दल-बदल कानून बेअसर हो रहा है: कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका, CJI ने दिया सुनवाई का आश्वासन
सारांश
मुख्य बातें
वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने 20 जुलाई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है, जिसमें तर्क दिया गया है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी होता जा रहा है। 22 जुलाई को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सिब्बल ने इस मामले का उल्लेख करते हुए शीघ्र सुनवाई की माँग की, जिस पर CJI ने मामले को सूचीबद्ध करने का आश्वासन दिया।
याचिका का मूल आधार
सिब्बल की याचिका दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की उस व्याख्या को चुनौती देती है, जिसके अंतर्गत किसी दल से अलग हुए विधायक या सांसद 'विलय' का रास्ता अपनाकर दलबदल-रोधी प्रावधानों के दायरे से बाहर निकल सकते हैं। उनका तर्क है कि इस व्याख्या का दुरुपयोग हो रहा है और इससे संसद तथा विधानसभाओं की संरचना संवैधानिक मंशा के विपरीत बदली जा रही है।
पीठ के सामने सिब्बल ने कहा, 'मैंने खुद एक पक्षकार के तौर पर याचिका दायर की है। यह इस मुद्दे से जुड़ी है कि क्या देश में जिस तरह से संसद की संरचना बदली जा रही है, वह संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 की सही व्याख्या के अनुरूप है?'
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य से जोड़
यह याचिका ऐसे समय में दायर हुई है जब विपक्षी दलों से जुड़े कई विधायकों और सांसदों के दल-बदल एवं विलय की घटनाएँ सामने आई हैं। गौरतलब है कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) द्वारा दायर एक समान याचिका पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।
सिब्बल ने चेतावनी देते हुए कहा, 'इस देश में क्या हो रहा है? अगर ऐसा ही चलता रहा, तो दसवीं अनुसूची का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मौजूदा प्रवृत्ति यदि अनियंत्रित रही, तो दल-बदल विरोधी कानून महज काग़ज़ी प्रावधान बनकर रह जाएगा।
शिवसेना (UBT) सांसद की अलग याचिका
इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत की याचिका पर भी सुनवाई करने वाला है। सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस निर्णय को चुनौती दी है, जिसमें शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता दी गई थी। यह मामला दल-बदल कानून की व्याख्या से जुड़े व्यापक विवाद का हिस्सा है।
दसवीं अनुसूची: पृष्ठभूमि
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची को 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य चुने गए जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक लाभ के लिए दल परिवर्तन से रोकना था। हालाँकि, 'विलय' और 'विभाजन' से जुड़े प्रावधानों की विभिन्न व्याख्याओं ने इस कानून की प्रभावशीलता पर बार-बार प्रश्नचिह्न लगाए हैं।
आगे क्या होगा
CJI न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सिब्बल को आश्वस्त किया कि याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। यह मामला संभावित रूप से दसवीं अनुसूची की व्याख्या पर एक ऐतिहासिक निर्णय का आधार बन सकता है, जो देशभर की विधानसभाओं और संसद में भविष्य के दल-बदल प्रकरणों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।