ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्टों की सुनवाई पर लगाई रोक, 3 अगस्त को अगली तारीख
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 16 जून 2025 को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई पर तत्काल रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने केंद्र सरकार की स्थानांतरण याचिका पर नोटिस जारी करते हुए सभी याचिकाकर्ताओं से जवाब माँगा है।
मुख्य घटनाक्रम
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ के समक्ष तर्क रखा कि एक ही केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता को एक साथ कई हाईकोर्टों में चुनौती दी जा रही है, जबकि इससे संबंधित मामले पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने आशंका जताई कि इस स्थिति में एक ही संवैधानिक प्रश्न पर अलग-अलग और संभवतः विरोधाभासी निर्णय सामने आ सकते हैं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह या तो सभी मामलों की सुनवाई स्वयं अपने पास रखेगा, अथवा किसी एक हाईकोर्ट को यह जिम्मेदारी सौंपेगा — ताकि न्यायिक एकरूपता बनी रहे। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को निर्धारित की गई है।
नालसा फैसले का संदर्भ
मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'नालसा' फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि हाईकोर्टों के लिए उस निर्णय में स्थापित सिद्धांतों के विपरीत राय देना न्यायिक दृष्टि से कठिन होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस मुद्दे पर बड़ी पीठ द्वारा विचार किए जाने की आवश्यकता पड़ सकती है।
गौरतलब है कि 'नालसा' फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को आत्म-पहचान के आधार पर लैंगिक पहचान का अधिकार दिया था। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नया संशोधन इसी अधिकार को कमज़ोर करता है।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने केंद्र की स्थानांतरण माँग का विरोध किया। उनका तर्क था कि संशोधित कानून को चुनौती केवल 'नालसा' फैसले के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी दी गई है कि यह कानून 'न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इसका कोई चिकित्सीय आधार भी नहीं है।'
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि संशोधन में चिकित्सा प्रमाणन और सरकारी सत्यापन की अनिवार्य व्यवस्था कर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान को सरकारी नियंत्रण के दायरे में लाया गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
पृष्ठभूमि और पूर्व कार्रवाई
यह ऐसे समय में सामने आया है जब दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही इस कानून के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर चुका है। इसी प्रकार की याचिकाएँ राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में भी लंबित हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को चुनौती देने वाली एक याचिका पर नोटिस जारी कर मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया था।
पिछले महीने भी मेहता ने इस मामले की त्वरित सुनवाई की माँग की थी, जिस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा था कि कभी-कभी अलग-अलग हाईकोर्टों की राय उपयोगी हो सकती है — हालाँकि मामले को जल्द सूचीबद्ध करने पर विचार का आश्वासन दिया था।
आगे क्या होगा
अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो विकल्प हैं — या तो वह सभी याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर स्वयं सुने, या किसी एक हाईकोर्ट को नोडल अदालत बनाए। 3 अगस्त की सुनवाई में यह तय होगा कि इस संवैधानिक प्रश्न की अंतिम सुनवाई किस मंच पर होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मामला बड़ी पीठ को सौंपा गया, तो यह ट्रांसजेंडर अधिकारों पर 'नालसा' के बाद का सबसे महत्त्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप हो सकता है।