भारत-ओमान के बीच एनर्जी, SAF और सुरक्षा में साझेदारी के बड़े अवसर: ओमान के राजदूत
सारांश
मुख्य बातें
भारत में ओमान के राजदूत इस्सा सालेह अब्दुल्ला अल शिबानी ने 28 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि भारत और ओमान के बीच ऊर्जा, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) और सुरक्षा क्षेत्रों में सहयोग के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं। उन्होंने यह बात दूसरे इंडिया SAF कॉन्क्लेव और अवार्ड 2026 के दौरान एक बातचीत में कही।
राजदूत का बयान: साझा एयरस्पेस, साझा लक्ष्य
राजदूत शिबानी ने कहा, 'दोनों देशों में ऊर्जा, सस्टेनेबल एयर फ्यूल और सुरक्षा के मामले में भी सहयोग की पर्याप्त जगह है। हम पड़ोसी देश हैं, हम एयरस्पेस साझा करते हैं, और मुझे लगता है कि सहयोग बढ़ाने के लिए हम मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि दोनों देशों ने जीरो फ्यूल उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है — ओमान का लक्ष्य 2050 और भारत का लक्ष्य 2070 है।
शिबानी के अनुसार, दोनों देश वास्तव में उस क्षमता को हासिल करने की दिशा में सक्रिय रूप से आगे बढ़ रहे हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी विमानन नीति में स्वच्छ ईंधन को प्राथमिकता देने की दिशा में कदम उठा रहा है।
SAF के लिए भारत को अलग रास्ता अपनाने की ज़रूरत
SAF एसोसिएशन के अध्यक्ष और जेडआर2 ग्रुप के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक जिमी ओल्सन ने कहा कि SAF के मामले में भारत को एक अलग और अनुकूलित रणनीति अपनानी चाहिए। उनके अनुसार, भारत पहले से ही सोलर ऊर्जा, बायोमास और ऊर्जा उपलब्धता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर चुका है, जो SAF उत्पादन की नींव बन सकता है।
ओल्सन ने यह भी स्पष्ट किया कि SAF एक पूंजी-सघन उत्पाद है और सरकार केवल वायबिलिटी फंडिंग का उपयोग कर सकती है। एक निश्चित पैमाने के बाद ही इसे लागत प्रभावी बनाया जा सकता है।
SAF ब्लेंडिंग का रोडमैप और माँग का अनुमान
SAF एसोसिएशन ने विमानन ईंधन में 5 प्रतिशत SAF की हिस्सेदारी का लक्ष्य रखा है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए ब्लेंडिंग का प्रस्तावित मार्ग इस प्रकार है: 2027 में 1 प्रतिशत, 2028 में 2 प्रतिशत और 2030 तक 5 प्रतिशत।
इस रोडमैप के तहत माँग लगभग 46,000 टन से बढ़कर करीब 2,50,000 टन तक पहुँचने का अनुमान है। मौजूदा उत्पादन क्षमता 2027 और 2028 की ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम है, लेकिन यदि 2028 और 2030 के बीच आने वाले HEFA और ATJ परियोजनाएँ समय पर शुरू नहीं हुईं, तो 2030 का लक्ष्य हासिल करना संभव नहीं होगा।
सप्लाई चेन में किसानों की भूमिका अहम
इन परियोजनाओं के लिए निरंतर फीडस्टॉक आपूर्ति की आवश्यकता होगी, जिससे किसान और संग्रह नेटवर्क SAF सप्लाई चेन के केंद्र में आ जाते हैं। यह पहलू SAF की व्यावसायिक व्यवहार्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है।
गौरतलब है कि भारत के कृषि क्षेत्र की व्यापकता और बायोमास की प्रचुरता इसे SAF उत्पादन के लिए एक संभावित वैश्विक केंद्र बनाने में सहायक हो सकती है। आने वाले वर्षों में नीतिगत निर्णय और निजी निवेश यह तय करेंगे कि भारत इस अवसर का कितना लाभ उठा पाता है।