भारत-जर्मनी रिन्यूएबल एनर्जी साझेदारी और गहरी होगी: राजदूत फिलिप एकरमैन
सारांश
मुख्य बातें
भारत और जर्मनी के बीच स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग आने वाले वर्षों में और प्रगाढ़ होगा — यह बात भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने 9 जुलाई को नई दिल्ली में कही। एकरमैन के अनुसार, दोनों देश अपनी विशेषज्ञता और अनुभव को मिलाकर एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल भविष्य की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
द्विपक्षीय ऊर्जा सहयोग की दिशा
राजदूत एकरमैन ने कहा, "भारत और जर्मनी के बीच यह एक बहुत अच्छा सहयोग है, जहाँ दोनों देश अपनी सोच, विशेषज्ञता और अनुभव को साथ लाकर एक बेहतर और टिकाऊ पर्यावरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें स्वच्छ ऊर्जा भी शामिल है और हम भारत के साथ इस क्षेत्र में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में भारत और जर्मनी के बीच यह रिश्ता और गहरा होगा।" यह ऐसे समय में आया है जब भारत 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।
ऊर्जा बदलाव में महिलाओं की भूमिका
एकरमैन ने ऊर्जा क्षेत्र में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा, "हमें अपनी योजनाओं और चर्चाओं में महिलाओं को आगे लाने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ऊर्जा बदलाव की प्रक्रिया महिलाओं के बिना सफल नहीं हो सकती।" गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आँकड़ों के अनुसार वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी 25% से कम है।
मध्य पूर्व संघर्ष और ऊर्जा सुरक्षा
राजदूत ने मध्य पूर्व में जारी तनाव के संदर्भ में दोनों देशों के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की ज़रूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा, "मध्य पूर्व में पिछले कुछ घंटों में जो चिंताजनक घटनाएँ हुई हैं, उन्हें हमने देखा है। हमें उम्मीद है कि बातचीत और कूटनीति के ज़रिए समाधान निकलेगा। यह भारत और जर्मनी दोनों के लिए बहुत ज़रूरी है, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि हमें अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान देना होगा, क्योंकि किसी एक क्षेत्र पर पूरी तरह निर्भर रहना सही नहीं है।"
होर्मुज स्ट्रेट और जीवाश्म ईंधन निर्भरता
एकरमैन ने यह भी रेखांकित किया कि कूटनीतिक प्रयासों से होर्मुज स्ट्रेट खुला रहना सुनिश्चित होना चाहिए, क्योंकि इस जलमार्ग से वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है। उन्होंने कहा, "भारत और जर्मनी जैसे देश, जिनके पास प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, उन्हें यह सोचना होगा कि वे अपनी ऊर्जा ज़रूरतें कैसे पूरी करें ताकि वे विदेशी जीवाश्म ईंधन और अन्य ईंधनों पर कम निर्भर रहें।"
आगे की राह
राजदूत एकरमैन के बयान से स्पष्ट है कि भारत-जर्मनी ऊर्जा साझेदारी केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच ऊर्जा स्वावलंबन की एक रणनीतिक ज़रूरत बन चुकी है। आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच इस दिशा में ठोस नीतिगत चर्चाएँ अपेक्षित हैं।