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इंडिया स्पेस कांग्रेस 2026: वैश्विक नेताओं ने कहा — अंतरिक्ष तकनीक में भारत अग्रणी, साझेदारी से छूएंगे नई ऊंचाइयाँ

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इंडिया स्पेस कांग्रेस 2026: वैश्विक नेताओं ने कहा — अंतरिक्ष तकनीक में भारत अग्रणी, साझेदारी से छूएंगे नई ऊंचाइयाँ

सारांश

नई दिल्ली में ISC 2026 के मंच पर थाईलैंड और ताइवान के प्रतिनिधियों ने भारत को अंतरिक्ष तकनीक की वैश्विक अग्रणी शक्ति करार दिया। सरकारी सहयोग से आगे बढ़कर B2B और रणनीतिक साझेदारी की माँग उठी — यह भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के बदलते कद का स्पष्ट संकेत है।

मुख्य बातें

इंडिया स्पेस कांग्रेस 2026 का पाँचवाँ संस्करण 15 से 17 जून 2026 तक नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है।
थाईलैंड की GISTDA के उप-निदेशक फी चूसरी ने भारत-थाईलैंड के बीच B2B स्तर पर अंतरिक्ष सहयोग की बड़ी संभावनाएँ बताईं।
ताइपे केंद्र के प्रतिनिधि मुमिन चेन ने भारत को अंतरिक्ष तकनीक में वैश्विक अग्रणी शक्ति बताया; ताइवान के सेमीकंडक्टर आधार से साझेदारी की संभावना रेखांकित की।
उपग्रहों की घटती लागत और बढ़ते पैमाने के उत्पादन से आने वाले वर्षों में लॉन्च माँग तेज़ी से बढ़ने का अनुमान।
सम्मेलन में AI-आधारित स्पेस डेटा एनालिटिक्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सर्कुलर स्पेस इकोनॉमी सहित दस से अधिक विषयों पर चर्चा हो रही है।

इंडिया स्पेस कांग्रेस (ISC) 2026 के मंच से वैश्विक उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने 15 जून 2026 को एकमत से कहा कि भारत अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में दुनिया की प्रमुख शक्तियों में से एक बन चुका है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ज़रिए यह क्षेत्र नई ऊंचाइयाँ छू सकता है। नई दिल्ली में 15 से 17 जून तक आयोजित इस तीन-दिवसीय सम्मेलन में कई देशों के नीति-निर्माता, राजनयिक, अंतरिक्ष विशेषज्ञ और उद्योग प्रतिनिधि एकत्रित हुए हैं।

सम्मेलन का उद्देश्य और विषय-वस्तु

स्पेस इंडस्ट्री एसोसिएशन-इंडिया (SIA-India) द्वारा आयोजित इंडिया स्पेस कांग्रेस का यह पाँचवाँ संस्करण है, जिसकी थीम है — 'अंतरिक्ष की नई कल्पना, सहयोग का नया रूप, अंतरिक्ष के अगले दौर को साकार करना'। सम्मेलन में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, पृथ्वी अवलोकन तकनीक, डुअल-यूज़ टेक्नोलॉजी, AI-आधारित स्पेस डेटा एनालिटिक्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी, माइक्रोग्रैविटी रिसर्च, अंतरिक्ष विनिर्माण, संसाधन उपयोग और सर्कुलर स्पेस इकोनॉमी जैसे अहम विषयों पर विस्तृत चर्चा हो रही है।

थाईलैंड की नज़र से भारत का अंतरिक्ष उद्योग

थाईलैंड की जियो-इन्फॉर्मेटिक्स एंड स्पेस टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट एजेंसी (GISTDA) के उप-कार्यकारी निदेशक फी चूसरी ने कहा कि भारत और थाईलैंड के बीच सहयोगात्मक संबंध लंबे समय से रहे हैं। उन्होंने बताया कि ISC 2026 में भाग लेने के बाद भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग की तेज़ी से बढ़ती क्षमता का बेहतर अंदाज़ा हुआ।

चूसरी के अनुसार, भविष्य में दोनों देशों के बीच केवल सरकार-से-सरकार (G2G) नहीं, बल्कि बिज़नेस-टू-बिज़नेस (B2B) स्तर पर भी सहयोग की व्यापक संभावनाएँ हैं। उन्होंने निजी क्षेत्र को इस साझेदारी का सक्रिय हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित किया।

उपग्रह निर्माण की लागत पर बोलते हुए चूसरी ने कहा कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण सैटेलाइट की लागत में लगातार कमी आ रही है, जिससे आने वाले वर्षों में पृथ्वी की कक्षा में उपग्रहों की संख्या और लॉन्च की माँग दोनों तेज़ी से बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि दूरसंचार और पृथ्वी अवलोकन जैसे क्षेत्रों में अंतरिक्ष गतिविधियों का विस्तार वैश्विक स्तर पर नई आर्थिक और तकनीकी संभावनाएँ उत्पन्न करेगा।

ताइवान की रणनीतिक दृष्टि: सेमीकंडक्टर से अंतरिक्ष तक

भारत में ताइपे आर्थिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के प्रतिनिधि मुमिन चेन ने कहा कि भारत अंतरिक्ष तकनीक में दुनिया की अग्रणी शक्तियों में से एक बनकर उभरा है और ISC जैसे मंच अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत की उपलब्धियों को करीब से जानने का अवसर देते हैं।

