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यूपी विश्वविद्यालयों में एआई नीति: राज्यपाल की पहल पर 4 सदस्यीय कमेटी, 3 महीने में ड्राफ्ट

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यूपी विश्वविद्यालयों में एआई नीति: राज्यपाल की पहल पर 4 सदस्यीय कमेटी, 3 महीने में ड्राफ्ट

सारांश

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में एआई के जिम्मेदार उपयोग के लिए राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने 4 सदस्यीय नीति कमेटी बनाई है। तीन महीने में ड्राफ्ट तैयार होगा — जिसमें ग्रामीण एआई रेडीनेस से लेकर नैतिक उपयोग तक का रोडमैप होगा। यह उत्तर भारत का पहला ऐसा राज्यस्तरीय उच्च शिक्षा एआई नीति प्रयास है।

मुख्य बातें

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की पहल पर उत्तर प्रदेश में एआई पॉलिसी एडवाइजरी कमेटी गठित, जिसमें 4 सदस्य शामिल हैं।
सीएसजेएमयू, कानपुर के कुलपति प्रो.
विनय कुमार पाठक को कमेटी में शामिल किया गया है।
कमेटी लगभग 3 महीनों में विश्वविद्यालयों के लिए एआई नीति का मसौदा तैयार करेगी।
नीति में एआई के नैतिक उपयोग, ग्रामीण एआई रेडीनेस , छात्र प्रशिक्षण और सामाजिक समाधानों को प्राथमिकता दी जाएगी।
सीएसजेएमयू में एआई हैकाथॉन के जरिए विद्यार्थियों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार समाधान विकसित करने के लिए तैयार किया जा रहा है।
चुनावी प्रचार और डिजिटल पहचान के दुरुपयोग को लेकर प्रो.
पाठक ने जिम्मेदार एआई उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के सुरक्षित, जिम्मेदार और प्रभावी उपयोग को संस्थागत ढाँचा देने की दिशा में राज्य सरकार ने ठोस कदम उठाया है। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की पहल पर एआई पॉलिसी एडवाइजरी कमेटी का गठन किया गया है, जो अगले लगभग तीन महीनों में नीति का मसौदा तैयार करेगी। इस कमेटी में छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू), कानपुर के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक को भी शामिल किया गया है।

कमेटी का गठन और उद्देश्य

4 सदस्यीय एआई पॉलिसी एडवाइजरी कमेटी का मुख्य लक्ष्य उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में एआई के उपयोग, नई तकनीकों, संभावित सेवाओं और दीर्घकालिक रणनीति को लेकर स्पष्ट दिशा तय करना है। प्रो. पाठक ने बताया कि राज्यपाल की मंशा है कि देश को आगे ले जाने में एआई और आधुनिक तकनीकों की केंद्रीय भूमिका हो। नीति में विश्वविद्यालयों में एआई के इस्तेमाल, तकनीकी सेवाओं, विद्यार्थियों की तैयारी और समाज से जुड़े समाधानों को शामिल किया जाएगा।

मंथन से मिशन की ओर

प्रो. पाठक ने स्पष्ट किया कि रणनीति को केवल चर्चा तक सीमित न रखकर 'मंथन से मिशन' की दिशा में ले जाने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि सीएसजेएमयू में एआई के क्षेत्र में पहले से कार्य जारी है और अब इसे और गति दी जाएगी। विश्वविद्यालय में नए एआई टूल्स और कार्यक्रमों का विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में आगे बढ़ाई जाएगी।

ग्रामीण क्षेत्रों तक एआई की पहुँच

एआई को ग्रामीण भारत तक पहुँचाने पर प्रो. पाठक ने कहा कि सबसे पहले 'एआई रेडीनेस' तैयार करनी होगी। उन्होंने विश्वविद्यालय के एआई हैकाथॉन का उल्लेख करते हुए बताया कि विद्यार्थियों को एआई आधारित समाधान विकसित करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। लक्ष्य यह है कि किसानों, गरीबों, मजदूरों और आम नागरिकों से सीधे जुड़े एआई टूल्स विकसित हों, ताकि तकनीक का लाभ केवल बड़े शहरों और बड़े संस्थानों तक सिमटा न रहे।

