हरू-सैम देवता: कुमाऊं की लोक आस्था के न्याय और समृद्धि के अमर प्रतीक
सारांश
मुख्य बातें
देवभूमि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति में देवी-देवताओं की उपस्थिति सदियों से मानव-जीवन का आधार रही है। कुमाऊं मंडल की इस गहरी लोक-आस्था के केंद्र में हैं 'श्री हरू-सैम देवता' — जिन्हें न्याय, सत्य और लोक कल्याण का प्रतीक माना जाता है। लोक कथाओं और पारंपरिक 'जागरों' (उत्तराखंड के धार्मिक लोकगीत) के अनुसार, ये देवता युगों से कुमाऊं के ग्रामीणों के रक्षक और समृद्धि के दाता रहे हैं।
मंदिर और पूजा परंपरा
अल्मोड़ा के जागेश्वर के समीप स्थित झंकार सैम मंदिर में सैम देवता की आराधना स्वयंभू शिवलिंग के रूप में की जाती है। कुमाऊं की लोक परंपरा के अनुसार, हरू और सैम दोनों भाई हैं और इनके मंदिर सदैव एक-साथ स्थापित होते हैं। इनके बारे में एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है — 'हरू आये हरियाली लाये, हरू जाये सब कुछ नष्ट हो जाये।' यह उक्ति इन देवताओं की जीवनदायी महत्ता को रेखांकित करती है।
हरू देवता को पूर्णतः सात्विक माना जाता है, अतः यहाँ मुख्यतः फल-फूल, मेवा, मिष्ठान्न और पारंपरिक कुमाऊंनी 'रोट' (मीठी पूड़ी) का भोग लगाया जाता है। मांसाहारी भोग वर्जित है।
लोक गाथाओं में हरू-सैम देवता
जागरों और लोक गाथाओं के अनुसार, हरू-सैम देवता को चम्पावत का राजा अथवा राजकुमार — राजा हरिश्चंद्र का रूप — माना जाता है। वे अत्यंत न्यायप्रिय और सिद्ध पुरुष थे जिन्होंने अपना जीवन दीन-दुखियों की सेवा में समर्पित किया। लोक मान्यताओं में इन्हें भगवान शिव का अंशावतार या स्वयंभू रूप माना जाता है।
गौरतलब है कि इन देवताओं को 'देवताओं का गुरु' और कुछ परंपराओं में 'देवताओं का मामा' भी कहा जाता है। ये दोनों देवता समृद्धि, सुख-शांति और गाँवों की सीमाओं के रक्षक माने जाते हैं।
विशेष पर्व और अनुष्ठान
नवरात्रि, पौष महीने की बैसी (धुनी जागृत करना), और डंगरिया परंपरा (देव डांगुर) सहित कई पर्वों पर इस मंदिर में भव्य धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं। नवरात्रि के अवसर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री सहित अनेक著名 हस्तियाँ और दूर-दूर से हज़ारों श्रद्धालु यहाँ शीश नवाने आते हैं।
पौष (पूस) के महीने में विशेष 'बैसी' (धार्मिक व्रत और अनुष्ठान) का आयोजन होता है। इस अवधि में गुरु गोरखनाथ और हरू-सैमज्यू के दरबार में पवित्र धुनी जागृत की जाती है।
डंगरिया परंपरा और सांस्कृतिक विरासत
कुमाऊं संस्कृति की अनूठी डंगरिया परंपरा में विशेष अवसरों पर देवताओं के 'डंगरिया' — अर्थात वे व्यक्ति जिनके शरीर में देवता अवतरित होते हैं — ढोल-दमोह जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर नृत्य करते हैं। मान्यता है कि इस अनुष्ठान के दौरान वे भक्तों के कष्टों को दूर करने का आशीर्वाद देते हैं।
यह ऐसे समय में प्रासंगिक हो जाता है जब आधुनिकीकरण की लहर के बीच कुमाऊं की लोक परंपराएँ अपनी जड़ें बचाए रखने के लिए संघर्षरत हैं। हरू-सैम देवता की यह जीवंत आस्था उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान की रीढ़ बनी हुई है और आने वाली पीढ़ियों को विरासत में मिलने वाली अमूल्य धरोहर है।