22 जुलाई 2026
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दल-बदल कानून बेअसर हो रहा है: कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका, CJI ने दिया सुनवाई का आश्वासन

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दल-बदल कानून बेअसर हो रहा है: कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका, CJI ने दिया सुनवाई का आश्वासन

सारांश

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है — सवाल यह है कि 'विलय' की आड़ में दल-बदल कानून को कब तक दरकिनार किया जाता रहेगा। दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की व्याख्या पर यह मामला संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद को छूता है।

मुख्य बातें

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने 20 जुलाई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में दल-बदल कानून की अप्रभाविता को लेकर याचिका दायर की।
याचिका संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 में 'विलय' प्रावधान की उस व्याख्या को चुनौती देती है जिससे दल-बदल कानून को दरकिनार किया जा सकता है।
CJI न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आश्वासन दिया।
शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद सावंत की अलग याचिका भी लंबित है, जो लोकसभा अध्यक्ष के छह सांसदों के विलय को मान्यता देने के निर्णय को चुनौती देती है।
इसी तरह की एक याचिका शिवसेना (UBT) द्वारा पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने 20 जुलाई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है, जिसमें तर्क दिया गया है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी होता जा रहा है। 22 जुलाई को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सिब्बल ने इस मामले का उल्लेख करते हुए शीघ्र सुनवाई की माँग की, जिस पर CJI ने मामले को सूचीबद्ध करने का आश्वासन दिया।

याचिका का मूल आधार

सिब्बल की याचिका दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की उस व्याख्या को चुनौती देती है, जिसके अंतर्गत किसी दल से अलग हुए विधायक या सांसद 'विलय' का रास्ता अपनाकर दलबदल-रोधी प्रावधानों के दायरे से बाहर निकल सकते हैं। उनका तर्क है कि इस व्याख्या का दुरुपयोग हो रहा है और इससे संसद तथा विधानसभाओं की संरचना संवैधानिक मंशा के विपरीत बदली जा रही है।

पीठ के सामने सिब्बल ने कहा, 'मैंने खुद एक पक्षकार के तौर पर याचिका दायर की है। यह इस मुद्दे से जुड़ी है कि क्या देश में जिस तरह से संसद की संरचना बदली जा रही है, वह संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की सही व्याख्या के अनुरूप है?'

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य से जोड़

यह याचिका ऐसे समय में दायर हुई है जब विपक्षी दलों से जुड़े कई विधायकों और सांसदों के दल-बदल एवं विलय की घटनाएँ सामने आई हैं। गौरतलब है कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) द्वारा दायर एक समान याचिका पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।

सिब्बल ने चेतावनी देते हुए कहा, 'इस देश में क्या हो रहा है? अगर ऐसा ही चलता रहा, तो दसवीं अनुसूची का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मौजूदा प्रवृत्ति यदि अनियंत्रित रही, तो दल-बदल विरोधी कानून महज काग़ज़ी प्रावधान बनकर रह जाएगा।

शिवसेना (UBT) सांसद की अलग याचिका

इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत की याचिका पर भी सुनवाई करने वाला है। सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस निर्णय को चुनौती दी है, जिसमें शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता दी गई थी। यह मामला दल-बदल कानून की व्याख्या से जुड़े व्यापक विवाद का हिस्सा है।

दसवीं अनुसूची: पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची को 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य चुने गए जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक लाभ के लिए दल परिवर्तन से रोकना था। हालाँकि, 'विलय' और 'विभाजन' से जुड़े प्रावधानों की विभिन्न व्याख्याओं ने इस कानून की प्रभावशीलता पर बार-बार प्रश्नचिह्न लगाए हैं।

आगे क्या होगा

CJI न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सिब्बल को आश्वस्त किया कि याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। यह मामला संभावित रूप से दसवीं अनुसूची की व्याख्या पर एक ऐतिहासिक निर्णय का आधार बन सकता है, जो देशभर की विधानसभाओं और संसद में भविष्य के दल-बदल प्रकरणों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह आज उसी खेल का औज़ार बन चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय यदि पैरा-4 की व्याख्या को संकुचित करता है, तो यह निर्णय कई राज्यों की सत्ता-समीकरणों को पलट सकता है — और यही वह दांव है जो इस याचिका को महज़ कानूनी कवायद से आगे ले जाता है।
RashtraPress
22 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में क्या याचिका दायर की है?
कपिल सिब्बल ने 20 जुलाई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 में 'विलय' प्रावधान की उस व्याख्या को चुनौती दी है, जिसके ज़रिए दल-बदल कानून से बचा जा सकता है। उनका तर्क है कि इस व्याख्या के कारण दल-बदल विरोधी कानून व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गया है।
दसवीं अनुसूची का पैरा-4 क्या है और इसमें विवाद क्यों है?
दसवीं अनुसूची का पैरा-4 'विलय' के आधार पर दल-बदल को कुछ परिस्थितियों में वैध मानता है। आलोचकों का कहना है कि इस प्रावधान का राजनीतिक दुरुपयोग हो रहा है — अलग हुए गुट 'विलय' का रास्ता अपनाकर अयोग्यता से बच जाते हैं, जो मूल कानून की भावना के विरुद्ध है।
शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद सावंत की याचिका किस बारे में है?
शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है, जिसमें शिवसेना (UBT) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय को मान्यता दी गई थी। यह मामला भी दसवीं अनुसूची की व्याख्या से सीधे जुड़ा है।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का अगला कदम क्या होगा?
CJI न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 22 जुलाई को आश्वासन दिया कि सिब्बल की याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। सुनवाई की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है, लेकिन शिवसेना (UBT) की पहले से लंबित याचिका के साथ इसे एक साथ सुने जाने की संभावना है।
दल-बदल विरोधी कानून कब और क्यों लाया गया था?
दल-बदल विरोधी कानून 1985 में 52वें संविधान संशोधन के ज़रिए दसवीं अनुसूची के रूप में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य चुने गए जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक लाभ के लिए दल बदलने से रोकना था, जो उस दौर में 'आया राम-गया राम' की राजनीति के नाम से कुख्यात थी।
राष्ट्र प्रेस
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