अदाणी केस पर अमेरिकी न्याय विभाग का बड़ा बयान: 'सिक्योरिटीज आरोप कभी नहीं लगने चाहिए थे'
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने 4 जुलाई 2025 को एक अभूतपूर्व कोर्ट फाइलिंग में अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी के खिलाफ दर्ज आपराधिक सिक्योरिटीज मामले को न केवल खारिज करने की अपील की, बल्कि खुलकर स्वीकार किया कि यह केस 'शुरू ही नहीं किया जाना चाहिए था।' यह फाइलिंग उस मामले का सार्वजनिक पुनर्मूल्यांकन है, जिसने लगभग दो वर्षों तक वैश्विक निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया और अदाणी समूह की बाजार वैल्यू से अरबों रुपये स्वाहा कर दिए।
फाइलिंग में क्या कहा गया
DOJ ने अपनी फाइलिंग में मामले के कानूनी आधार, अधिकार-क्षेत्र और साक्ष्यों — तीनों पर सवाल उठाए। विभाग ने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल के अंतिम दिनों में आरोप-पत्र सार्वजनिक करने की आलोचना करते हुए इसे 'नाम खराब करने' की एक ऐसी कोशिश बताया जिसे 'मुकदमा चलने की किसी भी वास्तविक संभावना के बिना' अंजाम दिया गया था। विभाग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सिक्योरिटीज से जुड़े आरोप 'कभी नहीं लगाए जाने चाहिए थे।'
फाइलिंग में यह भी स्वीकार किया गया कि मामले में 'सबूतों से जुड़ी असाधारण मुश्किलें' थीं और अभियोजन में 'कई बड़ी खामियाँ' थीं — किसी सरकारी विभाग द्वारा अपने ही लाए गए मामले का यह अत्यंत असामान्य और कड़ा सार्वजनिक मूल्यांकन है।
अधिकार-क्षेत्र पर सवाल
DOJ के पुनर्मूल्यांकन का केंद्रीय आधार यह निष्कर्ष है कि कथित गड़बड़ी मुख्य रूप से भारत में हुई थी। फाइलिंग के अनुसार, इस मामले में भारतीय नागरिक, भारतीय सरकारी अधिकारी, भारतीय अनुबंध और भारत में बिजली आपूर्ति शामिल थी। विभाग ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय अधिकारियों ने कई आरोपों की जाँच कर ली थी और कोई ऐसी गड़बड़ी नहीं पाई जिस पर कार्रवाई की जा सके। DOJ का तर्क था कि जिस अधिकार-क्षेत्र की इस मामले में सर्वाधिक दिलचस्पी थी, उसने पहले ही इन मुद्दों की जाँच कर ली थी।
बाज़ार पर असर और निवेशकों का नुकसान
DOJ की फाइलिंग में कानूनी आरोपों और बाज़ार पर पड़ने वाले असर के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है। विभाग के अनुसार, 'जिन सिक्योरिटीज का मामला है, उनमें एक पैसा भी नहीं डूबा है' — या तो नोट्स का पूरा भुगतान हो चुका है या वे सही ढंग से काम कर रहे हैं। फिर भी, आरोप-पत्र के परिणाम कोर्टरूम से कहीं आगे तक गए। लगभग दो वर्षों तक इस मामले ने वैश्विक सुर्खियाँ बटोरीं, निवेशकों के भरोसे को चोट पहुँचाई, बाज़ार में अरबों की वैल्यू खत्म हुई और लाखों रिटेल शेयरधारक प्रभावित हुए।
निवेश-प्रभाव के आरोपों को नकारा
DOJ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका यह फैसला अमेरिका में संभावित भारतीय निवेश से प्रभावित नहीं था। विभाग के अनुसार, यह निर्णय अभियोजकों और बचाव पक्ष के वकीलों की दलीलों की गहन समीक्षा के बाद लिया गया और भविष्य के किसी भी निवेश-संबंधी चर्चा से पहले ही इस पर सहमति बन चुकी थी। विभाग ने मीडिया में आई गुमनाम रिपोर्टों पर भरोसा न करने की सलाह भी दी।
आगे क्या होगा
अदालत ने अभी तक केस खारिज करने की अर्जी पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। फाइलिंग न्यायिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि DOJ का पक्ष है। गौरतलब है कि यह उसी संस्था का पुनर्मूल्यांकन है जिसने दुनिया के सबसे चर्चित कॉर्पोरेट मुकदमों में से एक की शुरुआत की थी। अदालत का अंतिम निर्णय इस मामले की दिशा तय करेगा, लेकिन DOJ की यह असामान्य स्वीकारोक्ति पहले ही इस केस की सार्वजनिक समझ को नए सिरे से परिभाषित कर चुकी है।