विश्वकर्मा पूजा 2026: मशीनों पर स्वस्तिक, ॐ और शुभ-लाभ लिखने की धार्मिक मान्यता और महत्व
सारांश
मुख्य बातें
विश्वकर्मा पूजा इस वर्ष 17 सितंबर को देशभर में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जाएगी। इस पर्व पर कारखानों, दुकानों, कार्यालयों और कार्यस्थलों में मशीनों पर स्वस्तिक, ॐ और शुभ-लाभ जैसे पवित्र चिन्ह अंकित करने की परंपरा सदियों पुरानी है। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कारीगरों और श्रमिकों की सुरक्षा, समृद्धि और निर्बाध कार्य की कामना से जुड़ी गहरी आस्था का प्रतीक है।
स्वस्तिक का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में स्वस्तिक को सर्वाधिक पवित्र और मंगलकारी चिन्ह माना गया है। 'स्वस्तिक' शब्द संस्कृत के 'सु' और 'अस्ति' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'शुभ होना' या 'कल्याण होना'। किसी भी शुभ कार्य का आरंभ स्वस्तिक चिन्ह से किया जाता है।
विश्वकर्मा पूजन के दिन मशीनों पर रोली, कुमकुम और सिंदूर से स्वस्तिक बनाने के पीछे तीन प्रमुख धार्मिक मान्यताएँ हैं — विघ्नों से मुक्ति, आर्थिक समृद्धि और कार्यस्थल सुरक्षा।
तीन प्रमुख कारण: विघ्नहर्ता, समृद्धि और सुरक्षा
पहली मान्यता के अनुसार, स्वस्तिक को भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है, जो प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता हैं। मशीन पर स्वस्तिक अंकित करने से कार्य में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आती और उत्पादन निर्बाध रूप से चलता रहता है।
दूसरी मान्यता समृद्धि से संबंधित है। स्वस्तिक को धन की देवी लक्ष्मी का भी प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जहाँ स्वस्तिक होता है, वहाँ नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं करती और सकारात्मक ऊर्जा का वास बना रहता है, जिससे कारोबार में वृद्धि और आर्थिक समृद्धि आती है।
तीसरा और सबसे व्यावहारिक कारण सुरक्षा है। कारीगर और मज़दूर प्रतिदिन मशीनों के साथ काम करते हैं। मशीन पर स्वस्तिक बनाकर वे पूरे वर्ष दुर्घटनामुक्त कार्य और मशीन की दीर्घायु की कामना करते हैं।
ॐ और शुभ-लाभ लिखने की परंपरा
स्वस्तिक के अतिरिक्त, विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर मशीनों और औज़ारों पर ॐ का चिन्ह भी अंकित किया जाता है। ॐ को ब्रह्मांड की मूल ध्वनि और सृष्टि की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसे बनाने से मशीन में दैवीय शक्ति का वास होता है।
इसके साथ ही लेथ मशीन, ड्रिल मशीन और मुख्य प्रवेश द्वार पर 'शुभ-लाभ' लिखा जाता है। इसका तात्पर्य है कि भगवान विश्वकर्मा की कृपा से कार्य शुभ हो और उसमें लाभ हो — यह व्यापार में बरकत की कामना का प्रतीक है।
कलावा, तिलक और फूल-माला की परंपरा
विश्वकर्मा पूजन के दौरान पूजा के बाद मशीनों के हैंडल, स्विच और औज़ारों पर लाल रंग का कलावा (रक्षा सूत्र) बाँधा जाता है। इसे रक्षा कवच के रूप में देखा जाता है और मान्यता है कि कलावा बाँधने से मशीन बुरी नज़र से सुरक्षित रहती है।
इसके अलावा, कारीगर सभी मशीनों को भलीभाँति साफ़ कर उन पर हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक लगाते हैं। इसके बाद गेंदे या अन्य फूलों की माला पहनाई जाती है। कई कारखानों में मशीनों को नए वस्त्र की भाँति सजाया भी जाता है।
कुछ स्थानों पर मशीनों पर हाथ की पाँचों उँगलियों से रोली और चावल के छापे भी लगाए जाते हैं, जो माँ लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक माना जाता है। यह समस्त परंपराएँ भारतीय कार्य-संस्कृति में श्रम और उपकरण के प्रति सम्मान की अनूठी अभिव्यक्ति हैं।