शशि थरूर: ट्रांसजेंडर व्यक्ति को नागरिक अधिकारों का हकदार होना चाहिए
सारांश
Key Takeaways
- शशि थरूर ने विधेयक पर चिंता जताई है।
- विधेयक में पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड से सत्यापन अनिवार्य है।
- ट्रांसजेंडर की परिभाषा अधिक सीमित की गई है।
- यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय को कानूनी रूप से अदृश्य बना सकता है।
- अधिकारों के विस्तार की आवश्यकता है।
नई दिल्ली, 22 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर संसद की कार्यवाही से संबंधित जानकारियों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026' का उल्लेख करते हुए दो पोस्ट किए।
पहले पोस्ट में शशि थरूर ने कहा कि केरल में चल रहे विधानसभा चुनाव के कारण मैं संसद को मिस करूंगा, लेकिन फिर भी मैं वहां हो रहे विधायी घटनाक्रमों पर नज़र रख रहा हूं। लोकसभा में पेश किए गए 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026' को लेकर मुझे गहरी चिंता है। इसे काफी गुप्त तरीके से पेश किया गया है, जिसमें संबंधित पक्षों से उचित परामर्श नहीं लिया गया। यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक एनएएलएसए (2014) फैसले के बाद स्थापित अधिकार-आधारित ढांचे में एक बुनियादी उलटफेर की तरह प्रतीत होता है।
उन्होंने कहा कि इन संशोधनों के माध्यम से 2019 के अधिनियम की धारा 4(2) को हटा दिया गया है, जो अपनी लैंगिक पहचान को खुद तय करने का अधिकार देती थी। इसके स्थान पर अब एक ऐसी व्यवस्था लाई गई है जिसमें पहचान को मान्यता मिलने से पूर्व मेडिकल बोर्ड से सत्यापन और सरकारी अधिकारियों से प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होगा। वास्तव में, अब सरकार यह तय करेगी कि कोई नागरिक खुद को क्या समझता है— यह एक ऐसा हस्तक्षेप है जो गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक वादे के साथ मेल नहीं खाता।
शशि थरूर ने कहा कि 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति' की परिभाषा को बहुत ज्यादा सीमित कर देना भी चिंताजनक है। इससे ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिलाएं, नॉन-बाइनरी और लैंगिक रूप से विविध लोग, जिन्हें पहले कानून के तहत मान्यता मिली थी, अब इस दायरे से बाहर हो सकते हैं। यह विधेयक लैंगिक-पुष्टि सर्जरी की जानकारी अधिकारियों को देना अनिवार्य बनाता है, जिससे निजता की गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं। यह इस बात की आशंका बढ़ाता है कि सरकार लोगों के बेहद निजी मेडिकल फैसलों का एक रजिस्टर बना सकती है—जो निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के पुट्टास्वामी फैसले के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कहा कि इन प्रावधानों के कारण भारत के ट्रांसजेंडर समुदाय के एक बड़े हिस्से को कानूनी रूप से अदृश्य बनाने का खतरा बनता है। ऐसे विधेयकों को उचित जांच-पड़ताल के लिए स्थायी समिति के पास भेजा जाना चाहिए। उम्मीद है कि अंततः तर्क और संवैधानिक नैतिकता इस प्रतिगामी प्रस्ताव पर भारी पड़ेंगे।
केरल के तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने दूसरे पोस्ट में कहा कि सरकार का तर्क है कि इन संशोधनों से यह सुनिश्चित होगा कि कल्याणकारी योजनाएं 'असली लाभार्थियों' तक पहुंचे। लेकिन जब पात्रता के दायरे को सीमित किया जाता है तो कई असली लाभार्थियों के छूट जाने का खतरा बढ़ जाता है। जिन लोगों को कानून मान्यता नहीं देता, उन तक सुरक्षा कैसे पहुंच सकती है?
उन्होंने कहा कि सुरक्षा उपायों—जैसे कि रोजगार के अधिकार, आरक्षण, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और ट्रांसजेंडर बच्चों की सुरक्षा—को मजबूत करने के बजाय, ऐसा लगता है कि ध्यान पात्रता की जांच को अधिक कड़ा करने पर है। यह उस बात के बिल्कुल विपरीत है जिसकी हममें से कई लोग लंबे समय से वकालत कर रहे हैं। इसमें 2024 में उनके द्वारा पेश किया गया 'निजी सदस्य विधेयक' भी शामिल है।
शशि थरूर ने कहा कि हमें अधिकारों के विस्तार की जरूरत है, ट्रांसजेंडर समुदायों के साथ सार्थक परामर्श, मजबूत सामाजिक सुरक्षा उपाय, और 'क्षैतिज आरक्षण' जैसे नीतिगत कदम। ट्रांसजेंडर व्यक्ति भी नागरिक हैं और समान अधिकारों के हकदार हैं। कोई भी ऐसा कानून जो इस सिद्धांत को कमजोर करता है, वह हमारे संविधान के वादे को पूरा करने में विफल रहता है।