सुप्रीम कोर्ट का IOCL को आदेश: लिंग-भेद से नौकरी न देना 'नारीत्व का अपमान', ₹12 लाख मुआवजा दो
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 17 सितंबर 2026 को इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) को एक महिला को ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे कथित तौर पर केवल महिला होने के कारण गुढ़ा स्थित IOCL के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में कैजुअल खलासी/प्यून पद पर नियुक्ति से वंचित किया गया था। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इसे 'नारीत्व का अपमान' करार देते हुए सरकारी उपक्रम के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद दशकों पुराना है। डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली एक समिति ने नौकरी के लिए 49 उम्मीदवारों के नाम सिफारिश किए थे, जिनमें यह महिला भी शामिल थी। इंटरव्यू के बाद 43 उम्मीदवारों का चयन हुआ, लेकिन इस महिला को बाहर कर दिया गया।
IOCL का तर्क था कि इस काम में शारीरिक मेहनत — एलपीजी सिलेंडर उठाना और नाइट शिफ्ट — शामिल है, इसलिए महिला उपयुक्त नहीं है। IOCL के वकील ने यह भी दलील दी कि उम्मीदवारों की सूची महज एक सिफारिश थी, जिसे मानने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं थी।
निचली अदालतों का सफर
ट्रायल कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया और IOCL को उन्हें कैजुअल कर्मचारी या प्रशासनिक/प्यून पद पर रखने का निर्देश दिया। IOCL ने इसे पहली अपीलेट कोर्ट में चुनौती दी, जिसने 22 सितंबर 1990 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए 6 अगस्त 1993 को महिला की याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद मामला पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय पहुँचा। जस्टिस विकास बहल की एकल पीठ ने 14 अक्टूबर 2025 को पहली अपीलेट कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए महिला की अपील खारिज कर दी। उच्च न्यायालय का मत था कि जिला प्रशासन की सिफारिश किसी कानूनी प्रावधान पर आधारित नहीं थी और चयन सूची में नाम आने मात्र से नियुक्ति का अधिकार नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
सर्वोच्च न्यायालय ने IOCL के इस रुख को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, 'आपने सिर्फ इसलिए उसे नौकरी नहीं दी, क्योंकि वह एक महिला है? यह नारीत्व का अपमान है।'
पीठ ने IOCL के 'शारीरिक मेहनत' वाले तर्क को भी खारिज करते हुए कहा, 'हम भारत से हैं और हर दिन हम कहते हैं कि हम महिलाओं का सम्मान करते हैं और वे देवी के समान हैं। यह नारीत्व का अपमान है और वह भी भारत सरकार के एक उपक्रम द्वारा। वे रोजाना अपने घरों में गैस सिलेंडर उठाती हैं। जब पुरुष घर पर नहीं होते, तो वही गैस सिलेंडर बदलती हैं।'
मुआवजे का फैसला
चूँकि महिला अब सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुँच चुकी है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने उसे नौकरी देने के बजाय ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा दिलाना उचित समझा। कोर्ट ने कहा, 'वह अब रिटायरमेंट की उम्र तक पहुँच चुकी है, लेकिन उसने लगातार अपने अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी है। हम उसे एकमुश्त मुआवजा देंगे।'
आगे का महत्व
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में लैंगिक भेदभाव को लेकर बहस तेज है। गौरतलब है कि यह मामला लगभग तीन दशकों से न्यायालयों में चल रहा था, जो दर्शाता है कि पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय की राह कितनी लंबी और कठिन हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी भविष्य में नियोक्ताओं — विशेषकर सरकारी उपक्रमों — के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि लिंग के आधार पर नियुक्ति से इनकार संविधान-सम्मत नहीं है।