16 सितंबर 2026
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विश्वकर्मा जयंती 2026: भगवान विश्वकर्मा का जन्म, पौराणिक कथा और पूजा परंपरा की पूरी कहानी

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विश्वकर्मा जयंती 2026: भगवान विश्वकर्मा का जन्म, पौराणिक कथा और पूजा परंपरा की पूरी कहानी

सारांश

विश्वकर्मा जयंती 2026 पर जानें कि कैसे सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा के वंशक्रम से जन्मे विश्वकर्मा ने सुदर्शन चक्र से लेकर स्वर्ण लंका तक अनगिनत दिव्य निर्माण किए — और कन्या संक्रांति पर उनकी पूजा की परंपरा कारखानों से लेकर आधुनिक तकनीकी संस्थानों तक कैसे पहुँची।

मुख्य बातें

विश्वकर्मा जयंती 2026 का आयोजन 16 सितंबर को कन्या संक्रांति के अवसर पर किया जा रहा है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, वास्तुदेव और अंगिरसी के पुत्र के रूप में ऋषि विश्वकर्मा का जन्म हुआ, जो ब्रह्मा जी के वंशक्रम से जुड़े हैं।
भगवान विश्वकर्मा को सुदर्शन चक्र, त्रिशूल, वज्र, द्वारिका नगरी, इंद्रप्रस्थ और पुष्पक विमान के निर्माण का श्रेय दिया जाता है।
स्वर्ण लंका की उत्पत्ति भी विश्वकर्मा द्वारा बनाए गए स्वर्ण महल से जुड़ी मानी जाती है, जिसे रावण ने दक्षिणा में माँग लिया था।
इस दिन कारखानों, फैक्ट्रियों और दुकानों में मशीनों, औजारों व वाहनों की विशेष पूजा की परंपरा है।
आज यह पर्व धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ श्रम और तकनीकी कौशल के प्रति सम्मान का प्रतीक बन चुका है।

हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, शिल्प, वास्तुकला और तकनीकी कला का परम देवता माना जाता है। 16 सितंबर 2026 को मनाई जा रही विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर देशभर के कारीगर, शिल्पकार, इंजीनियर, मजदूर और औद्योगिक संस्थानों से जुड़े लोग उनकी विधि-विधान से आराधना कर रहे हैं। यह पर्व श्रम, कौशल और निर्माण कार्य के प्रति आस्था और सम्मान का प्रतीक है।

विश्वकर्मा पूजा की परंपरा कहाँ से आई

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विश्वकर्मा पूजा की परंपरा कन्या संक्रांति से जुड़ी है — वह क्षण जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। इसी तिथि को भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। कारखानों, फैक्ट्रियों, दुकानों और तकनीकी प्रतिष्ठानों में विशेष आयोजन होते हैं, जहाँ मशीनें, औजार, वाहन और कार्यस्थल के उपकरण साफ कर उनकी पूजा की जाती है।

यह परंपरा प्राचीन काल में शिल्पकारों और निर्माण कार्य से जुड़े समुदायों तक सीमित थी, लेकिन समय के साथ यह आयोजन आधुनिक उद्योगों, इंजीनियरिंग कंपनियों और तकनीकी क्षेत्रों तक फैल गया। मान्यता है कि इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा से कार्य में कुशलता, उन्नति और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

भगवान विश्वकर्मा का जन्म और पौराणिक उत्पत्ति

पौराणिक ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं में भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति के विषय में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। प्रचलित मान्यता के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान थे। उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ, जिससे चतुर्मुखी ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ।

ब्रह्मा जी से जुड़े वंशक्रम में वास्तुदेव का उल्लेख आता है। मान्यता है कि वास्तुदेव का विवाह अंगिरसी से हुआ और इन्हीं दोनों से ऋषि विश्वकर्मा का जन्म हुआ। विश्वकर्मा ने अपने पिता वास्तुदेव से वास्तुकला और निर्माण विद्या की शिक्षा ग्रहण की और आगे चलकर शिल्प एवं स्थापत्य कला के महान आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

