जेपीएससी प्री परीक्षा अनियमितताओं पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अगस्त 2026 को झारखंड कंबाइंड सिविल सर्विसेज प्रीलिमिनरी एग्जामिनेशन-2025 में कथित अनियमितताओं की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन ने दाखिल की है, जिसमें राज्य की आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) से जांच स्थानांतरित करने की अपील की गई है।
पीठ और सुनवाई का विवरण
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की त्रि-सदस्यीय पीठ ने इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया। प्रतिवादियों में भारत सरकार, झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी), झारखंड कर्मचारी चयन आयोग, झारखंड राज्य, सीबीआई और झारखंड के पुलिस महानिदेशक (सीआईडी) शामिल हैं।
याचिका में उठाई गई मुख्य मांगें
याचिका के अनुसार, 19 अप्रैल को आयोजित प्रारंभिक परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र, निष्पक्ष, व्यापक और समयबद्ध सीबीआई जांच कराई जाए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन आरोपों की जड़ें राज्य की भर्ती प्रणाली में हैं, जिसमें परीक्षा-केंद्र के कर्मचारी, तकनीकी एजेंसियाँ, स्कैनिंग और मूल्यांकन एजेंसियाँ तथा अन्य सेवा प्रदाताओं की संभावित भूमिका की जांच ज़रूरी है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य सीआईडी ने जांच के दौरान सफल उम्मीदवारों से पेपर-I और पेपर-II की ओएमआर कार्बन कॉपी जमा करने को कहा था। याचिकाकर्ता का मानना है कि इन कार्बन कॉपियों का जेपीएससी के मूल ओएमआर शीट, स्कैन की गई छवियों, कोडिंग-डिकोडिंग रिकॉर्ड और मूल्यांकन डेटा से स्वतंत्र रूप से मिलान किया जा सकता है।
सीबीआई जांच की ज़रूरत क्यों — याचिकाकर्ता का तर्क
याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि सीबीआई जांच की माँग राज्य सीआईडी अधिकारियों पर किसी व्यक्तिगत आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि आरोपों की प्रकृति और गंभीरता के कारण है। उनका तर्क है कि जांच के विषय से जुड़ी राज्य मशीनरी से स्वतंत्र एजेंसी की आवश्यकता है ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
गौरतलब है कि परीक्षा को बाद में रद्द कर दिया गया था, लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे स्वतंत्र जांच की ज़रूरत समाप्त नहीं होती। उनके अनुसार, यह पता लगाना अभी भी आवश्यक है कि परीक्षा प्रक्रिया से किस हद तक समझौता हुआ, अनियमितताओं का तरीका क्या था और इसके लिए कौन ज़िम्मेदार था।
रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की माँग
याचिका में परीक्षा से जुड़े सभी मूल भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को तत्काल सुरक्षित करने के निर्देश देने की माँग की गई है। इनमें मूल ओएमआर शीट, प्रश्न पत्र, उत्तर कुंजी, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, सर्वर रिकॉर्ड, ऑडिट ट्रेल और परिणाम-निर्माण डेटा शामिल हैं। याचिका में चेतावनी दी गई है कि इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सामग्री को समय के साथ बदला, ओवरराइट या डिलीट किया जा सकता है, इसलिए किसी भी देरी से सबूतों की अखंडता खतरे में पड़ सकती है।
याचिकाकर्ता का कानूनी प्रतिनिधित्व
याचिकाकर्ता की ओर से बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा तथा अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत पेश हुए। यह मामला भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यापक बहस के बीच सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया है, और अब प्रतिवादियों के जवाब के बाद अगली सुनवाई में इसकी दिशा स्पष्ट होगी।