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भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ पहुँचने का अनुमान: EY-CII रिपोर्ट

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भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ पहुँचने का अनुमान: EY-CII रिपोर्ट

सारांश

EY और CII की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ तक पहुँच सकती है। नीतिगत सुधार, IN-SPACe का विस्तार और निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका इस छलांग की बुनियाद हैं — लेकिन लक्ष्य हासिल करने के लिए अगले 7-8 साल निर्णायक होंगे।

मुख्य बातें

EY-CII की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ (44 अरब डॉलर) तक पहुँच सकती है।
भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 , IN-SPACe और NSIL ने सरकार-नेतृत्व से उद्योग-केंद्रित इकोसिस्टम की ओर बदलाव की नींव रखी है।
रिपोर्ट ने 6 प्रमुख प्राथमिकता क्षेत्र चिह्नित किए हैं, जिनमें घरेलू मैन्युफैक्चरिंग, नियामकीय सुधार और भारत को स्पेस एक्सपोर्ट हब बनाना शामिल है।
डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशन कृषि, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन और रक्षा क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।
लक्ष्य हासिल करने के लिए अगले 7-8 वर्षों में सरकार, उद्योग, स्टार्टअप और अकादमिक संस्थानों का समन्वित प्रयास ज़रूरी बताया गया है।

भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ (44 अरब डॉलर) तक पहुँच सकती है — यह अनुमान EY (अर्न्स्ट एंड यंग) और भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) की संयुक्त रिपोर्ट में लगाया गया है, जो 12 सितंबर 2026 को जारी की गई। नीतिगत सुधार, निजी क्षेत्र की बढ़ती सहभागिता और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं की तेज़ माँग इस संभावित छलांग की मुख्य वजह बताई गई हैं।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023, भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) के माध्यम से किए गए सुधार और न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) की भूमिका ने मिलकर सरकार-नेतृत्व वाले अंतरिक्ष कार्यक्रम को उद्योग-केंद्रित इकोसिस्टम की दिशा में मोड़ने की नींव रखी है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक स्पेस बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रहा है।

रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि अनुमानित वृद्धि हासिल करने के लिए अगले 7 से 8 वर्षों में सरकारी एजेंसियों, उद्योग, स्टार्टअप्स, निवेशकों, अकादमिक संस्थानों और रणनीतिक उपयोगकर्ताओं को एकजुट होकर काम करना होगा।

छह प्राथमिक क्षेत्र जिन पर ज़ोर

स्पेस सेक्टर को तेज़ गति से विस्तार देने के लिए रिपोर्ट ने छह प्रमुख कार्य-क्षेत्र चिह्नित किए हैं:

पहला, विभिन्न उद्योगों में अंतरिक्ष-आधारित अनुप्रयोगों का व्यापक उपयोग। दूसरा, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्च क्षमता को सुदृढ़ करना। तीसरा, नियामकीय और वित्तीय माहौल में सुधार। चौथा, व्यावसायिक उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी माँग का लाभ उठाना। पाँचवाँ, रक्षा और रणनीतिक अंतरिक्ष क्षमताओं को मज़बूती देना। और छठा, भारत को वैश्विक स्पेस पार्टनर एवं स्पेस एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित करना।

स्पेस वैल्यू चेन: अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम तक

रिपोर्ट पूरी स्पेस वैल्यू चेन का विश्लेषण करती है। अपस्ट्रीम में सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग, लॉन्च व्हीकल, प्रोपल्शन सिस्टम और एवियोनिक्स शामिल हैं। मिडस्ट्रीम में ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और सैटेलाइट ऑपरेशंस आते हैं। डाउनस्ट्रीम में अर्थ ऑब्ज़र्वेशन (EO), सैटेलाइट कम्युनिकेशन, नेविगेशन सेवाएँ और जियोस्पेशियल एनालिटिक्स प्रमुख हैं।

गौरतलब है कि ये डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशन कृषि, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग, जलवायु परिवर्तन से निपटने और शासन व्यवस्था को और सक्षम बना रहे हैं। इसके साथ ही सुरक्षित संचार और समुद्री निगरानी के ज़रिये भारत की रक्षा क्षमताओं को भी बल मिल रहा है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

