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पीएम विश्वकर्मा योजना से बदली ज़िंदगी: आगरा ब्रिक्स फोरम में लाभार्थियों ने सुनाई सफलता की कहानी

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पीएम विश्वकर्मा योजना से बदली ज़िंदगी: आगरा ब्रिक्स फोरम में लाभार्थियों ने सुनाई सफलता की कहानी

सारांश

आगरा में ब्रिक्स एमएसएमई फोरम के मंच पर पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों ने साबित किया कि सरकारी समर्थन से पारंपरिक शिल्प भी राष्ट्रीय पहचान पा सकता है — ₹1 लाख के ऋण और टूलकिट से लेकर दिल्ली हाट तक, यह सफर सिर्फ आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भी कहानी है।

मुख्य बातें

19 जून 2026 को आगरा में आयोजित प्रथम ब्रिक्स एमएसएमई फोरम में पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों ने पारंपरिक शिल्प का प्रदर्शन किया।
लेदर कारीगर सनी स्वामी को टूलकिट और डिजिटल प्लेटफॉर्म मिला, जिससे उनके 10 साल पुराने व्यवसाय को नई गति मिली।
चन्नापटना के लकड़ी खिलौना कारीगर अब्दुल खादर को योजना के तहत टूलकिट और ऋण दोनों प्राप्त हुए।
ढोकरा कलाकार अलीम जादूपाटिया को ₹1 लाख का ऋण मिला और दिल्ली हाट में प्रदर्शनी का अवसर भी।
पत्थर-नक्काशी कलाकार पूजा झारिया को पहले चरण में ₹1 लाख का ऋण मिला; स्थानीय उत्पाद अब अन्य शहरों में पहचाने जा रहे हैं।

पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों ने 19 जून 2026 को आगरा में आयोजित प्रथम ब्रिक्स एमएसएमई फोरम एवं तृतीय एसएमई वर्किंग ग्रुप की बैठक में अपनी पारंपरिक कला और शिल्पकारी का जीवंत प्रदर्शन किया। इस अवसर पर लाभार्थियों ने आयोजन स्थल पर स्टॉल भी लगाए और अपने हस्तनिर्मित उत्पादों को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया।

लेदर कारीगर से डिजिटल उद्यमी तक का सफर

लाभार्थी सनी स्वामी, जो पिछले 10 वर्षों से लेदर उत्पाद — विशेषकर लेदर के खिलौने — बनाने के काम में हैं, ने बताया कि पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत पंजीकरण के बाद उन्हें प्रशिक्षण के दौरान टूलकिट के उपयोग का व्यावहारिक ज्ञान दिया गया। उन्होंने कहा, 'विश्वकर्मा योजना से जुड़ने के बाद हमें ऑनलाइन सिस्टम पर एक अच्छा प्लेटफॉर्म मिला, जिससे हम अपने काम को और आगे बढ़ा सकते हैं।' स्वामी के अनुसार टूलकिट मिलने से उनके उत्पादन की गुणवत्ता और गति दोनों में सुधार आया है।

चन्नापटना के खिलौने अब राष्ट्रीय मंच पर

लाभार्थी अब्दुल खादर, जो बेंगलुरु से लगभग 60 किलोमीटर दूर चन्नापटना में परंपरागत लकड़ी के खिलौने बनाते हैं, ने बताया कि योजना के अंतर्गत उन्हें टूलकिट और ऋण दोनों मिले। साथ ही विभिन्न प्रकार के खिलौने बनाने का नया अनुभव भी प्राप्त हुआ। चन्नापटना की लकड़ी-शिल्प परंपरा सदियों पुरानी है और इसे भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्राप्त है — ऐसे में यह योजना इस विरासत को संरक्षित करने का भी माध्यम बन रही है।

ढोकरा कलाकार को मिला ₹1 लाख का ऋण, दिल्ली हाट तक पहुँचे उत्पाद

ढोकरा कलाकार अलीम जादूपाटिया ने बताया कि उन्हें पीएम विश्वकर्मा योजना से जुड़े डेढ़ वर्ष हो चुके हैं और इस अवधि में उन्हें हर स्तर पर लाभ हुआ है। उन्होंने कहा कि योजना के तहत टूलकिट मिलने के साथ-साथ उन्हें दिल्ली हाट में अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाने का अवसर भी मिला। जादूपाटिया ने यह भी कहा कि इस तरह के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भागीदारी से बाज़ार का विस्तार होता है। उन्हें योजना के तहत ₹1 लाख का ऋण प्राप्त हुआ, जिसे वे अपने जीवन में आए बदलाव की बुनियाद मानते हैं।

