17 सितंबर 2026
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केरल हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर की पोस्ट-ऑपरेटिव सहायता याचिका पर राज्य सरकार से मांगा जवाब

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केरल हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर की पोस्ट-ऑपरेटिव सहायता याचिका पर राज्य सरकार से मांगा जवाब

सारांश

केरल हाई कोर्ट में एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की याचिका — जिन्हें लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद सरकारी योजना की ₹21,000 की बकाया राशि नहीं मिली — ने एक बड़े सवाल को उजागर किया है: क्या कल्याण योजनाएँ सिर्फ़ कागज़ों पर हैं?

मुख्य बातें

केरल हाई कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की पोस्ट-ऑपरेटिव सहायता याचिका पर राज्य सरकार से जवाब माँगा।
याचिकाकर्ता को 14 नवंबर 2018 के सरकारी आदेश के तहत ₹36,000 (₹3,000 प्रति माह, 12 महीने) की सहायता मिलनी थी।
केवल पाँच महीने की ₹15,000 दी गई; शेष ₹21,000 अब तक बकाया है।
न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर के लिए निर्धारित की।
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 और जेन कौशिक बनाम भारत संघ के सर्वोच्च न्यायालय फैसले का हवाला दिया।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि ट्रांसजेंडर कल्याण की कुछ धनराशि अनुपयोगी रहकर सरकारी खाते में वापस चली जाती है।

केरल हाई कोर्ट ने गुरुवार, 17 सितंबर 2026 को एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की याचिका पर केरल राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। याचिका में लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद मिलने वाली पोस्ट-ऑपरेटिव वित्तीय सहायता की शेष राशि ₹21,000 न दिए जाने का मुद्दा उठाया गया है। मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को होगी।

मामले का पूरा घटनाक्रम

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार से हैं और वर्तमान में बेरोज़गार हैं। उन्होंने लिंग परिवर्तन सर्जरी कराई थी, जिसके लिए राज्य सरकार ने पहले ₹62,563 की वित्तीय सहायता प्रदान की थी।

सर्जरी के बाद पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल एवं उपचार के लिए उन्होंने वित्तीय सहायता हेतु आवेदन किया, जिसमें उन्होंने 14 नवंबर 2018 को जारी राज्य सरकार के आदेश का हवाला दिया।

सरकारी योजना का प्रावधान और उल्लंघन का आरोप

राज्य सरकार के उक्त आदेश के अनुसार, लिंग परिवर्तन सर्जरी करा चुके ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को 12 महीने तक प्रति माह ₹3,000 की सहायता दी जाती है, जो कुल ₹36,000 बनती है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि उन्हें केवल पाँच महीने के लिए ₹15,000 ही मिले, जबकि शेष सात महीनों की ₹21,000 की राशि अब तक नहीं दी गई। बकाया राशि के लिए उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया, परंतु कोई भुगतान नहीं हुआ।

संवैधानिक अधिकारों का हवाला

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सहायता राशि न देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अपने पक्ष के समर्थन में उन्होंने जेन कौशिक बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भी हवाला दिया।

याचिका में अदालत से अधिकारियों को शेष ₹21,000 जारी करने का आदेश देने की मांग की गई है। अंतरिम राहत के तौर पर सामाजिक न्याय निदेशक के समक्ष दायर अर्जी पर शीघ्र विचार करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है।

व्यापक समस्या का संकेत

याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि ट्रांसजेंडर समुदाय के अन्य सदस्यों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, उनके कल्याण के लिए जारी की गई कुछ धनराशि का पूरा उपयोग नहीं हो पाता और बाद में वह सरकारी खजाने में वापस चली जाती है। इसके कारण कई पात्र लाभार्थी निर्धारित सहायता से वंचित रह जाते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब ट्रांसजेंडर समुदाय के कल्याण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जारी है।

हाई कोर्ट का निर्देश और आगे की राह

न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने सरकारी पक्ष को निर्देश प्राप्त करने के लिए समय दिया और मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर के लिए निर्धारित की। अब सबकी नज़रें इस बात पर हैं कि राज्य सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या याचिकाकर्ता को समय पर न्याय मिल पाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 की बकाया राशि का नहीं है — यह उस प्रणालीगत खामी को उजागर करता है जिसमें कल्याण योजनाएँ घोषणा के स्तर पर मज़बूत और क्रियान्वयन के स्तर पर खोखली साबित होती हैं। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता का यह दावा — कि अनुपयोगी धनराशि वापस लौट जाती है — सत्यापित हो तो यह राज्य की बजट-अवशोषण क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ट्रांसजेंडर कल्याण के प्रति भारतीय न्यायपालिका की संवेदनशीलता बढ़ी है, किंतु न्यायालय के दरवाज़े तक पहुँचने की बाध्यता स्वयं बताती है कि प्रशासनिक जवाबदेही अभी भी अपर्याप्त है।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल हाई कोर्ट में ट्रांसजेंडर की याचिका किस बारे में है?
एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ने केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की है जिसमें लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद मिलने वाली सरकारी योजना की बकाया राशि ₹21,000 दिलाने की मांग की गई है। राज्य सरकार के 14 नवंबर 2018 के आदेश के तहत कुल ₹36,000 मिलने थे, लेकिन केवल ₹15,000 ही मिले।
केरल सरकार की ट्रांसजेंडर पोस्ट-ऑपरेटिव सहायता योजना क्या है?
14 नवंबर 2018 के सरकारी आदेश के तहत लिंग परिवर्तन सर्जरी करा चुके ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को 12 महीने तक प्रति माह ₹3,000 की सहायता दी जाती है, जो कुल ₹36,000 होती है। यह राशि पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल और उपचार खर्च के लिए दी जाती है।
मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर 2026 के लिए निर्धारित की है। तब तक राज्य सरकार से अपना पक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया है।
याचिकाकर्ता ने किन संवैधानिक अधिकारों का हवाला दिया है?
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि सहायता राशि न देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के जेन कौशिक बनाम भारत संघ फैसले का भी हवाला दिया है।
क्या यह समस्या केवल इस एक व्यक्ति तक सीमित है?
नहीं, याचिकाकर्ता का दावा है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के अन्य सदस्यों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कल्याण की कुछ धनराशि अनुपयोगी रहकर सरकारी खाते में वापस चली जाती है। इससे कई पात्र लाभार्थी निर्धारित सहायता से वंचित रह जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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