जेपी मॉर्गन रिपोर्ट: हॉर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद भी कच्चा तेल $100 प्रति बैरल की रेंज में रहेगा
सारांश
मुख्य बातें
जेपी मॉर्गन की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, हॉर्मुज स्ट्रेट के दोबारा खुलने के बावजूद कच्चे तेल की कीमतें 2026 के शेष महीनों में $100 प्रति बैरल की निचली रेंज में बनी रह सकती हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बना हुआ है, जिससे कीमतों में तत्काल राहत मिलने की संभावना कम है। मंगलवार, 12 मई को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड करीब एक प्रतिशत की बढ़त के साथ $105 प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा था।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
जेपी मॉर्गन ने अनुमान लगाया है कि 2026 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग $97 प्रति बैरल रह सकती है। निवेश बैंक ने स्पष्ट किया कि केवल हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने से बाज़ार में तुरंत स्थिरता नहीं आएगी। रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल के परिवहन नेटवर्क में लॉजिस्टिक्स संबंधी चुनौतियाँ कई महीनों तक बनी रहने की संभावना है।
आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि शिपिंग, रिफाइनरी संचालन और टैंकरों की उपलब्धता में व्यवधान से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बना रहने की संभावना है। इससे कीमतों में तीव्र सुधार नहीं हो पाएगा। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पहले से ही भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रहे हैं।
अमेरिका-ईरान तनाव का असर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वाशिंगटन के शांति प्रस्ताव पर ईरान की प्रतिक्रिया की आलोचना किए जाने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में नई तेज़ी आई। इससे क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक तेल प्रवाह को लेकर नई चिंताएँ उभरी हैं। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी एक प्रतिशत की मज़बूती के साथ $100 प्रति बैरल के ऊपर पहुँच गया।
ओपेक उत्पादन में कटौती
रिपोर्टों के मुताबिक, अप्रैल में ओपेक द्वारा कच्चे तेल का उत्पादन 8,30,000 बैरल प्रति दिन घटकर 2,00,40,000 बैरल प्रति दिन हो गया। यह उत्पादन कटौती आपूर्ति पक्ष पर पहले से मौजूद दबाव को और बढ़ा रही है। गौरतलब है कि ओपेक के इस कदम से वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की उपलब्धता और सीमित हो सकती है।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यम अवधि में ऊर्जा बाज़ारों को आपूर्ति की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट संकेत देती है कि जब तक पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक स्थिति नहीं सुधरती और लॉजिस्टिक्स बाधाएँ दूर नहीं होतीं, तब तक कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट की उम्मीद कम है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति चालू खाता घाटे और मुद्रास्फीति के मोर्चे पर चुनौतियाँ बढ़ा सकती है।