तक पर्यटकों की पहुँच को सुगम बनाने के लिए बनाई जा रही है। 913 मीटर लंबे इस रोपवे में 11 यात्री केबिन होंगे और इसे मेघालय रोपवे विकास प्राधिकरण (एमआरडीए) लागू कर रहा है।
शिलांग पीक रोपवे परियोजना कब तक पूरी होगी?
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, इस परियोजना को 14 अक्टूबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। हालाँकि, सामुदायिक परामर्श और पर्यावरणीय प्रक्रियाएँ अभी जारी हैं।
इस परियोजना की फंडिंग कहाँ से आ रही है?
परियोजना की कुल लागत ₹151 करोड़ में से ₹80.89 करोड़ न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) द्वारा और ₹70.11 करोड़ पीएम-देवाइन योजना के तहत उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय के माध्यम से दिए जा रहे हैं।
शिलांग पीक रोपवे से पर्यावरण पर क्या असर होगा?
अधिकारियों के अनुसार, एनडीबी की आवश्यकताओं के तहत एक पर्यावरण प्रभाव अध्ययन पूरा किया जा चुका है, जिसमें जल संग्रहण क्षेत्रों पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पाया गया। केबल पेड़ों की छतरी के ऊपर से गुजरेंगे और टावर उमिव जल संग्रहण क्षेत्र तथा मावफलांग बांध क्षेत्र के बाहर होंगे।
इस परियोजना से स्थानीय लोगों को क्या फायदा होगा?
परियोजना से पर्यटन, आतिथ्य, परिवहन और खुदरा क्षेत्र में 450 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है। इसके अलावा वाहनों की आवाजाही कम होने से सड़कों पर भीड़भाड़ और प्रदूषण में भी कमी आने की उम्मीद है।
राष्ट्र प्रेस
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