दिव्य निर्माण: विश्वकर्मा की अद्भुत शिल्पकारी

पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा को अनेक महत्वपूर्ण दिव्य निर्माणों का श्रेय दिया जाता है। मान्यता है कि उन्होंने भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल और देवराज इंद्र का वज्र जैसे अलौकिक अस्त्र निर्मित किए।

इसके अतिरिक्त, भगवान कृष्ण की द्वारिका नगरी और पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी के निर्माण का संबंध भी पौराणिक परंपराओं में विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है। पुष्पक विमान के निर्माण का उल्लेख भी उनसे संबद्ध माना जाता है।

स्वर्ण लंका की कथा

पौराणिक आख्यानों में एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने भगवान शिव के लिए एक भव्य स्वर्ण महल का निर्माण किया था। महल की पूजा के अवसर पर रावण ने दक्षिणा के रूप में उसी स्वर्ण महल की माँग कर दी और उसे अपने अधिकार में ले लिया। इसी प्रकार स्वर्ण लंका की उत्पत्ति की कथा भगवान विश्वकर्मा की शिल्पकारी से जुड़ी मानी जाती है।

आज का महत्व: परंपरा से आधुनिक श्रम-सम्मान तक

वर्तमान में विश्वकर्मा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह श्रम, कौशल, तकनीक और सृजन के प्रति समाज की कृतज्ञता का सामूहिक उत्सव बन चुका है। कारखानों में काम रोककर उपकरणों की पूजा करने की यह प्रथा बताती है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में हाथ के काम और औज़ारों को भी पवित्र दर्जा दिया जाता रहा है। आने वाली पीढ़ियों में इस पर्व के ज़रिए शिल्प और तकनीकी ज्ञान के प्रति सम्मान की भावना और गहरी होती जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब यह पर्व कम से कम प्रतीकात्मक रूप से उनके योगदान को केंद्र में रखता है। हालाँकि यह भी विचारणीय है कि पूजा की रस्म से आगे बढ़कर शिल्पकारों और तकनीशियनों के लिए ठोस नीतिगत सम्मान — उचित मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास — कितना सुनिश्चित हो पा रहा है।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विश्वकर्मा जयंती 2026 कब है और क्यों मनाई जाती है?
विश्वकर्मा जयंती 2026 में 16 सितंबर को मनाई जा रही है। यह पर्व कन्या संक्रांति के दिन, यानी सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश के अवसर पर मनाया जाता है और भगवान विश्वकर्मा — शिल्प, वास्तुकला व तकनीकी कला के देवता — की आराधना को समर्पित है।
भगवान विश्वकर्मा का जन्म कैसे हुआ?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के वंशक्रम में वास्तुदेव का उल्लेख मिलता है, जिनका विवाह अंगिरसी से हुआ और इन्हीं से ऋषि विश्वकर्मा का जन्म माना जाता है। उन्होंने अपने पिता से वास्तुकला और निर्माण की विद्या सीखी।
भगवान विश्वकर्मा ने कौन-कौन से दिव्य निर्माण किए?
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल और इंद्र का वज्र बनाए। इसके अलावा श्रीकृष्ण की द्वारिका नगरी, पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी और पुष्पक विमान के निर्माण का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
स्वर्ण लंका का निर्माण विश्वकर्मा से कैसे जुड़ा है?
पौराणिक कथा के अनुसार विश्वकर्मा ने भगवान शिव के लिए एक स्वर्ण महल बनाया था। महल की पूजा के अवसर पर रावण ने दक्षिणा के रूप में उसी महल की माँग कर दी और उसे अपने अधिकार में ले लिया। इसी प्रकार स्वर्ण लंका की कथा भगवान विश्वकर्मा की शिल्पकारी से जुड़ी मानी जाती है।
विश्वकर्मा पूजा में क्या किया जाता है?
इस दिन कारखानों, फैक्ट्रियों, दुकानों और कार्यस्थलों पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर पूजा की जाती है। मशीनों, औजारों, वाहनों और उपकरणों की सफाई कर उनकी भी विधि-विधान से पूजा होती है। मान्यता है कि इससे कार्य में कुशलता, उन्नति और सफलता का आशीर्वाद मिलता है।
राष्ट्र प्रेस
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