चेन ने बताया कि ताइवान सेमीकंडक्टर और कंप्यूटर चिप निर्माण में वैश्विक स्तर पर अग्रणी है और उसके पास अंतरिक्ष तकनीक का भी मज़बूत आधार है। उन्होंने कहा कि अतीत में भारत और ताइवान के बीच वैज्ञानिक सहयोग रहा है, लेकिन अब अंतरिक्ष क्षेत्र में व्यावसायिक और रणनीतिक सहयोग की भी व्यापक संभावनाएँ हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी अंतरिक्ष नीति को उदार बनाकर निजी क्षेत्र के लिए द्वार खोल चुका है और IN-SPACe जैसी संस्थाओं के ज़रिए वैश्विक निवेश आकर्षित कर रहा है। गौरतलब है कि ISC का यह पाँचवाँ संस्करण ऐसे दौर में हो रहा है जब भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या और निवेश दोनों रिकॉर्ड स्तर पर हैं।

आगे की राह: वैश्विक साझेदारी और नई संभावनाएँ

विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष तकनीक भविष्य में वैज्ञानिक, व्यावसायिक और रक्षा — तीनों क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाएगी। ISC 2026 में उभरी सहमति यह है कि भारत की बढ़ती लॉन्च क्षमता, डेटा एनालिटिक्स विशेषज्ञता और लागत-प्रभावी अंतरिक्ष समाधान उसे वैश्विक साझेदारियों के केंद्र में रखते हैं। सम्मेलन के शेष दो दिनों में निवेश के नए अवसरों और द्विपक्षीय सहयोग के ठोस ढाँचे पर और चर्चा अपेक्षित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी यह है कि ये घोषणाएँ ठोस अनुबंधों और संयुक्त परियोजनाओं में कब तब्दील होती हैं। थाईलैंड और ताइवान दोनों ने B2B सहयोग की बात की, पर अभी तक कोई विशिष्ट समझौता सामने नहीं आया है। भारत की निजी अंतरिक्ष नीति उदार हुई है, लेकिन नियामक स्पष्टता और दीर्घकालिक निवेश माहौल पर अंतरराष्ट्रीय भागीदार अभी भी सावधानी से नज़र रख रहे हैं। ISC जैसे मंचों की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब संवाद से आगे बढ़कर मापने योग्य साझेदारियाँ उभरें।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इंडिया स्पेस कांग्रेस 2026 क्या है और यह कब हो रही है?
इंडिया स्पेस कांग्रेस 2026 स्पेस इंडस्ट्री एसोसिएशन-इंडिया (SIA-India) द्वारा आयोजित वार्षिक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है, जो इस वर्ष 15 से 17 जून 2026 तक नई दिल्ली में हो रहा है। यह इसका पाँचवाँ संस्करण है, जिसमें कई देशों के नीति-निर्माता, राजनयिक और उद्योग विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।
ISC 2026 में थाईलैंड और भारत के बीच किस तरह के सहयोग की बात हुई?
GISTDA के उप-निदेशक फी चूसरी ने कहा कि भारत और थाईलैंड के बीच भविष्य में केवल सरकार-से-सरकार (G2G) नहीं, बल्कि बिज़नेस-टू-बिज़नेस (B2B) स्तर पर भी अंतरिक्ष सहयोग की बड़ी संभावनाएँ हैं। उन्होंने निजी क्षेत्र को इस साझेदारी का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित किया।
ताइवान भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में किस भूमिका में रुचि रखता है?
ताइपे आर्थिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के प्रतिनिधि मुमिन चेन के अनुसार ताइवान सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण में वैश्विक अग्रणी है और भारत के साथ अंतरिक्ष क्षेत्र में व्यावसायिक व रणनीतिक सहयोग की व्यापक संभावनाएँ हैं। दोनों देशों के बीच अतीत में वैज्ञानिक सहयोग रहा है और अब इसे विस्तार देने की बात हो रही है।
ISC 2026 में किन विषयों पर चर्चा हो रही है?
सम्मेलन में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, पृथ्वी अवलोकन तकनीक, डुअल-यूज़ टेक्नोलॉजी, AI-आधारित स्पेस डेटा एनालिटिक्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी, माइक्रोग्रैविटी रिसर्च, अंतरिक्ष विनिर्माण, संसाधन उपयोग और सर्कुलर स्पेस इकोनॉमी जैसे विषय शामिल हैं।
उपग्रहों की घटती लागत का वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र पर क्या असर पड़ेगा?
GISTDA के फी चूसरी के अनुसार, बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण उपग्रहों की लागत में लगातार कमी आ रही है, जिससे आने वाले वर्षों में पृथ्वी की कक्षा में सैटेलाइट की संख्या और लॉन्च की माँग दोनों तेज़ी से बढ़ेंगी। इससे दूरसंचार और पृथ्वी अवलोकन जैसे क्षेत्रों में नई आर्थिक और तकनीकी संभावनाएँ उत्पन्न होंगी।
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