नैतिकता और जिम्मेदार उपयोग

एआई के फायदों और संभावित जोखिमों पर प्रो. पाठक ने कहा कि वर्तमान समय में एआई एक अनिवार्यता बन चुका है और इसे लेकर अनावश्यक भय उचित नहीं है। हालाँकि, उन्होंने जोर दिया कि इसके उपयोग में नैतिकता और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि चुनावी प्रचार में एआई का बढ़ता उपयोग और किसी की पहचान के आधार पर डिजिटल सामग्री तैयार किए जाने की संभावना, जिम्मेदार उपयोग और जागरूकता की माँग करती है। उनके अनुसार, नई तकनीक से डरने के बजाय उसके सुरक्षित और नैतिक उपयोग की व्यवस्था बनाना अधिक महत्वपूर्ण है।

आगे की राह

एआई पॉलिसी एडवाइजरी कमेटी अगले करीब तीन महीनों में नीति का मसौदा तैयार करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। नीति के लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में एआई तकनीक के उपयोग, संभावित सेवाओं और विभिन्न स्तरों पर इसके अनुप्रयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलेंगे। प्रो. पाठक ने कहा कि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल तकनीक अपनाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसे विद्यार्थी तैयार करने पर भी ध्यान देना होगा जो समाज के व्यापक वर्ग के लिए एआई समाधान विकसित कर सकें।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा क्रियान्वयन में होगी। देशभर के विश्वविद्यालय एआई को लेकर अब तक अलग-अलग और असंगठित तरीके से आगे बढ़ रहे हैं — ऐसे में एक राज्यस्तरीय नीति ढाँचा एक ज़रूरी कदम है। हालाँकि, केवल 4 सदस्यीय कमेटी और 3 महीने की समयसीमा, दर्जनों विश्वविद्यालयों और लाखों विद्यार्थियों की विविध जरूरतों को पर्याप्त रूप से समेट पाएगी या नहीं — यह देखना होगा। ग्रामीण एआई रेडीनेस का विचार सराहनीय है, लेकिन जब तक बुनियादी डिजिटल अवसंरचना और शिक्षक प्रशिक्षण की खाई नहीं पटती, नीति कागज पर ही बेहतर रहेगी।
RashtraPress
14 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूपी की एआई पॉलिसी एडवाइजरी कमेटी क्या है?
यह उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में एआई के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के लिए राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की पहल पर गठित 4 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति है। यह कमेटी लगभग 3 महीनों में एआई नीति का मसौदा तैयार करेगी।
इस नीति में क्या-क्या शामिल किया जाएगा?
नीति में विश्वविद्यालयों में एआई के उपयोग, तकनीकी सेवाओं, विद्यार्थियों की तैयारी, ग्रामीण एआई रेडीनेस, और समाज से जुड़े एआई समाधानों को प्राथमिकता दी जाएगी। नैतिकता और मानवीय मूल्यों को उपयोग का आधार बनाया जाएगा।
प्रो. विनय कुमार पाठक इस पहल में क्या भूमिका निभा रहे हैं?
प्रो. विनय कुमार पाठक सीएसजेएमयू, कानपुर के कुलपति हैं और एआई पॉलिसी एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं। वे 'मंथन से मिशन' के दृष्टिकोण के साथ विश्वविद्यालयी एआई रणनीति को दिशा देने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में एआई पहुँचाने की क्या योजना है?
प्रो. पाठक के अनुसार, पहले ग्रामीण क्षेत्रों में 'एआई रेडीनेस' तैयार की जाएगी — यानी विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वे स्थानीय जरूरतों के अनुसार एआई मॉडल और सेवाएँ विकसित करें। किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों से जुड़े एआई टूल्स बनाने पर जोर रहेगा।
चुनावी प्रचार में एआई के दुरुपयोग को लेकर क्या चिंताएँ जताई गई हैं?
प्रो. पाठक ने संभावना जताई कि भविष्य में डिजिटल टूल्स के जरिए किसी की पहचान का उपयोग कर सामग्री तैयार की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जैसे पहले समाचार पत्र, टीवी और सोशल मीडिया का प्रचार में उपयोग बढ़ा, एआई भी उसी क्रम में शामिल हो रहा है — इसलिए जिम्मेदार उपयोग और जागरूकता की आवश्यकता बढ़ जाती है।
राष्ट्र प्रेस
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