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भारतीय आईपीओ बाजार में ऐतिहासिक उछाल: जनवरी-सितंबर 2026 में रिकॉर्ड ₹1.04 लाख करोड़ जुटाए

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भारतीय आईपीओ बाजार में ऐतिहासिक उछाल: जनवरी-सितंबर 2026 में रिकॉर्ड ₹1.04 लाख करोड़ जुटाए

सारांश

निफ्टी में 14 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद भारतीय आईपीओ बाजार ने जनवरी-सितंबर 2026 में 12.5 अरब डॉलर का रिकॉर्ड फंड जुटाव किया — 1980 के बाद पहली बार। घरेलू तरलता ने विदेशी निकासी की काट की, लेकिन लिस्टिंग प्रीमियम में गिरावट और ऊँचा ओएफएस अनुपात निवेशकों के लिए सतर्कता का संकेत दे रहे हैं।

मुख्य बातें

भारतीय कंपनियों ने जनवरी-सितंबर 2026 में आईपीओ से रिकॉर्ड 12.5 अरब डॉलर जुटाए — 1980 के बाद नौ माही का सर्वोच्च आँकड़ा।
आईपीओ की संख्या 268 से घटकर 220 हुई ( 17.9 प्रतिशत कमी), फिर भी कुल राशि 11.3 प्रतिशत बढ़ी — औसत इश्यू आकार 4.2 करोड़ डॉलर से बढ़कर 5.7 करोड़ डॉलर हुआ।
सितंबर 2026 साल का सबसे बड़ा महीना रहा — 34 मेनबोर्ड आईपीओ से ₹39,380 करोड़ जुटाए गए।
जुटाई गई राशि का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा ओएफएस के ज़रिए आया, जो मौजूदा शेयरधारकों को गया — कंपनियों की बैलेंस शीट को नहीं।
एफपीआई ने इसी अवधि में ₹2.7 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ की निकासी की, लेकिन मज़बूत घरेलू तरलता ने बाजार को थामे रखा।
130 से अधिक कंपनियों के पास सेबी की आईपीओ मंजूरी लंबित है, जो आगामी महीनों के लिए पाइपलाइन मज़बूत रखती है।

भारतीय कंपनियों ने जनवरी-सितंबर 2026 के दौरान आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के ज़रिए रिकॉर्ड 12.5 अरब डॉलर (लगभग ₹1.04 लाख करोड़) जुटाए हैं — जो 1980 से उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार जनवरी-सितंबर अवधि का अब तक का सबसे बड़ा फंड जुटाव है। एलएसईजी के विश्लेषण के अनुसार, यह उपलब्धि उस दौर में हासिल हुई जब व्यापक शेयर बाजार दबाव में रहा और निफ्टी में करीब 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

आईपीओ की संख्या घटी, राशि बढ़ी

जनवरी-सितंबर 2026 में कुल 220 आईपीओ आए, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 268 आईपीओ की तुलना में लगभग 17.9 प्रतिशत कम हैं। बावजूद इसके, कुल जुटाई गई राशि 11.3 प्रतिशत बढ़ी। यह विरोधाभास स्पष्ट संकेत देता है कि बाजार में बड़े आकार के इश्यू हावी रहे। एलएसईजी के आँकड़ों के अनुसार, औसत आईपीओ आकार बढ़कर करीब 5.7 करोड़ डॉलर हो गया, जो एक वर्ष पहले लगभग 4.2 करोड़ डॉलर था।

कुछ बड़े इश्यू का दबदबा

रिपोर्ट के अनुसार, कुल आईपीओ फंड जुटाव का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा केवल कुछ चुनिंदा बड़े इश्यू से आया। यह 'मेगा-इश्यू केंद्रित' प्रवृत्ति भारतीय आईपीओ बाजार की बदलती संरचना को दर्शाती है। गौरतलब है कि यह वही पैटर्न है जो 2021 की तेजी के दौर में भी देखा गया था, जब कुछ बड़े नाम सबसे अधिक पूँजी खींच ले गए थे।

सितंबर 2026: साल का सबसे मजबूत महीना

सितंबर 2026 आईपीओ बाजार के लिए असाधारण रूप से मज़बूत महीना रहा। इस महीने 34 मेनबोर्ड आईपीओ के ज़रिए करीब ₹39,380 करोड़ जुटाए गए, जो वर्ष 2026 का सबसे बड़ा मासिक आँकड़ा है। हालाँकि, इस महीने औसत लिस्टिंग प्रीमियम 15.1 प्रतिशत रहा — जो अगस्त के 24.4 प्रतिशत से काफी कम था। मीडियन लिस्टिंग लाभ भी 21.3 प्रतिशत से घटकर 5.9 प्रतिशत पर आ गया, जो निवेशकों के लिए सतर्कता का संकेत है।

ओएफएस बनाम ताज़ा पूँजी: असली सवाल

जुटाई गई राशि का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) के माध्यम से आया। इसका अर्थ यह है कि धन का बड़ा भाग सीधे कंपनियों की बैलेंस शीट को मज़बूत करने में नहीं गया, बल्कि मौजूदा शेयरधारकों ने अपनी हिस्सेदारी बेचकर निकासी की। आलोचकों का कहना है कि ऊँचे ओएफएस अनुपात वाले आईपीओ नए व्यवसाय विस्तार के बजाय 'प्रमोटर एग्ज़िट' का साधन बनते हैं।