सोशल मीडिया से जानकारी, योजना से मिली नई पहचान

सॉफ्ट स्टोन स्कल्पचर (मुलायम पत्थर की नक्काशी) कलाकार पूजा झारिया ने बताया कि उन्हें इस योजना की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से मिली। पूरी जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने आवेदन किया और प्रशिक्षण प्राप्त किया। झारिया को पहले चरण में ₹1 लाख का ऋण मिला, जिससे उनका व्यवसाय आगे बढ़ा। उन्होंने कहा, 'हाथों से बनाए उत्पाद जो कल तक लोकल में ही सीमित थे, उनकी पहचान अब दूसरे शहरों में भी हो रही है।' आगरा में पहली बार आने पर उन्होंने खुशी जताई और इस तरह के मंचों को कारीगरों के लिए अनिवार्य बताया।

आगे की राह

ब्रिक्स एमएसएमई फोरम जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि सरकार इस योजना को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में काम कर रही है। पारंपरिक शिल्पकारों को डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऋण सुविधा और प्रदर्शनी के अवसर मिलने से उनकी आय और बाज़ार पहुँच दोनों में विस्तार की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन नीतिगत दृष्टि से असली सवाल यह है कि ₹1 लाख का ऋण और एक टूलकिट दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षा के लिए पर्याप्त है या नहीं। ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर इन कारीगरों को प्रदर्शित करना सांकेतिक रूप से शक्तिशाली है, परंतु बाज़ार तक स्थायी पहुँच, उचित मूल्य निर्धारण और सामाजिक सुरक्षा के बिना यह योजना अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच सकती। यह भी देखने वाली बात होगी कि इन कारीगरों की आय में वास्तविक और मापनीय वृद्धि हुई है या नहीं — केवल ऋण और प्रशिक्षण से परे।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीएम विश्वकर्मा योजना क्या है और इससे कारीगरों को क्या मिलता है?
पीएम विश्वकर्मा योजना केंद्र सरकार की एक पहल है जो पारंपरिक शिल्पकारों और कारीगरों को प्रशिक्षण, टूलकिट और ऋण सुविधा प्रदान करती है। इस योजना के तहत पहले चरण में ₹1 लाख तक का ऋण और डिजिटल बाज़ार तक पहुँच दी जाती है।
आगरा में ब्रिक्स एमएसएमई फोरम में क्या हुआ?
19 जून 2026 को आगरा में आयोजित प्रथम ब्रिक्स एमएसएमई फोरम एवं तृतीय एसएमई वर्किंग ग्रुप की बैठक में पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों ने स्टॉल लगाए और अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन किया। लेदर, लकड़ी, ढोकरा और पत्थर-नक्काशी जैसे विविध शिल्पों के कारीगरों ने राष्ट्रीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
चन्नापटना के लकड़ी खिलौने और विश्वकर्मा योजना का क्या संबंध है?
चन्नापटना, जो बेंगलुरु से लगभग 60 किलोमीटर दूर है, अपनी पारंपरिक लकड़ी खिलौना शिल्प के लिए प्रसिद्ध है। वहाँ के कारीगर अब्दुल खादर ने बताया कि पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत उन्हें टूलकिट, ऋण और नए प्रकार के खिलौने बनाने का अनुभव मिला, जिससे इस सदियों पुरानी शिल्प परंपरा को नई ऊर्जा मिली है।
योजना से कारीगरों की आय और बाज़ार पहुँच पर क्या असर पड़ा?
लाभार्थियों के अनुसार, योजना से जुड़ने के बाद उनके उत्पाद अब केवल स्थानीय बाज़ार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि दिल्ली हाट जैसे राष्ट्रीय प्लेटफॉर्म तक पहुँचे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म और ब्रिक्स फोरम जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भागीदारी से उनकी पहचान और व्यावसायिक संभावनाएँ दोनों बढ़ी हैं।
पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत ऋण कैसे मिलता है?
योजना के तहत पंजीकरण और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद कारीगरों को पहले चरण में ₹1 लाख तक का ऋण दिया जाता है। पूजा झारिया और अलीम जादूपाटिया जैसे लाभार्थियों ने बताया कि इस ऋण से उन्होंने अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया।
राष्ट्र प्रेस
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