सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस: कार्यकाल बीच में छोड़ने वाले संवैधानिक अधिकारियों के भत्तों पर उठे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 3 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर जवाब माँगा है, जिसमें यह माँग की गई है कि जो संवैधानिक अधिकारी पद से हटाए जाने की कार्यवाही से बचने के लिए कार्यकाल के बीच में इस्तीफा दे देते हैं, उन्हें भत्ते, सुविधाएँ और अन्य लाभ नहीं मिलने चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर के लिए निर्धारित की है।
याचिका में क्या है मुख्य माँग
मुंबई निवासी याचिकाकर्ता प्रतीक वीरा ने अधिवक्ता संग्रामसिंह आर. भोंसले के माध्यम से यह पीआईएल दायर की है। याचिका में तर्क दिया गया है कि एक निश्चित कार्यकाल के लिए नियुक्त या चुने गए संवैधानिक अधिकारियों पर संवैधानिक बाध्यता है कि वे अपना कार्यकाल पूरा करें या संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के तहत हटाए जाने का सामना करें।
याचिका में स्पष्ट कहा गया है कि 'ऊँचा संवैधानिक पद ऐसे अधिकारियों पर एक अलिखित संवैधानिक दायित्व डालता है' — वे या तो कार्यकाल पूरा करें, या पारदर्शी हटाने की प्रक्रिया का सामना करें। पीआईएल के अनुसार, पद से हटाए जाने की कार्यवाही से बचने के लिए बीच में इस्तीफा देना, संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मूल उद्देश्य को ही निष्फल कर देता है।
भत्तों और सुविधाओं पर केंद्रीय सवाल
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि इस्तीफे के बाद मिलने वाले भत्ते और लाभ संवैधानिक अधिकारियों को हटाने की कार्यवाही का सामना करने की बजाय इस्तीफा देने के लिए प्रेरित करते हैं। याचिकाकर्ता ने माँग की है कि ऐसे अधिकारी उन सुविधाओं के हकदार न हों जो सामान्यतः कार्यकाल पूरा होने पर मिलती हैं।
गैर-संवैधानिक कर्मचारियों के साथ तुलना करते हुए याचिका में कहा गया है कि उन पर लागू सेवा नियम विभागीय कार्यवाही के दौरान इस्तीफे पर रोक लगाते हैं। ऐसे में संवैधानिक पद के अधिकारियों को अधिक नहीं, बल्कि कम जवाबदेह मानना संविधान के अनुच्छेद 14 के समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है — यह याचिका का केंद्रीय संवैधानिक तर्क है।
संवैधानिक कानून का शुद्ध प्रश्न
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से इस मुद्दे को संवैधानिक कानून के एक शुद्ध प्रश्न के रूप में देखने का आग्रह किया है। उनका स्पष्ट कहना है कि यह पीआईएल किसी विशेष व्यक्ति या घटना से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संवैधानिक सिद्धांत की स्थापना की माँग करती है।
याचिका में ऐसे इस्तीफों को 'संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने से बचने का एक सिद्धांत-हीन तरीका' बताया गया है और तर्क दिया गया है कि यह चलन कानून के शासन के विरुद्ध है, जो संविधान के मूल ढाँचे का अभिन्न हिस्सा है।
नागरिक विश्वास और जवाबदेही पर असर
याचिका में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि नागरिकों के बीच यह धारणा बन रही है कि संवैधानिक पद के अधिकारी इस्तीफा देकर हटाने की कार्यवाही को विफल कर सकते हैं और फिर भी अपनी सुविधाएँ बनाए रख सकते हैं। याचिका के अनुसार, ऐसा व्यवहार 'सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक आचरण' को कमज़ोर करता है।
याचिका में उचित नियम बनाने के निर्देश भी माँगे गए हैं जो ऐसे अधिकारियों पर इस्तीफे के बाद मिलने वाले लाभों को प्रतिबंधित करें। अब 17 सितंबर की सुनवाई पर सबकी नज़रें टिकी हैं, जब केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखना होगा।