12 जुलाई 2026
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ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से सभी याचिकाएँ स्थानांतरित करने का अनुरोध किया

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ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से सभी याचिकाएँ स्थानांतरित करने का अनुरोध किया

सारांश

केंद्र सरकार चाहती है कि ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम 2026 को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में एकत्रित हों। राजस्थान, केरल, कर्नाटक और दिल्ली उच्च न्यायालयों में अलग-अलग सुनवाई से परस्पर विरोधी फैसलों का खतरा है — और मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल सुनवाई के संकेत दिए हैं।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने 27 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएँ स्थानांतरित करने का अनुरोध किया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि अलग-अलग उच्च न्यायालयों में सुनवाई से विरोधाभासी फैसलों का खतरा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि उच्च न्यायालयों के अलग-अलग विचार कभी-कभी उपयोगी होते हैं; तत्काल सुनवाई पर विचार का आश्वासन दिया।
याचिकाओं में आरोप है कि संशोधन एनएएलएसए फैसले की 'स्व-पहचान' की अवधारणा को कमज़ोर करता है और अनुच्छेद 14, 19(1)(ए) व 21 का उल्लंघन करता है।
दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक और केरल उच्च न्यायालयों में इसी कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएँ लंबित हैं।
इस महीने की शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही नोटिस जारी कर मामला तीन न्यायाधीशों की पीठ को सौंपने का निर्देश दिया था।

केंद्र सरकार ने 27 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली सभी लंबित याचिकाओं को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित किया जाए। सरकार की यह माँग इसलिए आई है क्योंकि राजस्थान, केरल, कर्नाटक और दिल्ली समेत कई उच्च न्यायालयों में एक ही कानून को चुनौती देने वाली अलग-अलग याचिकाएँ लंबित हैं, जिनसे परस्पर विरोधी फैसलों की संभावना बन सकती है।

केंद्र का तर्क और सॉलिसिटर जनरल का पक्ष

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष केंद्र सरकार की ट्रांसफर याचिका का उल्लेख किया। उन्होंने तर्क दिया कि अलग-अलग उच्च न्यायालयों में एक ही संशोधित कानून पर सुनवाई से विरोधाभासी निर्णयों का खतरा है।

मेहता ने अनुरोध किया, 'हमने ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम से जुड़ी याचिकाओं को इस अदालत में स्थानांतरित करने के लिए आवेदन दिया है। क्या इस ट्रांसफर याचिका को शुक्रवार को सूचीबद्ध किया जा सकता है? अगर नोटिस जारी होता है, तो हम उच्च न्यायालयों से सुनवाई रोकने को कह सकते हैं।'

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने केंद्र के अनुरोध पर तत्काल सहमति नहीं जताई। उन्होंने कहा कि कभी-कभी उच्च न्यायालयों के अलग-अलग विचार भी उपयोगी होते हैं और अलग-अलग राय होना बेहतर हो सकता है। तथापि, उन्होंने यह भी कहा कि शीर्ष अदालत इस मामले की तत्काल सुनवाई पर विचार करेगी।

गौरतलब है कि इस महीने की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस संशोधित कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब माँगा था और मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया था।

याचिकाओं में मुख्य आरोप

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक एनएएलएसए फैसले में मान्यता प्राप्त 'स्व-पहचान' के सिद्धांत को कमज़ोर करता है। उनका कहना है कि संशोधन में चिकित्सा प्रमाणन और राज्य-नियंत्रित सत्यापन की व्यवस्था शामिल की गई है, जो लिंग पहचान को स्व-घोषित मानने के बजाय आधिकारिक जाँच के अधीन कर देती है।

याचिकाओं में यह भी तर्क दिया गया है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है।

विभिन्न उच्च न्यायालयों में स्थिति

दिल्ली उच्च न्यायालय पहले ही इस संशोधित अधिनियम को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चुका है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने 'नई भोर संस्था' नामक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र से जवाब माँगा है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय में दो ट्रांसवुमन ने याचिका दायर कर कहा है कि नया कानून स्व-पहचान के अधिकार को मान्यता नहीं देता। केरल उच्च न्यायालय भी इस बात की जाँच कर रहा है कि क्या संशोधित कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा को सीमित करता है और क्या पहचान प्रमाण के लिए मेडिकल परीक्षण की अनिवार्यता उचित है।

आगे क्या होगा

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को लेकर देशभर में व्यापक बहस छिड़ी हुई है। केंद्र की ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई की तारीख तय होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इन सभी याचिकाओं को एकत्रित कर एकीकृत सुनवाई करेगा या उच्च न्यायालयों को अपनी-अपनी सुनवाई जारी रखने देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला ट्रांसजेंडर अधिकारों की न्यायिक व्याख्या की दिशा तय करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो कई उच्च न्यायालयों में अलग-अलग सुनवाई की तुलना में कहीं अधिक अनुकूल स्थिति है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कि 'अलग-अलग राय उपयोगी होती है', संकेत देती है कि न्यायपालिका इस मामले को जल्दबाजी में एकत्रित नहीं करना चाहती। असली प्रश्न यह है कि क्या एनएएलएसए फैसले की भावना — जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं स्थापित किया था — को एक संशोधित कानून के ज़रिए संसद द्वारा पलटा जा सकता है। यह टकराव न्यायिक मिसाल और विधायी शक्ति के बीच की सीमाओं की परीक्षा होगी।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 क्या है?
यह 2019 के मूल ट्रांसजेंडर अधिकार कानून में किया गया संशोधन है, जिसमें कथित तौर पर लिंग पहचान के लिए चिकित्सा प्रमाणन और राज्य-नियंत्रित सत्यापन की व्यवस्था जोड़ी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह संशोधन स्व-पहचान के अधिकार को सीमित करता है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय के एनएएलएसए फैसले में मान्यता दी गई थी।
केंद्र सरकार ने याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने का अनुरोध क्यों किया?
केंद्र का तर्क है कि राजस्थान, केरल, कर्नाटक और दिल्ली उच्च न्यायालयों में एक ही कानून पर अलग-अलग सुनवाई से परस्पर विरोधी फैसलों की संभावना है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत में एकीकृत सुनवाई का अनुरोध किया ताकि कानूनी स्थिति एकसमान रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अब तक क्या कदम उठाए हैं?
इस महीने की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने नोटिस जारी कर केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब माँगा था और मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ को सौंपने का निर्देश दिया था। 27 मई को मुख्य न्यायाधीश ने तत्काल सुनवाई पर विचार का संकेत दिया।
याचिकाओं में किन संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप है?
याचिकाओं में आरोप है कि संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है। साथ ही यह एनएएलएसए फैसले में स्थापित 'स्व-पहचान' के सिद्धांत के विरुद्ध बताया गया है।
इस मामले में विभिन्न उच्च न्यायालयों की क्या स्थिति है?
दिल्ली उच्च न्यायालय केंद्र को नोटिस जारी कर चुका है; राजस्थान उच्च न्यायालय एनजीओ 'नई भोर संस्था' की याचिका पर सुनवाई कर रहा है; कर्नाटक उच्च न्यायालय में दो ट्रांसवुमन की याचिका लंबित है; और केरल उच्च न्यायालय मेडिकल परीक्षण की अनिवार्यता की जाँच कर रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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