आपूर्ति संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में 3 प्रतिशत की वृद्धि, ब्रेंट क्रूड 103.03 डॉलर तक पहुंचा
सारांश
Key Takeaways
- कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का प्रमुख कारण आपूर्ति संकट है।
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना वैश्विक बाजार के लिए गंभीर खतरा है।
- भारत ने ईरान के साथ एलपीजी आपूर्ति बढ़ाने के लिए बातचीत शुरू की है।
- कच्चे तेल की कीमतें पिछले एक महीने में 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।
- खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता से एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को खतरा है।
मुंबई, 17 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। कच्चे तेल की कीमतों में जारी तेजी का कारण आपूर्ति से संबंधित चिंताओं का बढ़ना है, जिसके चलते मंगलवार को कीमतों में लगभग 3 प्रतिशत तक का उछाल देखा गया।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 2.81 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 103.03 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड 2.80 प्रतिशत की बढ़त के साथ 95.03 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है।
कच्चे तेल में इस तेजी का मुख्य कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, फारस की खाड़ी में एक संकीर्ण जलमार्ग है, जहाँ से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार होता है। यह वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है, और इसमें किसी भी प्रकार की बाधा से बाजारों को गंभीर जोखिम हो सकता है।
अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध के चलते ईरान ने इसे बंद कर दिया है, जिससे पूरी दुनिया में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है।
इसका परिणाम यह हुआ है कि पिछले एक महीने में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी हैं।
भारत भी ईरान के साथ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भारतीय जहाजों की आवाजाही को लेकर लगातार बातचीत कर रहा है। इसी कड़ी में ईरान ने दो एलपीजी लदे भारतीय जहाजों, शिवालिक और नंदा देवी को अनुमति दी है।
इनमें से शिवालिक सोमवार को गुजरात के मुद्रा पोर्ट पर डॉक कर चुका है, जबकि नंदा देवी मंगलवार को कांडला पोर्ट पर डॉक करेगा। इससे देश में एलपीजी की आपूर्ति में बढ़ोतरी होगी।
इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से भारतीय ध्वज वाला जहाज 'जग लाडकी' लगभग 80,000 टन से अधिक कच्चा तेल लेकर भारत के लिए रवाना हुआ है। यह इस सप्ताह भारत पहुंचेगा, जिससे देश में कच्चे तेल की आपूर्ति में वृद्धि होगी।
विश्लेषकों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल के आयात पर अत्यधिक निर्भरता के कारण भारत सहित एशियाई अर्थव्यवस्थाएं विशेष रूप से संवेदनशील बनी हुई हैं।