CII नेशनल कमेटी ऑन स्पेस के चेयरमैन मल्लावरपु अप्पाराव ने कहा कि भारत का स्पेस सेक्टर अब केवल वैज्ञानिक अन्वेषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सैटेलाइट-आधारित सेवाओं और अनुप्रयोगों से संचालित एक इनोवेशन-ड्रिवन इकोनॉमी बन गया है।

EY इंडिया में एयरोस्पेस, डिफेंस एंड स्पेस के पार्टनर सीडीआर गौतम नंदा ने कहा कि विकास के अगले चरण के लिए औद्योगिक क्षमता बढ़ाना, तकनीकों का व्यावसायीकरण, आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करना और सैटेलाइट डेटा को व्यावसायिक, सार्वजनिक तथा रणनीतिक उपयोग की सेवाओं में परिवर्तित करना निर्णायक भूमिका निभाएगा।

आगे की राह

रिपोर्ट के अनुसार, स्पेस इकोनॉमी से अधिकतम आर्थिक मूल्य प्राप्त करने के लिए सैटेलाइट डेटा का व्यापक उपयोग, उन्नत डेटा एनालिटिक्स क्षमता, कुशल मानव संसाधन और परस्पर जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता देनी होगी। यदि ये लक्ष्य समयबद्ध तरीके से पूरे किए गए, तो भारत 2030 के दशक में वैश्विक स्पेस इकोनॉमी में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारत के स्पेस सेक्टर की असली कसौटी कार्यान्वयन गति होगी। IN-SPACe के गठन के बाद से निजी लॉन्च और सैटेलाइट निर्माण में हलचल जरूर बढ़ी है, पर वैश्विक बाज़ार में SpaceX और यूरोपीय प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत की लागत-प्रतिस्पर्धात्मकता अभी भी परखी जानी है। रिपोर्ट छह प्राथमिकताएँ गिनाती है, लेकिन इनके बीच संसाधन आवंटन और जवाबदेही का ढाँचा अभी अस्पष्ट है — बिना उसके, यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी घोषणाओं की उस सूची में जुड़ सकता है जो आँकड़ों में बड़ी, ज़मीन पर धीमी रहीं।
RashtraPress
13 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

EY-CII रिपोर्ट में भारत की स्पेस इकोनॉमी के बारे में क्या कहा गया है?
EY और CII की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ (44 अरब डॉलर) तक पहुँच सकती है। नीतिगत सुधार, निजी क्षेत्र की भागीदारी और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं की बढ़ती माँग इस वृद्धि के प्रमुख कारण बताए गए हैं।
भारत की स्पेस इकोनॉमी को बढ़ाने में IN-SPACe और NSIL की क्या भूमिका है?
IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र) और NSIL (न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड) ने भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के साथ मिलकर सरकारी नेतृत्व वाले कार्यक्रम को उद्योग-केंद्रित इकोसिस्टम में बदलने की नींव रखी है। ये संस्थाएँ निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रवेश देने का मार्ग खोलती हैं।
भारत के स्पेस सेक्टर में किन छह प्राथमिकता क्षेत्रों की पहचान की गई है?
रिपोर्ट ने छह प्रमुख क्षेत्र चिह्नित किए हैं: अंतरिक्ष-आधारित अनुप्रयोगों का विस्तार, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्च क्षमता को मज़बूत करना, नियामकीय और वित्तीय सुधार, सरकारी माँग का व्यावसायिक लाभ उठाना, रक्षा-रणनीतिक क्षमताओं को सुदृढ़ करना, और भारत को वैश्विक स्पेस एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित करना।
डाउनस्ट्रीम स्पेस एप्लिकेशन आम जनता के लिए कैसे उपयोगी हैं?
डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशन कृषि, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग और जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायक हैं। इसके अलावा ये सुरक्षित संचार और समुद्री निगरानी के ज़रिये देश की रक्षा क्षमताओं को भी मज़बूत करते हैं।
2033 का ₹4.22 लाख करोड़ का लक्ष्य हासिल करने के लिए क्या करना होगा?
रिपोर्ट के अनुसार, अगले 7-8 वर्षों में सरकारी एजेंसियों, उद्योग, स्टार्टअप्स, निवेशकों और अकादमिक संस्थानों को मिलकर काम करना होगा। साथ ही सैटेलाइट डेटा का व्यापक उपयोग, बेहतर डेटा एनालिटिक्स क्षमता, कुशल प्रतिभाओं का विकास और डिजिटल प्लेटफॉर्म का एकीकरण ज़रूरी होगा।
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