11 अक्टूबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली अधिकारियों को अवमानना नोटिस, 13 अक्टूबर तक मांगा जवाब

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सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली अधिकारियों को अवमानना नोटिस, 13 अक्टूबर तक मांगा जवाब

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रविवारीय सुनवाई में दिल्ली अधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी किया — 10 अक्टूबर को 45 मेट्रो स्टेशन बंद करने और 7,000 से अधिक लोगों की हिरासत पर। यह सीजेपी के जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद न्यायालय के 9 अक्टूबर के आदेश की सीधी अवज्ञा का मामला है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 11 अक्टूबर को विशेष सुनवाई में दिल्ली अधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी किया।
10 अक्टूबर को सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के 45 मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए थे।
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी के अनुसार, छात्र नेताओं और पत्रकारों सहित 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया।
अवमानना याचिका केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन , दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और DMRC चेयरपर्सन डी.
थारा के विरुद्ध दायर।
अधिकारियों को 13 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी है।
न्यायालय ने मेट्रो, इंटरनेट सेवाएँ सामान्य रखने और BNSS धारा 163 का बोर्ड हटाने का आदेश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 11 अक्टूबर 2026 को रविवार को आयोजित एक विशेष सुनवाई में दिल्ली सरकार के अधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी किया, क्योंकि 9 अक्टूबर के न्यायालय के उस आदेश का कथित तौर पर उल्लंघन किया गया, जिसमें विरोध प्रदर्शनों से पहले सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद न करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने अधिकारियों को 13 अक्टूबर, मंगलवार तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया, जिसमें मेट्रो पाबंदियों और रेलवे एडवाइजरी का पूरा विवरण शामिल हो।

मामले की पृष्ठभूमि

मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और SIR के विरुद्ध जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शनों के मद्देनज़र 10 अक्टूबर को दिल्ली के 45 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए थे, जिनमें अधिकतर मध्य दिल्ली और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में थे। इसके बाद मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और सीजेपी के प्रमुख नेताओं सहित विपक्षी सदस्यों को हिरासत में लिए जाने के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएँ दायर हुईं।

मुख्य मामला वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर अवमानना याचिका थी, जो केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) की चेयरपर्सन डी. थारा के खिलाफ दायर की गई थी।

विपक्ष की हिरासत पर सवाल

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने एक अलग याचिका में विरोध प्रदर्शनों के दौरान विपक्षी नेताओं — जिनमें चार पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल थे — की एहतियाती हिरासत को चुनौती दी। गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि छात्र नेताओं, पत्रकारों और राजनीतिक हस्तियों सहित 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया, और शांतिपूर्ण विरोध के मौलिक अधिकार को दबाने के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन का इस्तेमाल संविधान-सम्मत नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मेट्रो सेवाओं और इंटरनेट कनेक्टिविटी पर लगाए गए प्रतिबंधों ने नागरिकों की आवाजाही और न्याय तक पहुँच को बाधित किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन और संजय हेगड़े ने भी वकीलों पर कथित पाबंदियों और निषेधाज्ञा वाले इलाके से बाहर लोगों को हिरासत में लिए जाने पर चिंता व्यक्त की। पीठ को बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय परिसर के बाहर एकत्र होने के बाद लगभग 150 वकीलों को हिरासत में लिया गया और कुछ पुलिसकर्मी पहचान-पत्र (बैज) के बिना तैनात थे।

सरकार का पक्ष

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को बताया कि अधिकारियों के पास दस्तावेज़ और वीडियो साक्ष्य हैं, जिनसे पता चलता है कि दोपहर 2 बजे के आसपास हिरासत में लिए गए कुछ लोगों को शाम 6 बजे तक रिहा कर दिया गया था। मेहता ने यह भी आश्वासन दिया कि मेट्रो सेवाएँ और इंटरनेट कनेक्टिविटी सामान्य कर दी गई हैं और वकीलों के कार्य में कोई व्यवधान नहीं डाला जाएगा।

न्यायालय के निर्देश

पीठ ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि मेट्रो और रेलवे सेवाएँ सामान्य रूप से संचालित रहें, जब तक सार्वजनिक व्यवस्था में गंभीर गड़बड़ी न हो। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि नागरिकों की आवाजाही पर रोक न लगाई जाए, बैरिकेड्स की आवश्यकता की तुरंत समीक्षा की जाए, इंटरनेट सेवाएँ बिना किसी रुकावट के जारी रहें और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के बाहर लगा बोर्ड हटाया जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अंतर्गत अधिकारियों की शक्तियों को सीमित नहीं कर रहा।

जस्टिस मोहना ने प्रदर्शनकारियों से अपील की: 'आप सभी जो यहाँ मौजूद हैं, अगर आप सच में जनहित में रुचि रखते हैं, तो कृपया यह वचन दें कि आप सभी शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करेंगे और किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं उकसाएंगे।'

यह मामला नागरिक स्वतंत्रताओं, न्यायालय की अवमानना और सार्वजनिक व्यवस्था की परिभाषाओं को लेकर एक महत्त्वपूर्ण न्यायिक परीक्षण बन गया है। अब सभी की नज़रें 13 अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी हैं, जब दिल्ली के अधिकारियों को न्यायालय के सामने अपना जवाब दाखिल करना होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

पत्रकारों और वकीलों की कथित हिरासत एक साथ हुई — यह सवाल उठाता है कि क्या कानून-व्यवस्था की परिभाषा का विस्तार लोकतांत्रिक असहमति को समेटने की दिशा में हो रहा है। 13 अक्टूबर की सुनवाई तय करेगी कि न्यायालय इस बार अनुपालन के प्रति कितना सख्त रुख अपनाता है।
RashtraPress
11 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली अधिकारियों को अवमानना नोटिस क्यों जारी किया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 9 अक्टूबर के उस आदेश का कथित उल्लंघन किए जाने पर अवमानना नोटिस जारी किया, जिसमें विरोध प्रदर्शनों से पहले सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह बंद न करने का निर्देश था। इसके बावजूद 10 अक्टूबर को दिल्ली के 45 मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए।
13 अक्टूबर को अधिकारियों को क्या दाखिल करना है?
जस्टिस बागची और जस्टिस मोहना की पीठ ने अधिकारियों को 13 अक्टूबर तक एक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। इस रिपोर्ट में मेट्रो पाबंदियों और रेलवे एडवाइजरी का पूरा विवरण शामिल होना आवश्यक है।
सीजेपी का विरोध प्रदर्शन किस बात को लेकर था?
सीजेपी का विरोध प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR के विरुद्ध जंतर-मंतर पर आयोजित किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें चार पूर्व मुख्यमंत्री, छात्र नेता और पत्रकार शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में क्या-क्या आदेश दिए?
न्यायालय ने मेट्रो और रेलवे सेवाएँ सामान्य रखने, इंटरनेट सेवाएँ बिना रुकावट जारी रखने, BNSS धारा 163 का बोर्ड हटाने और बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी को हिरासत में न लेने का आदेश दिया। साथ ही वकीलों को उनके कार्य में बाधा न पहुँचाने का भी निर्देश जारी हुआ।
क्या इंटरनेट और मेट्रो सेवाएँ बहाल हो गई हैं?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को आश्वासन दिया कि मेट्रो सेवाएँ और इंटरनेट कनेक्टिविटी सामान्य कर दी गई हैं। जस्टिस बागची की पीठ ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए इन सुविधाओं के निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करने का आदेश दिया।
राष्ट्र प्रेस
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