भारत की स्पेस इकोनॉमी 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ पहुँचने का अनुमान: EY-CII रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 2033 तक ₹4.22 लाख करोड़ (44 अरब डॉलर) तक पहुँच सकती है — यह अनुमान EY (अर्न्स्ट एंड यंग) और भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) की संयुक्त रिपोर्ट में लगाया गया है, जो 12 सितंबर 2026 को जारी की गई। नीतिगत सुधार, निजी क्षेत्र की बढ़ती सहभागिता और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं की तेज़ माँग इस संभावित छलांग की मुख्य वजह बताई गई हैं।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023, भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) के माध्यम से किए गए सुधार और न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) की भूमिका ने मिलकर सरकार-नेतृत्व वाले अंतरिक्ष कार्यक्रम को उद्योग-केंद्रित इकोसिस्टम की दिशा में मोड़ने की नींव रखी है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक स्पेस बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रहा है।
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि अनुमानित वृद्धि हासिल करने के लिए अगले 7 से 8 वर्षों में सरकारी एजेंसियों, उद्योग, स्टार्टअप्स, निवेशकों, अकादमिक संस्थानों और रणनीतिक उपयोगकर्ताओं को एकजुट होकर काम करना होगा।
छह प्राथमिक क्षेत्र जिन पर ज़ोर
स्पेस सेक्टर को तेज़ गति से विस्तार देने के लिए रिपोर्ट ने छह प्रमुख कार्य-क्षेत्र चिह्नित किए हैं:
पहला, विभिन्न उद्योगों में अंतरिक्ष-आधारित अनुप्रयोगों का व्यापक उपयोग। दूसरा, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और लॉन्च क्षमता को सुदृढ़ करना। तीसरा, नियामकीय और वित्तीय माहौल में सुधार। चौथा, व्यावसायिक उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी माँग का लाभ उठाना। पाँचवाँ, रक्षा और रणनीतिक अंतरिक्ष क्षमताओं को मज़बूती देना। और छठा, भारत को वैश्विक स्पेस पार्टनर एवं स्पेस एक्सपोर्ट हब के रूप में स्थापित करना।
स्पेस वैल्यू चेन: अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम तक
रिपोर्ट पूरी स्पेस वैल्यू चेन का विश्लेषण करती है। अपस्ट्रीम में सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग, लॉन्च व्हीकल, प्रोपल्शन सिस्टम और एवियोनिक्स शामिल हैं। मिडस्ट्रीम में ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और सैटेलाइट ऑपरेशंस आते हैं। डाउनस्ट्रीम में अर्थ ऑब्ज़र्वेशन (EO), सैटेलाइट कम्युनिकेशन, नेविगेशन सेवाएँ और जियोस्पेशियल एनालिटिक्स प्रमुख हैं।
गौरतलब है कि ये डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशन कृषि, लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग, जलवायु परिवर्तन से निपटने और शासन व्यवस्था को और सक्षम बना रहे हैं। इसके साथ ही सुरक्षित संचार और समुद्री निगरानी के ज़रिये भारत की रक्षा क्षमताओं को भी बल मिल रहा है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
CII नेशनल कमेटी ऑन स्पेस के चेयरमैन मल्लावरपु अप्पाराव ने कहा कि भारत का स्पेस सेक्टर अब केवल वैज्ञानिक अन्वेषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सैटेलाइट-आधारित सेवाओं और अनुप्रयोगों से संचालित एक इनोवेशन-ड्रिवन इकोनॉमी बन गया है।
EY इंडिया में एयरोस्पेस, डिफेंस एंड स्पेस के पार्टनर सीडीआर गौतम नंदा ने कहा कि विकास के अगले चरण के लिए औद्योगिक क्षमता बढ़ाना, तकनीकों का व्यावसायीकरण, आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करना और सैटेलाइट डेटा को व्यावसायिक, सार्वजनिक तथा रणनीतिक उपयोग की सेवाओं में परिवर्तित करना निर्णायक भूमिका निभाएगा।
आगे की राह
रिपोर्ट के अनुसार, स्पेस इकोनॉमी से अधिकतम आर्थिक मूल्य प्राप्त करने के लिए सैटेलाइट डेटा का व्यापक उपयोग, उन्नत डेटा एनालिटिक्स क्षमता, कुशल मानव संसाधन और परस्पर जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता देनी होगी। यदि ये लक्ष्य समयबद्ध तरीके से पूरे किए गए, तो भारत 2030 के दशक में वैश्विक स्पेस इकोनॉमी में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर सकता है।