31 जुलाई 2026
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ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्टों की सुनवाई पर लगाई रोक, 3 अगस्त को अगली तारीख

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ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्टों की सुनवाई पर लगाई रोक, 3 अगस्त को अगली तारीख

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चार हाईकोर्टों की सुनवाई रोक दी है। केंद्र का तर्क है कि विरोधाभासी फैसलों से बचने के लिए एकल मंच पर सुनवाई ज़रूरी है। नालसा फैसले और मौलिक अधिकारों का सवाल अब सीधे सर्वोच्च न्यायालय के सामने है।

मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 की संवैधानिक वैधता पर दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में सुनवाई पर रोक लगाई।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी.
मोहन की पीठ ने केंद्र की स्थानांतरण याचिका पर सभी पक्षों को नोटिस जारी किया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक ही संवैधानिक प्रश्न पर कई हाईकोर्टों से विरोधाभासी फैसले आ सकते हैं; बड़ी पीठ के गठन का भी संकेत दिया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि संशोधन 'नालसा' फैसले में मान्यता प्राप्त आत्म-पहचान के अधिकार को कमज़ोर करता है और इसका कोई चिकित्सीय आधार नहीं है।
मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को निर्धारित; तब तय होगा कि सुनवाई सुप्रीम कोर्ट करेगा या किसी एक हाईकोर्ट को सौंपेगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने 16 जून 2025 को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई पर तत्काल रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने केंद्र सरकार की स्थानांतरण याचिका पर नोटिस जारी करते हुए सभी याचिकाकर्ताओं से जवाब माँगा है।

मुख्य घटनाक्रम

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ के समक्ष तर्क रखा कि एक ही केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता को एक साथ कई हाईकोर्टों में चुनौती दी जा रही है, जबकि इससे संबंधित मामले पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने आशंका जताई कि इस स्थिति में एक ही संवैधानिक प्रश्न पर अलग-अलग और संभवतः विरोधाभासी निर्णय सामने आ सकते हैं।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह या तो सभी मामलों की सुनवाई स्वयं अपने पास रखेगा, अथवा किसी एक हाईकोर्ट को यह जिम्मेदारी सौंपेगा — ताकि न्यायिक एकरूपता बनी रहे। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को निर्धारित की गई है।

नालसा फैसले का संदर्भ

मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'नालसा' फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि हाईकोर्टों के लिए उस निर्णय में स्थापित सिद्धांतों के विपरीत राय देना न्यायिक दृष्टि से कठिन होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस मुद्दे पर बड़ी पीठ द्वारा विचार किए जाने की आवश्यकता पड़ सकती है।

गौरतलब है कि 'नालसा' फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को आत्म-पहचान के आधार पर लैंगिक पहचान का अधिकार दिया था। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नया संशोधन इसी अधिकार को कमज़ोर करता है।

याचिकाकर्ताओं का पक्ष

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने केंद्र की स्थानांतरण माँग का विरोध किया। उनका तर्क था कि संशोधित कानून को चुनौती केवल 'नालसा' फैसले के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी दी गई है कि यह कानून 'न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इसका कोई चिकित्सीय आधार भी नहीं है।'

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि संशोधन में चिकित्सा प्रमाणन और सरकारी सत्यापन की अनिवार्य व्यवस्था कर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान को सरकारी नियंत्रण के दायरे में लाया गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

पृष्ठभूमि और पूर्व कार्रवाई

यह ऐसे समय में सामने आया है जब दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही इस कानून के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर चुका है। इसी प्रकार की याचिकाएँ राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में भी लंबित हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को चुनौती देने वाली एक याचिका पर नोटिस जारी कर मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया था।

पिछले महीने भी मेहता ने इस मामले की त्वरित सुनवाई की माँग की थी, जिस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा था कि कभी-कभी अलग-अलग हाईकोर्टों की राय उपयोगी हो सकती है — हालाँकि मामले को जल्द सूचीबद्ध करने पर विचार का आश्वासन दिया था।

आगे क्या होगा

अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो विकल्प हैं — या तो वह सभी याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर स्वयं सुने, या किसी एक हाईकोर्ट को नोडल अदालत बनाए। 3 अगस्त की सुनवाई में यह तय होगा कि इस संवैधानिक प्रश्न की अंतिम सुनवाई किस मंच पर होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मामला बड़ी पीठ को सौंपा गया, तो यह ट्रांसजेंडर अधिकारों पर 'नालसा' के बाद का सबसे महत्त्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है — क्या केंद्र सरकार विभिन्न हाईकोर्टों में संभावित प्रतिकूल अंतरिम आदेशों से बचने के लिए स्थानांतरण माँग रही है? 'नालसा' फैसले के एक दशक बाद भी ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की आत्म-पहचान का अधिकार विधायी और न्यायिक खींचतान में फँसा है। संशोधन में चिकित्सा प्रमाणन की अनिवार्यता वही पुरानी राज्य-नियंत्रण की प्रवृत्ति है जिसे 'नालसा' ने खारिज किया था। बड़ी पीठ के गठन की संभावना इस विवाद को और लंबा खींच सकती है — और तब तक संशोधित कानून लागू रहेगा।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधन कानून पर हाईकोर्टों की सुनवाई क्यों रोकी?
सुप्रीम कोर्ट ने यह रोक इसलिए लगाई ताकि एक ही संवैधानिक प्रश्न पर चार अलग-अलग हाईकोर्टों से विरोधाभासी फैसले न आएँ। केंद्र सरकार ने सभी मामलों को एकल मंच पर स्थानांतरित करने की माँग की थी, जिसे पीठ ने उचित पाया।
ट्रांसजेंडर पर्सन्स अमेंडमेंट एक्ट 2026 में क्या विवादास्पद प्रावधान हैं?
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, संशोधन में चिकित्सा प्रमाणन और सरकारी सत्यापन को अनिवार्य बनाया गया है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की लैंगिक पहचान को सरकारी नियंत्रण में ले आता है। उनका कहना है कि यह 'नालसा' फैसले में मान्यता प्राप्त आत्म-पहचान के अधिकार के विरुद्ध है और इसका कोई चिकित्सीय आधार भी नहीं है।
नालसा फैसला क्या है और इस मामले में इसकी क्या भूमिका है?
नालसा फैसला सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय है जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को आत्म-पहचान के आधार पर लैंगिक पहचान का संवैधानिक अधिकार दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 2026 का संशोधन इसी अधिकार को कमज़ोर करता है, जबकि केंद्र का कहना है कि हाईकोर्टों के लिए इस फैसले के विपरीत राय देना कठिन होगा।
इस मामले में आगे क्या होगा?
मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में होगी। तब यह तय किया जाएगा कि सभी याचिकाओं की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट स्वयं करेगा या किसी एक हाईकोर्ट को यह जिम्मेदारी सौंपेगा। सॉलिसिटर जनरल ने बड़ी पीठ के गठन का भी संकेत दिया है।
कौन-कौन से हाईकोर्ट इस मामले में शामिल हैं?
दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएँ लंबित थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी अदालतों में आगे की सुनवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है।
राष्ट्र प्रेस
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