विदेशी निकासी के बीच घरेलू तरलता ने थामी बाजी

रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने जनवरी से सितंबर 2026 के बीच भारतीय शेयर बाजार से अनुमानित ₹2.7 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ की निकासी की। इसके बावजूद मज़बूत घरेलू तरलता — मुख्यत: म्यूचुअल फंड और रिटेल निवेशकों की भागीदारी — ने आईपीओ बाजार को सहारा दिया। यह ऐसे समय में आया है जब निफ्टी में 14 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद प्राइमरी मार्केट में उत्साह बना रहा — दोनों का यह अलगाव उल्लेखनीय है।

व्यापक इक्विटी बाजार और इन्वेस्टमेंट बैंकिंग

फॉलो-ऑन ऑफरिंग्स और ब्लॉक डील्स सहित कुल इक्विटी कैपिटल मार्केट फंड जुटाव 1.7 प्रतिशत घटकर 40.8 अरब डॉलर पर आ गया — पिछले तीन वर्षों का सबसे निचला स्तर। इन्वेस्टमेंट बैंकिंग की तस्वीर मिश्रित रही: इक्विटी अंडरराइटिंग फीस 9 प्रतिशत घटकर 41.56 करोड़ डॉलर हो गई, जबकि मज़बूत विलय एवं अधिग्रहण (M&A) गतिविधियों की बदौलत कुल इन्वेस्टमेंट बैंकिंग फीस 2 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 1.1 अरब डॉलर पर पहुँच गई।

आगे क्या

वर्तमान में 130 से अधिक कंपनियों के पास भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) से आईपीओ की मंजूरी मौजूद है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि घरेलू निवेशकों की भागीदारी — लिस्टिंग प्रीमियम में गिरावट के बावजूद — नई लिस्टिंग्स को किस हद तक समर्थन दे पाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन गहराई से देखें तो तस्वीर अधिक जटिल है। जुटाई गई राशि का तीन-चौथाई ओएफएस से आना बताता है कि यह पूँजी निर्माण कम, प्रमोटर निकासी अधिक था — और जब निफ्टी 14 प्रतिशत गिर रहा हो, तो ऐसे माहौल में खुदरा निवेशकों का आईपीओ में उत्साह दीर्घकालिक जोखिम उठाता है। लिस्टिंग प्रीमियम का अगस्त के 24.4 प्रतिशत से सितंबर में 5.9 प्रतिशत (मीडियन) पर आना इस खतरे की पहली झलक है। 130 से अधिक कंपनियों की पाइपलाइन यदि कमज़ोर सेकेंडरी बाजार के बीच आती है, तो 'रिकॉर्ड जुटाव' की यह कहानी बहुत जल्द 'ओवरसप्लाई की चेतावनी' में बदल सकती है।
RashtraPress
9 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जनवरी-सितंबर 2026 में भारतीय आईपीओ बाजार ने कितना फंड जुटाया?
एलएसईजी के विश्लेषण के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने जनवरी-सितंबर 2026 में आईपीओ के ज़रिए रिकॉर्ड 12.5 अरब डॉलर जुटाए — जो 1980 के बाद इस नौ माही अवधि का सबसे बड़ा फंड जुटाव है। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 11.3 प्रतिशत अधिक है।
निफ्टी में गिरावट के बावजूद आईपीओ बाजार मज़बूत क्यों रहा?
रिपोर्ट के अनुसार, मज़बूत घरेलू तरलता — मुख्यतः म्यूचुअल फंड और रिटेल निवेशकों की भागीदारी — ने प्राइमरी मार्केट को समर्थन दिया। यह तब हुआ जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने इसी अवधि में ₹2.7 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ की निकासी की।
ओएफएस का आईपीओ में इतना ऊँचा हिस्सा क्यों चिंता का विषय है?
जुटाई गई राशि का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) के ज़रिए आया, जिसका अर्थ है कि यह पैसा कंपनियों के विस्तार में नहीं, बल्कि मौजूदा शेयरधारकों की जेब में गया। आलोचकों का कहना है कि ऊँचे ओएफएस अनुपात वाले आईपीओ नए व्यावसायिक विकास की बजाय 'प्रमोटर एग्ज़िट' का साधन बन जाते हैं।
सितंबर 2026 में लिस्टिंग प्रीमियम क्यों घटा?
सितंबर 2026 में औसत लिस्टिंग प्रीमियम 15.1 प्रतिशत रहा, जो अगस्त के 24.4 प्रतिशत से कम था। मीडियन लिस्टिंग लाभ भी 21.3 प्रतिशत से घटकर 5.9 प्रतिशत पर आ गया, जो संभवतः बड़े पैमाने पर आईपीओ आपूर्ति और व्यापक बाजार में कमज़ोरी का असर है।
आगामी महीनों में भारतीय आईपीओ बाजार का क्या संकेत है?
वर्तमान में 130 से अधिक कंपनियों के पास सेबी से आईपीओ की मंजूरी मौजूद है, जो पाइपलाइन मज़बूत रखती है। हालाँकि, लिस्टिंग प्रीमियम में गिरावट और निफ्टी की कमज़ोरी के बीच यह देखना अहम होगा कि घरेलू निवेशकों का उत्साह नई लिस्टिंग्स को किस हद तक बनाए रख सकता है।
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